'भाजपा धर्म और संतों का सबसे ज्यादा सम्मान करने वाली पार्टी', भैराणा धाम मामले पर बोले अरुण चतुर्वेदी
राजस्थान वित्त आयोग अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी ने कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण में कहा कि भाजपा केवल राजनीतिक दल नहीं, बल्कि वैचारिक और कार्यकर्ता आधारित संगठन है.

Published : May 28, 2026 at 3:23 PM IST
कुचामनसिटी: भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं राजस्थान वित्त आयोग के अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी ने भैराणा धाम विवाद पर पलटवार किया है. उन्होंने कहा कि भाजपा धर्म और संतों का सबसे अधिक सम्मान करने वाली पार्टी है. रविवार को कुचामन सिटी में 'पंडित दीनदयाल उपाध्याय प्रशिक्षण महाअभियान-2026' के उद्घाटन में बोलते हुए चतुर्वेदी ने कहा कि भोराणा धाम मामले में कुछ लोग राजनीतिक लाभ लेना चाहते थे, लेकिन भाजपा सरकार ने संतों के सम्मान को सर्वोच्च रखते हुए समाधान कर दिया. उन्होंने कहा कि राज्य सरकार धार्मिक स्थलों के संरक्षण और विकास को समान प्राथमिकता देती है. साथ ही, सरकार युवाओं की बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर भी गंभीरता से काम कर रही है.
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार केवल धार्मिक आस्थाओं के संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि युवाओं की बेरोजगारी जैसी समस्याओं को लेकर भी गंभीरता से काम कर रही है. भाजपा का उद्देश्य विकास और सांस्कृतिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाए रखना है. सरकार ने संतों की भावनाओं का सम्मान करते हुए समाधान निकालने की दिशा में कदम बढ़ाए, जिसके बाद स्थिति शांत हुई. भाजपा अब इस पूरे मामले को 'संवाद और संत सम्मान' के जरिए सुलझाया गया विषय बता रही है.
प्रशिक्षण शिविर में अरुण चतुर्वेदी ने भाजपा की कार्यशैली और विचारधारा पर भी जोर दिया. उन्होंने कहा कि भाजपा केवल राजनीतिक दल नहीं बल्कि वैचारिक और कार्यकर्ता आधारित संगठन है, जिसकी परंपरा जनसंघ काल से लगातार जारी है. प्रशिक्षण वर्ग का उद्देश्य कार्यकर्ताओं को वैचारिक रूप से मजबूत बनाना और संगठनात्मक कार्यपद्धति से जोड़ना है. कार्यक्रम में भाजपा नागौर देहात जिलाध्यक्ष सुनीता माहेश्वरी, जिला महामंत्री डॉ. देवीलाल दादरवाल सहित जिलेभर के पदाधिकारी और कार्यकर्ता मौजूद रहे.
यह था मामला: भैराणा धाम क्षेत्र में धार्मिक स्थल और विकास कार्यों को लेकर उपजे विवाद के बाद मामला राजनीतिक रूप से काफी गरमा गया था. इस मुद्दे को लेकर RLP सुप्रीमो और नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल ने भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुए संत समाज और स्थानीय लोगों के पक्ष में आवाज उठाई थी. उन्होंने सरकार पर धार्मिक भावनाओं की अनदेखी करने के आरोप लगाए थे और आंदोलन को समर्थन दिया था. इसके बाद मामला लगातार राजनीतिक चर्चा का विषय बना रहा. विवाद बढ़ने के बाद प्रशासन, संत समाज और जनप्रतिनिधियों के बीच कई दौर की बातचीत हुई. अंततः सरकार ने संतों की भावनाओं का सम्मान करते हुए समाधान निकालने की दिशा में कदम बढ़ाए, जिसके बाद स्थिति शांत हुई.

