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NEET छात्रा मौत मामले से अब उठेगा पर्दा? CBI ने दर्ज की FIR

बिहार सरकार के सिफारिश के 12 दिन बाद नीट छात्रा मौत मामले में सीबीआई एक्शन में आई है और FIR दर्ज किया गया है.

patna NEET student death case
NEET छात्रा मौत मामले में CBI की एंट्री (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Bihar Team

Published : February 12, 2026 at 7:37 PM IST

6 Min Read
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पटना: बिहार के पटना के चर्चित NEET छात्रा मौत मामले में अब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की औपचारिक एंट्री हो गई है. गुरुवार को CBI ने इस मामले में पटना में एफआईआर दर्ज कर जांच अपने हाथ में ले ली. राज्य सरकार ने 31 जनवरी को ही मामले की जांच CBI से कराने की सिफारिश की थी.

12 दिन बाद CBI की एंट्री: सिफारिश के करीब 12 दिन बाद केंद्रीय एजेंसी ने केस दर्ज कर कार्रवाई शुरू कर दी है. इससे पहले 22 दिनों तक चली SIT जांच किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच सकी थी, जिसके बाद जांच की दिशा और निष्पक्षता पर लगातार सवाल उठ रहे थे.

जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल: यह मामला शुरू से ही संवेदनशील रहा है और जांच के अलग-अलग चरणों में कई थ्योरी सामने आती रही है. पहले इसे आत्महत्या की आशंका से जोड़ा गया, फिर संदिग्ध मौत और बाद में यौन उत्पीड़न की आशंका भी जांच के दायरे में आई. केस की दिशा बार-बार बदलने से जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े हुए.

22 दिन की SIT जांच बेनतीजा: मामले की जांच के लिए गठित SIT करीब 22 दिनों तक जांच करती रही, लेकिन अपराध कब, कहां और किस परिस्थिति में हुआ, इसे लेकर स्पष्ट निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सकी. किसी भी गंभीर आपराधिक मामले में शुरुआती 48 से 72 घंटे बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं, लेकिन इस केस में शुरुआती चरण में ही जांच की दिशा को लेकर भ्रम बना रहा.

जांच के दौरान SIT की थ्योरी कई बार बदली. पहले आत्महत्या की बात कही गई, फिर परिस्थितियां संदिग्ध बताई गईं और बाद में मेडिकल संकेतों के आधार पर यौन हिंसा की आशंका भी सामने आई. इस बदलाव ने जांच की विश्वसनीयता पर असर डाला और पीड़ित परिवार ने भी जांच से असंतोष जताया.

DNA जांच भी नहीं दे सकी दिशा: जांच में DNA मिलान को एक अहम कड़ी माना जा रहा था. SIT ने 18 लोगों के DNA सैंपल लिए थे, जिनमें हॉस्टल संचालक, उसके परिजन, स्टाफ और अन्य जुड़े लोग शामिल थे, लेकिन सभी सैंपल मैच नहीं हुए. इससे जांच टीम को अपेक्षित सफलता नहीं मिली.

विशेषज्ञों के अनुसार, DNA साक्ष्य मजबूत कड़ी हो सकता है, लेकिन वही अंतिम और एकमात्र आधार नहीं होता. यदि सैंपलिंग, संरक्षण या सीन मैनेजमेंट में कमी रह जाए तो रिपोर्ट निष्कर्ष तक नहीं पहुंचा पाती. यही कारण है कि DNA रिपोर्ट के फेल होने के बाद जांच लगभग ठहरती हुई दिखी.

AIIMS रिपोर्ट का इंतजार: मामले में मेडिकल और फॉरेंसिक राय के लिए AIIMS से विशेषज्ञ रिपोर्ट मांगी गई थी. कई अहम सवाल, मौत का कारण, शरीर पर मिले चोट के संकेत, मेडिकल प्रक्रिया के प्रभाव, इन सबका जवाब विशेषज्ञ राय से ही स्पष्ट होना था, लेकिन अब तक यह रिपोर्ट जांच टीम को प्राप्त नहीं हो सकी थी.

