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एडिशनल एसपी पदस्थापना के मानदंड को चुनौती देने वाली डीएसपी की याचिका छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने खारिज की

राज्य ने कहा कि अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पद पर पदस्थापना के लिए पात्रता मात्र से किसी अधिकारी को पदस्थापना का अधिकार प्राप्त नहीं होता.

CHHATTISGARH HIGH COURT
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट (ETV Bharat Chhattisgarh)
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By ETV Bharat Chhattisgarh Team

Published : August 26, 2026 at 10:09 AM IST

4 Min Read
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बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के पद पर पदस्थापना से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) पात्र अधिकारियों की उपयुक्तता जांचने के लिए न्यूनतम बेंचमार्क निर्धारित कर सकती है, बशर्ते वह मानदंड सभी पात्र अधिकारियों पर समान रूप से लागू हो और मनमाना, भेदभावपूर्ण या नियम-विरुद्ध न हो. हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु ने कोर्ट में दायर WPS No. 4177/2026 में यह फैसला सुनाते हुए डीएसपी माधुरी धिरही की याचिका खारिज कर दी.

याचिकाकर्ता वर्ष 2014 बैच की सीधी भर्ती वाली डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस थीं और वरिष्ठ वेतनमान में कार्यरत थीं. उन्होंने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पद पर विचार के लिए आवश्यक आठ वर्ष की अर्हकारी सेवा पूरी कर ली थी. दिसंबर 2025 में हुई DPC की बैठक में उनके सेवा अभिलेख और ACR के मूल्यांकन के आधार पर उन्हें पदस्थापना के लिए ‘Not Fit’ घोषित किया गया.

याचिकाकर्ता के अनुसार उन्हें पांच वर्षों के ACR में चार ‘बहुत अच्छा ’ और एक ‘अच्छी’ ग्रेडिंग मिली थी, जिसके आधार पर उनके कुल 14 अंक बने. उनका तर्क था कि लागू सेवा नियमों में 15 अंकों का कोई न्यूनतम बेंचमार्क निर्धारित नहीं है और DPC द्वारा ऐसा अतिरिक्त मानदंड तय करना मनमाना है.

राज्य की ओर से इसका विरोध करते हुए कहा गया कि अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पद पर पदस्थापना के लिए पात्रता मात्र से किसी अधिकारी को पदस्थापना का अधिकार प्राप्त नहीं होता. अधिकारी को केवल विचार किए जाने का अधिकार है. DPC को सेवा अभिलेख, ACR और अधिकारी की उपयुक्तता के समग्र मूल्यांकन का अधिकार है.

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान DPC द्वारा 15 अंकों का बेंचमार्क तय किए जाने का आधार स्पष्ट करने के लिए अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (प्रशासन) से शपथपत्र भी मांगा था. प्रस्तुत शपथपत्र में बताया गया कि अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पद की प्रकृति, जिम्मेदारियों और अपेक्षित कार्यक्षमता को ध्यान में रखते हुए DPC ने 15 अंक को न्यूनतम उपयुक्तता मानक निर्धारित किया था और इसे सभी पात्र अधिकारियों पर समान रूप से लागू किया गया.

अदालत ने कहा कि छत्तीसगढ़ पुलिस कार्यपालिका (राजपत्रित) सेवा भर्ती एवं पदोन्नति नियम, 2005 के नियम 23 के तहत पात्र अधिकारी को केवल विचार किए जाने का अधिकार मिलता है; अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पद पर पदस्थापना का कोई स्वतः या निहित अधिकार नहीं बनता.

अदालत ने कहा कि DPC जैसे विशेषज्ञ निकाय द्वारा किए गए मूल्यांकन में न्यायिक हस्तक्षेप सीमित है. अदालत DPC की जगह स्वयं बैठकर उम्मीदवार की योग्यता या मेरिट का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकती. हाईकोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि न्यूनतम बेंचमार्क निर्धारित करना DPC या सेलेक्शन कमेटी के अधिकार और विवेक के क्षेत्र में आता है, हालांकि यह विवेक पूर्ण नहीं है. यदि बेंचमार्क मनमाना, भेदभावपूर्ण, दुर्भावनापूर्ण या वैधानिक नियमों के विपरीत हो, तो न्यायिक समीक्षा के तहत हस्तक्षेप किया जा सकता है.

मामले में अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता 14 अंक प्राप्त कर सकीं, जबकि DPC द्वारा सभी पात्र अधिकारियों के लिए 15 अंकों का न्यूनतम मानक निर्धारित किया गया था. याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सकीं कि उनके साथ किसी समान स्थिति वाले अधिकारी से अलग व्यवहार किया गया अथवा DPC की प्रक्रिया में दुर्भावना, पक्षपात या मनमानी थी. इसी आधार पर हाईकोर्ट ने कहा कि DPC द्वारा निर्धारित 15 अंकों के बेंचमार्क में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता और याचिका निराधार पाते हुए खारिज कर दी गई.

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