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पेट्रोल की खपत घटाएगी और गुणवत्ता बढ़ाएगी बाड़मेर इंजीनियरिंग कॉलेज के विद्यार्थियों की नई तकनीक

बाड़मेर इंजीनियरिंग कॉलेज के केमिकल इंजीनियरिंग के शोधार्थियों ने मेम्ब्रेन डिस्टिलेशन और परवेपोरेशन को इथेनॉल से पानी को अलग करने असरदार तरीका बताया है.

new ethanol based technology
शोध करते छात्र (ETV Bharat Barmer)
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By ETV Bharat Rajasthan Team

Published : January 16, 2026 at 8:04 AM IST

4 Min Read
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बाड़मेर: बाड़मेर इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रों ने पेट्रोल की गुणवत्ता सुधारने और खपत कम करने के लिए बायो-इथेनॉल के उपयोग पर एक महत्वपूर्ण परीक्षण किया है. उन्होंने मेम्ब्रेन टेक्नोलॉजी के तहत विभिन्न प्रकार की झिल्लियों का संश्लेषण किया है, जिसका उपयोग इथेनॉल और जल के मिश्रण से 99.5 प्रतिशत शुद्ध इथेनॉल को अलग करने के लिए किया जा सकता है. इससे ऊर्जा क्षेत्र में नई उम्मीद जगी है. वर्तमान में इथेनॉल उत्पादन के लिए सामान्य आसवन (डिस्टिलेशन) प्रक्रिया का ही इस्तेमाल किया जाता है.

प्राचार्य डॉ. संदीप रांकावत के मुताबिक आगामी समय में इस परीक्षण को व्यापक स्तर पर किया जाएगा, ताकि इसके व्यावहारिक उपयोग की संभावनाओं का पता लगाया जा सके. प्राचार्य रांकावत ने बताया कि वर्तमान में औद्योगिक बायो-इथेनॉल पृथक्करण की ओर मेम्ब्रेन टेक्नोलॉजी पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है. राजकीय अभियांत्रिकी महाविद्यालय के रासायनिक अभियांत्रिकी (केमिकल इंजीनियरिंग) विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. पी. के. बर्नवाल के निर्देशन में कुछ समय पूर्व राहुल सुथार एवं प्रोजेक्ट टीम ने मेम्ब्रेन डिस्टिलेशन और पारवेपोरेशन को इथेनॉल से पानी को अलग करने का एक प्रभावी तरीका बताया है. यह एक ऊष्मा-प्रेरित (थर्मली-इंड्यूस्ड) प्रक्रिया है, जिसका इस्तेमाल फीड मिश्रण से आवश्यक घटकों को भौतिक रूप से अलग करने के लिए किया जाता है. इस टीम में राहुल सुथार के साथ कशिश त्रिवेदी, प्रेम, चैतन्य और गौरव शामिल रहे.

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पर्यावरण अनुकूल वैकल्पिक ईंधन: बायो-इथेनॉल एक सस्ता और पर्यावरण-अनुकूल वैकल्पिक ईंधन है, जो हाल ही में कई देशों में एक टिकाऊ ऊर्जा संसाधन के रूप में उभरा है. उनके अनुसार यह परीक्षण केमिकल और पेट्रोलियम इंजीनियरिंग विभाग के छात्रों की टीम ने किया है. इसमें इथेनॉल को पेट्रोल में मिलाने से उसकी गुणवत्ता में सुधार होने के साथ-साथ खपत में कमी आती है. इसके परिणामस्वरूप प्रदर्शन में सुधार, कम उत्सर्जन और बेहतर दक्षता जैसे सकारात्मक पहलू सामने आए हैं. डॉ. रांकावत के मुताबिक इंजीनियरिंग छात्रों का यह प्रयास नवाचार का एक उत्कृष्ट उदाहरण है. बाड़मेर जैसे क्षेत्र में तेल संसाधनों की मौजूदगी के बावजूद नवीकरणीय ऊर्जा पर ध्यान देना जरूरी है. बड़े स्तर पर परीक्षण कर हम उद्योग और सरकार के साथ सहयोग बढ़ाएंगे. यह पहल भारत की आत्मनिर्भर ऊर्जा और नेट जीरो के लक्ष्य (2070) की दिशा में युवा पीढ़ी के योगदान को दर्शाती है.

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इंजीनियरिंग कॉलेज शाखा के प्रभारी डॉ. पी. के. बर्नवाल के मुताबिक भारत जैसे देश में जहां कच्चे तेल का 85 प्रतिशत से अधिक आयात होता है, इथेनॉल गन्ना, मक्का और चावल जैसी फसलों से बनता है. यह नवीकरणीय स्रोत हैं. इसे पेट्रोल में मिलाकर इस्तेमाल करने से कई फायदे होते हैं. यह पर्यावरण अनुकूल होने के साथ-साथ इसके जलने पर कम कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन होता है, जिससे प्रदूषण कम होता है. उनके मुताबिक इससे आयात पर निर्भरता कम होने के साथ-साथ विदेशी तेल पर खर्च होने वाली मुद्रा की बचत होगी. इसके अलावा फसल आधारित उत्पादन से ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और किसानों को आर्थिक संबल मिलेगा.

अब तक आसवन प्रक्रिया का इस्तेमाल: डॉ. पी. के. बर्नवाल के मुताबिक पेट्रोल की गुणवत्ता में सुधार एवं खपत में कमी लाने के लिए बायो-इथेनॉल के उपयोग को लेकर यह महत्वपूर्ण परीक्षण किया गया है. इथेनॉल और पानी के जलीय मिश्रण से इथेनॉल को अलग करने के लिए अधिकतर आसवन प्रक्रियाओं का ही उपयोग किया जाता रहा है, लेकिन इस परीक्षण में इथेनॉल को अलग करने के लिए एक विशेष झिल्ली का संश्लेषण किया गया है. इथेनॉल को अलग करने के लिए झिल्ली के संश्लेषण में एक गैर-हानिकारक विलायक, डाइमिथाइल सल्फोक्साइड (डीएमएसओ) का उपयोग किया गया है. मेम्ब्रेन टेक्नोलॉजी के तहत विभिन्न प्रकार की झिल्लियों का संश्लेषण किया गया है, जिसका उपयोग इथेनॉल एवं जल के मिश्रण से 99.5 प्रतिशत इथेनॉल को अलग करने के लिए किया जा सकता है, जबकि मौजूदा समय में इथेनॉल के उत्पादन के लिए सामान्य आसवन (डिस्टिलेशन) का ही इस्तेमाल किया जाता है.