रिपोर्ट आने से पहले केस ट्रांसफर: परिवार और जनप्रतिनिधियों का आरोप था कि SIT समय पर जरूरी दस्तावेज और मेडिकल सामग्री विशेषज्ञ संस्थान को उपलब्ध नहीं करा सकी. इसी बीच, बिना अंतिम विशेषज्ञ रिपोर्ट का इंतजार किए केस CBI को ट्रांसफर कर दिया गया.

सीन ऑफ क्राइम मैनेजमेंट पर भी उठे सवाल: जांच के शुरुआती चरण में घटनास्थल को समय पर सील न करने और सबूतों के संरक्षण में देरी को लेकर भी सवाल उठे. आरोप है कि हॉस्टल के कमरे को तुरंत सील नहीं किया गया, जिससे संभावित साक्ष्य प्रभावित हुए. CCTV और DVR की फॉरेंसिक जांच भी देर से शुरू हुई.

CCTV फुटेज में गैप: फॉरेंसिक जांच में देरी किसी भी केस को कमजोर कर सकती है, क्योंकि डिजिटल और भौतिक साक्ष्य समय के साथ बदल सकते हैं या नष्ट हो सकते हैं. यही वजह है कि इस मामले में शुरुआती चूक को गंभीर माना जा रहा है. जांच के दौरान 5 जनवरी की रात से 6 जनवरी की दोपहर तक का समय सबसे महत्वपूर्ण माना गया. यही वह अवधि बताई जा रही है जब छात्रा हॉस्टल पहुंची और परिवार से अंतिम बार बात हुई, लेकिन इस पूरे समय खंड का स्पष्ट CCTV ट्रेल जांच टीम के पास उपलब्ध नहीं हो पाया.

परिवार ने लगाया दबाव और पक्षपात का आरोप: यह भी स्पष्ट नहीं हो सका कि कमरे में कौन-कौन आया गया और दरवाजा कब व किसने खोला. फुटेज की अस्पष्टता ने जांच को और जटिल बना दिया. पीड़ित परिवार ने SIT जांच पर गंभीर आरोप लगाए. उनका कहना है कि शुरू से ही मामले को आत्महत्या मानने का दबाव बनाया गया. परिवार ने यह भी आरोप लगाया कि उनसे बार-बार पूछताछ की गई, लेकिन सुरक्षा और संवेदनशील व्यवहार नहीं मिला.

परिवार का यह भी कहना है कि बाहरी संदिग्धों की बजाय जांच का फोकस रिश्तेदारों और नजदीकी लोगों पर ज्यादा रहा. इससे जांच की दिशा पर सवाल खड़े हुए. परिवार की शिकायतों के बाद ही सरकार ने CBI जांच की सिफारिश की.

अस्पताल से मिले संकेतों को देर से जोड़ा गया: इलाज के दौरान मेडिकल स्टाफ ने कुछ संदिग्ध संकेत नोट किए थे, लेकिन परिवार का आरोप है कि इन संकेतों को जांच की शुरुआती थ्योरी में शामिल नहीं किया गया. बाद में पोस्टमार्टम और फॉरेंसिक रिपोर्ट के कुछ बिंदुओं ने मामले को और गंभीर बना दिया. आलोचना यह भी हुई कि प्रारंभिक चरण में मेडिकल इनपुट को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया, जिससे जांच की दिशा प्रभावित हुई.

CBI जांच से बढ़ी निष्पक्षता की उम्मीद: अब CBI द्वारा FIR दर्ज किए जाने के साथ केस की जांच नए सिरे से शुरू होगी. CBI आमतौर पर केस डायरी, फॉरेंसिक साक्ष्य, डिजिटल डेटा, मेडिकल रिपोर्ट और गवाहों के बयान की स्वतंत्र समीक्षा करती है. संभावना है कि केंद्रीय एजेंसी फिर से सीन रिकंस्ट्रक्शन, तकनीकी विश्लेषण और विशेषज्ञ राय के आधार पर जांच आगे बढ़ाएगी.

राज्य सरकार का कहना है कि पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए ही मामला CBI को सौंपा गया है. वहीं परिवार ने CBI जांच का स्वागत करते हुए निष्पक्ष और समयबद्ध कार्रवाई की मांग की है. अब सबकी नजर CBI की जांच पर टिकी है कि वह इस संवेदनशील मामले में तथ्यों की कड़ी जोड़कर सच्चाई सामने ला पाती है या नहीं.

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