यूपी में 40 गांवों के 4112 लोगों पर क्यों दर्ज हुए चुन-चुनकर मुकदमे, जानिए थारू समुदाय का क्या है गुनाह?
ETV Bharat Explainer: जंगल का हक मांगा तो कानून की लाठी पड़ी, करीब 13 साल से न्याय के लिए लगा रहे कोर्ट-कचहरी के चक्कर

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : November 8, 2025 at 3:49 PM IST
|Updated : November 12, 2025 at 5:00 PM IST
लखीमपुर खीरी: प्रदेश के तराई क्षेत्रों में घने जंगलों और दुधवा की हरियाली के बीच बसे थारू समुदाय के लोग बेरोजगारी, अशिक्षा के साथ मुकदमे की बेड़ियों में जकड़े हुए हैं. 1-2 लोग नहीं बल्कि 40 गांवों में रहने वाले 4 हजार से अधिक लोगों पर मुकदमे दर्ज हैं. आइए जानते हैं कि खेती और जंगलों पर आधरित रहने वाले इन लोगों का क्या कसूर है?
लखीमपुर खीरी जिले के पलिया तहसील क्षेत्र में जंगल के किनारे बसे सरिया पारा, सूडा, बेरिया पारा, बनकटी सहित 40 गांव में रहने वाले 4112 थारू समाज के लोगों के खिलाफ 2012 से लेकर 2016 तक वन विभाग द्वारा मुकदमे दर्ज किए गए हैं. इनमें वो लोग भी शामिल हैं, जो जन्म से मंदबुद्धि और नेत्रहीन हैं. लगातार कोर्ट से समन जारी होने के कारण ग्रामीण परेशान हैं. इन ग्रामीणों को केस से मुक्ति दिलाने के लिए पलिया विधायक रोमी साहनी ने पहल की है. विधायक ने कुछ ग्रामीणों के साथ सीएम योगी से मुलाकात कर न्याय की गुहार लगाई है.
क्यों दर्ज हुए मुकदमे?
पलिया के भाजपा विधायक रोमी साहनी ने बताया कि 2012 में बड़े पैमाने पर थारू समुदाय के लोगों के खिलाफ केस दर्ज किए गए थे. क्योंकि थारू संघ की तरफ से अपने वन अधिकारों की कानूनी मान्यता की मांग करने वाली याचिका कोर्ट में दायर की थी. याचिका पर सुनवाई चल रही थी तभी एक समूह ने गिरी हुई लकड़ी इकट्ठा करने के लिए जंगल में प्रवेश किया था. जिसके बाद वन विभाग ने मतदाता सूची ली और उसी के अनुसार मामला दर्ज कर लिया. साहनी ने बताया कि उस समय न केवल उन लोगों के खिलाफ मामले दर्ज किए जो जंगल में गए थे, बल्कि उन लोगों के खिलाफ केस दर्ज किए गए जो कभी घर से बाहर नहीं निकल पाते हैं. शारीरिक रूप से अक्षम और मृत लोगों के खिलाफ भी आरोपी बना दिया.
2012 में दायर की थी याचिकाः सरिया पारा गांव के ग्राम प्रधान रामबहादुर ने बताया कि 2006 में वन अधिकार नियम यानी फॉरेस्ट राइट एक्ट लागू हुआ था. जो अनुसूचित जातियों और वनवासियों को आवास खेती और वन उपयोग के कानूनी अधिकार देने के उद्देश्य से अधिनियम बनाया गया है. थारू समाज और वनवासी लोगों ने वन संघ के बैनर तले 2012 में वन अधिकार अधिनियम के अधिकारों को लेकर कोर्ट में याचिका दायर की थी. इसके साथ ही वन अधिकार को लेकर विरोध दर्ज किया था और ग्रामीणों के साथ मिलकर प्रदर्शन किया था. जिसके चलते वन विभाग द्वारा वोटर लिस्ट में अंकित सरियापारा, कीरतपुर, बनीगवां, सेढ़ाबेड़ा, बनकटी, पिछली छेदिया, बेरिया, ढखिया ,जयनगर, मसानखम, नजोटा समेत 40 गांव के 4112 थारू समाज और वनवासी लोगों के खिलाफ मामले दर्ज किए थे.

