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हर साल बिहार के 30 हजार लोग 3 महीने के लिए कैद! प्राकृतिक आपदा या बड़ी लापरवाही?

मुजफ्फरपुर में बागमती नदी के बढ़ते जलस्तर के कारण 8 गांव के करीब 30 हजार लोग कैद हो जाते हैं. विवेक कुमार की रिपोर्ट..

BAGMATI RIVER IN MUZAFFARPUR
नाव पर जिंदगी (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Bihar Team

Published : July 1, 2026 at 6:21 PM IST

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मुजफ्फरपुर : बागमती नदी का जलस्तर बढ़ते ही मुजफ्फरपुर जिले के कटरा और औराई प्रखंड में बाढ़ का संकट गहराने लगा है. हर साल की तरह इस बार भी नदी किनारे बसे गांवों के लोगों की मुश्किलें बढ़ गई हैं. बाढ़ का पानी बढ़ने से हजारों परिवारों का जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है. 8 गांव के लगभग तीस हजार की आबादी हर साल 3 महीने अपने गांव में ही कैद हो जाते हैं. क्योंकि इनके आवागमन का एकमात्र चचरी पुल ध्वस्त हो जाता है.

सड़क और पुल-पुलिया जलमग्न: सड़कें, पुल-पुलिया और संपर्क मार्ग जलमग्न होने लगे हैं, जिससे कई गांवों का संपर्क प्रखंड मुख्यालय और बाजार से टूट गया है. इसका सबसे ज्यादा असर गरीब, मजदूर और किसान परिवारों पर पड़ रहा है, जिनकी रोजी-रोटी पहले से ही संघर्षपूर्ण है.

देखें ये रिपोर्ट (ETV Bharat)

एकमात्र सहारा बनी नाव: औराई प्रखंड के सरचिया पंचायत अंतर्गत मधुबन प्रताप और उसके आसपास के आठ गांवों के लोगों को चचरी पुल बह जाने के कारण समस्या झेलनी पड़ रही है. कुछ दिन पहले बागमती नदी के जलस्तर में अचानक वृद्धि हुई, जिसके कारण इन गांवों को जोड़ने वाला चचरी पुल बह गया. पुल टूटने के बाद अब गांव के लोगों के लिए आवागमन का एकमात्र सहारा नाव बची है. स्थिति इतनी गंभीर है कि ग्रामीणों को बीच नदी में बंधे एक तार के सहारे नाव से पार जाना पड़ रहा है.

8 गांव की तीस हजार की आबादी प्रभावित: ग्रामीणों के अनुसार मधुबन प्रताप, पटोरी टोला, बाड़ा बुजुर्ग, बाड़ा खुर्द, राघोपुर,चैनपुर , तरवन्ना, हरनी टोला इन आठ गांवों में करीब 30000 से अधिक लोग रहते हैं. सभी लोग रोजमर्रा के काम, बाजार जाने, इलाज कराने और बच्चों को स्कूल भेजने के लिए नाव पर निर्भर हैं. नदी में तेज बहाव के कारण हर सफर जोखिम भरा बन गया है. खासकर बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक है.

BAGMATI RIVER IN MUZAFFARPUR
ईटीवी भारत GFX (ETV Bharat)

नदी पार कर स्कूल जाते हैं बच्चे : कक्षा 9 की छात्रा चंदा हर दिन नाव से नदी पार कर स्कूल जाती है. उसके चेहरे पर डर साफ दिखता है, लेकिन उसके इरादे मजबूत हैं. चंदा कहती है कि नदी पार करते समय बहुत डर लगता है, लेकिन पढ़ाई छोड़ना विकल्प नहीं है. चंदा जैसी सैकड़ों छात्राएं और छात्र रोज इसी खतरे के बीच स्कूल पहुंच रहे हैं.

"मेरा सपना एक अधिकारी बनने का है ताकि अपने गांव और आसपास के इलाकों की तस्वीर बदल सकूं. मैं मानती हूं कि शिक्षा ही वह रास्ता है जिससे गांव की समस्याओं का समाधान निकलेगा."- चंदा, छात्रा

BAGMATI RIVER IN MUZAFFARPUR
ईटीवी भारत GFX (ETV Bharat)

स्थायी पुल बनाने की मांग: ग्रामीण सियाराम सहनी बताते हैं कि जब मौसम सूखा रहता है, तब चचरी पुल के सहारे लोग आसानी से आ-जा लेते हैं. लेकिन पुल टूटते ही नाव ही एकमात्र साधन रह जाता है. उन्होंने कहा कि करीब तीन महीने तक हर साल यही परेशानी बनी रहती है.

