छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फैसला, अनैतिक व्यापार अधिनियम के तहत महिला के खिलाफ केस खारिज
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वयस्क महिला के अधिकारों और गरिमा से जुड़े एक केस में अहम फैसला सुनाया है. संजय यादव की रिपोर्ट

By ETV Bharat Chhattisgarh Team
Published : August 26, 2026 at 8:26 PM IST
बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वयस्क सेक्स वर्कर्स के अधिकारों और गरिमा से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी वयस्क महिला के खिलाफ केवल उसके सेक्स वर्कर होने के आधार पर आपराधिक कार्रवाई जारी नहीं रखी जा सकती.
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कानूनी सिद्धांतों को लागू करते हुए महिला के विरुद्ध दर्ज FIR, चार्जशीट तथा उसके आधार पर लंबित आपराधिक कार्रवाई को रद्द कर दिया. मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा एवं न्यायमूर्ति रविन्द्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने 13 अगस्त 2026 को इससे जुड़ा आदेश पारित किया. खंडपीठ ने आदेश पारित करते हुए कहा कि मामले की परिस्थितियों में कार्रवाई जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा.
होटल में पुलिस रेड के बाद महिला को बनाया गया था आरोपी
यह केस रायपुर के तेलीबांधा थाना क्षेत्र में होटल हयात में हुई कथित पुलिस रेड से जुड़ा था. पुलिस ने महिला सहित अन्य आरोपियों के विरुद्ध Immoral Traffic Prevention Act, 1956 की धाराओं 3, 4, 5 और 7 के तहत अपराध दर्ज किया था.
याचिकाकर्ता का स्पष्ट आरोप था कि कथित रेड के समय वह होटल में मौजूद नहीं थी और न ही वहां निवास कर रही थी. उसका कहना था कि बाद में उसे पुलिस थाने बुलाया गया और मामले में आरोपी बना दिया गया. गिरफ्तारी के बाद उसे जमानत पर रिहा किया गया, लेकिन बाद में पुलिस ने उसके विरुद्ध चार्जशीट दाखिल कर दी.
सुप्रीम कोर्ट के केस का दिया हवाला
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Budhadev Karmaskar v. State of West Bengal मामले में 19 मई 2022 को जारी महत्वपूर्ण निर्देशों पर भरोसा किया. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि सेक्स वर्कर्स को कानून का समान संरक्षण प्राप्त है और यदि कोई सेक्स वर्कर वयस्क है तथा अपनी सहमति से सेक्स वर्क में शामिल है, तो पुलिस को उसके विरुद्ध केवल इसी आधार पर आपराधिक कार्रवाई करने से बचना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि किसी वेश्यालय में छापेमारी के दौरान स्वैच्छिक सेक्स वर्क करने वाली महिलाओं को गिरफ्तार, दंडित, प्रताड़ित अथवा विक्टिमाइज नहीं किया जाना चाहिए.
अपराध के खिलाफ ठोस सबूत नहीं मिले
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध ऐसी विशिष्ट सामग्री सामने नहीं आई, जिससे यह प्रदर्शित हो कि उसने स्वयं कोई ऐसा स्वतंत्र कृत्य किया था जो उसके खिलाफ लगाए गए अपराधों के आवश्यक तत्वों को पूरा करता हो. कोर्ट ने इस तथ्य को भी महत्वपूर्ण माना कि महिला ने कथित घटना के समय होटल में मौजूद होने के आरोप को स्पष्ट रूप से नकारा था.
केवल पेशे के आधार पर अभियोजन स्वीकार्य नहीं-हाईकोर्ट
खंडपीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित बाध्यकारी दिशा-निर्देशों को ध्यान में रखते हुए किसी वयस्क महिला के विरुद्ध केवल उसके कथित सेक्स वर्कर होने के आधार पर आपराधिक कार्रवाई जारी रखना उचित नहीं है.
कोर्ट ने माना कि उपलब्ध सामग्री और मामले की समग्र परिस्थितियों में कार्रवाई जारी रखने से कोई उपयोगी उद्देश्य पूरा नहीं होगा, बल्कि इससे उस प्रकार के उत्पीड़न और विक्टिमाइजेशन की स्थिति पैदा होगी, जिससे बचने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट निर्देश जारी कर चुका है.
FIR, चार्जशीट और लंबित आपराधिक मामला रद्द
इन सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने महिला की याचिका स्वीकार कर ली और उसके विरुद्ध दर्ज FIR, उसके आधार पर दाखिल चार्जशीट तथा लंबित आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया.
यह फैसला वयस्क महिलाओं की गरिमा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानून के समान संरक्षण के अधिकार के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है. इसके साथ ही, यह आदेश यह रेखांकित करता है कि आपराधिक कानून के तहत अभियोजन के लिए केवल किसी व्यक्ति की पहचान या पेशा पर्याप्त आधार नहीं हो सकता, आरोपों के समर्थन में अपराध के आवश्यक तत्वों को दर्शाने वाली ठोस सामग्री होना आवश्यक है.

