नक्सलगढ़ की बदलती तस्वीर: तीन गांवों में पहली बार खुले स्कूल, बैलाडीला के बच्चे लिखेंगे अपना भविष्य
नए शिक्षा सत्र 2026-27 के पहले दिन इन गांवों के 65 बच्चे औपचारिक शिक्षा से जुड़ेंगे और अपने उज्ज्वल भविष्य की ओर पहला कदम रखेंगे.

By ETV Bharat Chhattisgarh Team
Published : June 16, 2026 at 8:03 PM IST
दंतेवाड़ा: कभी नक्सल प्रभावित और विकास की मुख्यधारा से दूर माने जाने वाले मलांगिर क्षेत्र में अब बदलाव की नई कहानी लिखी जा रही है. वर्षों तक शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित रहे 3 दूरस्थ गांवों बड़ेपल्ली, लावा और बैंगपाल में आजादी के बाद पहली बार स्कूल शुरू हो रहे हैं. नए शिक्षा सत्र 2026-27 के पहले दिन इन गांवों के 65 बच्चे औपचारिक शिक्षा से जुड़ेंगे और अपने उज्ज्वल भविष्य की ओर पहला कदम रखेंगे.
नक्सलगढ़ की बदलती तस्वीर
छत्तीसगढ़ सरकार की “विकास, विश्वास और सुरक्षा” की नीति के तहत जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग लगातार जिले के अंतिम छोर तक शिक्षा का प्रकाश पहुंचाने का प्रयास लगातार जारी है. सुदूर बैलाडीला की दुर्गम पहाड़ियों के पीछे बसे इन तीनों गांवों तक आज भी पक्की सड़क नहीं पहुंच सकी है. बावजूद इसके शिक्षा विभाग ने हार नहीं मानी और बच्चों को स्कूल से जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाया, जिसका फायदा बच्चों को मिला.
तीन गांवों के बच्चों की बदलेगी तकदीर
इस अभियान की शुरूआत तब हुई, जब गर्मी की छुट्टियों के दौरान शिक्षा विभाग की टीम ने लगभग 15 किलोमीटर का कठिन और दुर्गम रास्ता पैदल तय कर इन गांवों का दौरा किया. अधिकारियों और शिक्षकों ने घर-घर जाकर सर्वे किया, स्कूल से दूर बच्चों की पहचान की और उनके अभिभावकों से चर्चा कर शिक्षा के महत्व को समझाया. इसके बाद बच्चों के दाखिले की प्रक्रिया मुकम्मल की गई. जिला शिक्षा अधिकारी प्रमोद ठाकुर ने बताया कि विभागीय सर्वेक्षण के दौरान बड़ेपल्ली, बैंगपाल और लावा गांवों के बच्चों को चिन्हित किया गया. बच्चों के जन्म प्रमाण पत्र सहित अन्य आवश्यक दस्तावेज तैयार कराए गए ताकि उन्हें बिना किसी बाधा के स्कूल से जोड़ा जा सके. नामांकन की प्रक्रिया के दौरान बड़ेपल्ली और बैंगपाल से 25-25 तथा लावा गांव से 15 बच्चों का प्रवेश कराया गया.

शिक्षा विभाग का लक्ष्य केवल बच्चों को स्कूल तक पहुंचाना नहीं, बल्कि उनके सपनों को साकार करने के लिए आवश्यक अवसर उपलब्ध कराना भी है. इन गांवों में शिक्षा के प्रति जागरूकता पहले से थी, लेकिन संसाधनों और सरकारी व्यवस्था के अभाव में बच्चों को नियमित शिक्षा नहीं मिल पा रही थी. ग्रामीणों ने अपने स्तर पर बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए. स्कूल भवन नहीं होने के कारण गांव वालों ने स्वयं खुले आसमान के नीचे झोपड़ीनुमा अस्थायी स्कूल बनाकर बच्चों को पढ़ाने की व्यवस्था की थी, जो ग्रामीणों की शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता को दिखाता है.

पहले मिट्टी की सड़क बनेगी फिर पक्की सड़क होगी
जिला प्रशासन के सहयोग से इन तीनों गांवों में औपचारिक शिक्षा की शुरुआत हो रही है. प्रशासन का कहना है कि आने वाले समय में यहां स्थायी स्कूल भवनों का निर्माण कराया जाएगा और बच्चों को सभी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी. अधिकारियों के अनुसार गांव तक पहुंचना अभी भी बेहद कठिन है, इसलिए सबसे पहले मिट्टी सड़क का निर्माण कराया जाएगा. इसके बाद शेडयुक्त और स्थायी स्कूल भवनों की स्थापना की जाएगी ताकि बच्चों को बेहतर शैक्षणिक वातावरण मिल सके.

8 हजार नए एडमिशन का लक्ष्य
मलांगिर क्षेत्र में शिक्षा की यह पहल केवल स्कूल खोलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक परिवर्तन का प्रतीक है जो वर्षों से संघर्ष कर रहे इस इलाके में धीरे-धीरे नजर आने लगा है. जिन बच्चों ने कभी किताबें और स्कूल केवल सुना था, वे अब खुद स्कूल की चौखट पर पहुंच रहे हैं. जिले में नए शिक्षा सत्र के लिए पहली कक्षा में लगभग 8 हजार नए एडमिशन का लक्ष्य रखा गया है. इसके साथ ही शिक्षा विभाग शाला त्यागी बच्चों को पुनः स्कूल से जोड़ने के लिए भी विशेष अभियान चला रहा है.

विकासखंड शिक्षा अधिकारी प्रमोद भदौरिया का बयान
विकासखंड शिक्षा अधिकारी प्रमोद भदौरिया ने बताया कि जिले में 6 से 18 वर्ष के 1706 स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की पहचान की गई. शिक्षा विभाग उन कारणों की जांच कर रहा है, जिनकी वजह से बच्चों ने पढ़ाई बीच में छोड़ दी. इसके अलावा आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में पलायन कर चुके परिवारों का भी डेटा तैयार किया गया है ताकि उनके बच्चों को पुनः शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा जा सके. दंतेवाड़ा के इन तीनों गांवों में स्कूलों की शुरुआत केवल एक प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि उम्मीद, बदलाव और नए भविष्य की कहानी है. जो यह साबित करता है कि यदि संकल्प मजबूत हो तो शिक्षा की रोशनी सबसे दुर्गम और पिछड़े क्षेत्रों तक भी पहुंचाई जा सकती है. नक्सलगढ़ की पहचान अब केवल संघर्ष नहीं, बल्कि शिक्षा और विकास की नई इबारत लिखने वाली धरती के रूप में उभर रही है.