"आने-जाने में समय भी ज्यादा लगता है और नाविक को पैसे भी देने पड़ते हैं. सरकारी नाव की कोई व्यवस्था नहीं है. पूरा गांव निजी नावों के भरोसे है.अगर सरकार स्थायी पुल बना दे तो लोगों की बड़ी समस्या दूर हो सकती है."- सियाराम सहनी, ग्रामीण

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बागमती की तेज धार में चचरी पुल बहा (ETV Bharat)

मरीजों को होती है परेशनी: ग्रामीण महिला जंगलिया देवी कहती हैं कि बाढ़ के समय हर तरफ पानी ही पानी हो जाता है. घर से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है. अस्पताल जाना हो या इलाज कराना हो, हर काम जोखिम भरा हो जाता है.

"हर साल यही स्थिति बनती है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकलता. सरकार चुनाव के समय तो वादे करती है, लेकिन बाढ़ के दिनों में ग्रामीण खुद को अकेला महसूस करते हैं."- जंगलिया देवी, ग्रामीण महिला

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मवेशियों का चारा लाने से लेकर सभी कामों के लिए नदी पार करना मजबूरी (ETV Bharat)

बाहर निकलने का रास्ता बंद: अनुप्रिया देवी बताती हैं कि बरसात आते ही मजदूरी और रोजमर्रा के काम पर असर पड़ जाता है. गांव से बाहर निकलने का रास्ता बंद हो जाता है. मजदूर काम पर नहीं जा पाते, जिससे परिवार की आय रुक जाती है.

"पुल नहीं होने से लोगों को मजबूरी में जान जोखिम में डालकर नाव से सफर करना पड़ता है. गरीब परिवारों के सामने दोहरी मार पड़ती है. एक तरफ बाढ़, दूसरी तरफ बेरोजगारी की समस्या होती है."- अनुप्रिया देवी,ग्रामीण महिला

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परिचालन का एकमात्र साधन नाव (ETV Bharat)

लाखों खर्च कर बनाते हैं चचरी पुल: पिछले 25 वर्षों से नाव चलाने वाले दिनेश सहनी कहते हैं कि हर साल यही कहानी दोहराई जाती है. चचरी पुल बनने में ग्रामीण दो से तीन लाख रुपये तक खर्च करते हैं, लेकिन बाढ़ का तेज बहाव कुछ ही दिनों में उसे बहा ले जाता है. दिनेश कहते हैं कि रात-रात भर जागकर लोगों को नदी पार कराना पड़ता है, क्योंकि कभी भी कोई बीमार पड़ सकता है या अचानक किसी को अस्पताल ले जाना पड़ सकता है.

"आठ गांवों का यही मुख्य रास्ता है, लेकिन न कोई जनप्रतिनिधि आता है और न कोई स्थायी व्यवस्था की जाती है. आखिर हम ऐसे कब तक परेशानी झेलते रहेंगे."- दिनेश सहनी, नाविक

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नाव बना सहारा (ETV Bharat)

जलस्तर बढ़ा तो..: सरोज सहनी बताते हैं कि चचरी पुल टूटने के बाद गांव पूरी तरह नाव पर निर्भर हो गया है. उन्होंने कहा कि अभी पानी कम है, इसलिए लोग किसी तरह नाव से आ-जा रहे हैं. लेकिन अगर जलस्तर और बढ़ा तो नाव से सफर करना भी मुश्किल हो जाएगा.

"ऐसे में पूरा गांव मानो कैद होकर रह जाएगा. अगर कोई अचानक बीमार पड़ जाए तो उसे अस्पताल पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है. कई बार सुबह निकला व्यक्ति देर शाम तक वापस लौट पाता है."- सरोज सहनी, ग्रामीण

कटरा और औराई के बाढ़ प्रभावित इलाकों में हर साल यही त्रासदी दोहराई जाती है. खेती-बाड़ी प्रभावित होती है, पशुपालन पर असर पड़ता है और छोटे कारोबार ठप हो जाते हैं. स्कूल जाने वाले बच्चे, मजदूर, किसान, महिलाएं और बुजुर्ग, हर कोई इस प्राकृतिक आपदा की मार झेलता है. बावजूद इसके अब तक स्थायी पुल या सुरक्षित आवागमन की कोई ठोस व्यवस्था नहीं हो सकी है.

BAGMATI RIVER IN MUZAFFARPUR
8 गांव के लोग प्रभावित (ETV Bharat)

समस्याओं का अंत कब?: बागमती की बढ़ती धार ने एक बार फिर प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर कब तक ग्रामीण जान जोखिम में डालकर नाव के सहारे जिंदगी जीने को मजबूर रहेंगे? फिलहाल मधुबन प्रताप समेत आठ गांवों के लोग एक स्थायी पुल और सुरक्षित रास्ते की उम्मीद लगाए बैठे हैं.