मुकदमों पर खर्च किए 9 लाख रुपयेः राम बहादुर ने बताया कि उनके गांव की आबादी लगभग 1,500 है. इनमें कम से कम 375 लोगों को भारतीय वन अधिनियम और वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों के तहत बुक किया गया था. राम बहादुर ने बताया कि उनके खिलाफ 29 मामले दर्ज हैं, जिनमें से 26 में जमानत मिल चुकी है. अब कानूनी खर्चों पर 9 लाख रुपये से अधिक खर्च कर चुका हूं. 3.5 लाख रुपये उधार लेने पड़े. उन्होंने बताया कि सरिया पारा गांव के 72 लोगों के खिलाफ 2012 में उप निदेशक दुधवा टाइगर रिजर्व प्रभाग पलिया लखीमपुर खीरी और क्षेत्रीय वनाधिकारी बनकटी रेंज दुधवा टाइगर रिजर्व प्रभाग पलिया में गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया गया था. उन्होंने बताया कि सरिया पर गांव के 10 ग्रामीणों की मौत हो चुकी है फिर भी वारंट आ रहा है.
मंदबुद्धि और नेत्रहीन को बना दिया आरोपीः सरिया गांव निवासी गुलाबो देवी ने बताया कि उनके चार बेटों पर मामले दर्ज हैं. उनका एक बेटा राम भजन जो जन्म से नेत्रहीन है और दूसरा रज्जन जन्म से मंदबुद्धि है. राम भजन जब जन्म से नेत्रहीन है तो क्या वह लकड़ी काटकर घर ला पाएगा. वह खुद घर में एक लाठी और उसके सहारे चलता है. दूसरा पुत्र मंदबुद्धि है, जिसे अपने शरीर की चिंता नहीं और उसे बेड़ियों में बांधकर रखना पड़ता है. मंदबुद्धि रंजन पर अवैध रूप से पेड़ काटने का आरोप लगा है. गुलाबो देवी ने कहा कि उन्हें जब लकड़ी की जरूरत होती है तो वह बनकटी जाकर रेंजर से मिलकर उनसे गुहार लगाती है. यदि वह लकड़ी भी लेने की अनुमति देते हैं तो वह लकड़ी बीनती है. गुलाबो देवी का कहना है कि झूठे मुकदमे में फंसा दिया गया है.
चल नहीं पाता तो पेड़ पर कैसे चढ़ूंगाः सरिया पारा गांव के 55 वर्षीय हर दयाल सिंह पर पेड़ों पर बने पक्षियों के घोसले को नष्ट करने का आरोप लगा है और मामला दर्ज हुआ है. हरदयाल ने बताया कि उन्हें रीढ़ की हड्डी की पुरानी बीमारी है. मुझ पर पेड़ पर चढ़ाई कर घोसले नष्ट करने का आरोप लगाया है, जो शायद मैं अगले जन्म में कर पाऊं. अभी मैं मुश्किल से खड़ा हो पाता हूं. वहीं, 70 वर्षीय बदना देवी ने कहा कि उन पर शराब और जंगली मांस बेचने का आरोप लगाया गया है. उन्होंने कहा कि अगर हम अपनी आवाज उठाते हैं या अधिकारियों के आने पर पैसे देने पर इनकार करते हैं तो हमें नए मामलों की धमकी दी जाती है. ग्रामीणों ने बताया कि उन पर मुकदमा दर्ज होने से पहले कोई सूचना नहीं दी गई थी.

सीएम योगी से मिले ग्रामीण और विधायकः पलिया विधानसभा के भाजपा विधायक रोमी साहनी का कहना है कि समाजवादी पार्टी की जब सरकार थी, उस दौरान वोटर लिस्ट के आधार पर गए बगैर जांच किए मुकदमे दर्ज किए गए थे. पीड़ितों की समस्याओं को लेकर उन्होंने 28 अक्टूबर को मुख्यमंत्री आवास पर ग्रामीणों के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की और जांच कर दर्ज मामले वापस लेने की मांग की गई है.यह मामले वापस करने के लिए उन्हें जिस हद तक जाना होगा, वह जाएंगे और निर्दोष लोगों न्याय दिलाएंगे.
वन विभाग कर रहा समीक्षाः दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड निदेशक राजा मोहन ने बताया कि मामला संज्ञान में आया है और वह सभी मुकदमे की जांच कर रहे हैं. हालांकि पहले चार्जशीट दाखिल की गई थी, विभाग अब मामले की समीक्षा कर रहा है. समीक्षा के बाद टिप्पणी करेंगे. 2012 से लेकर 2016 तक मुकदमे दर्ज किए गए हैं. नेत्रहीन, मंदबुद्धि और दिव्यांग लोगों पर केस दर्ज हुए हैं, इसको लेकर कमेटी बनाकर फिर से चार्ज कराएंगे. सरकारी वकील से राय लेकर इस मामले में आगे की कार्रवाई करेंगे. इन सभी लोगों को समन जा रहे हैं, इसलिए परेशान हैं. सभी लोग कोर्ट से रिहा होंगे.
केस वापस लेने की क्या है प्रक्रिया?
बता दें कि वन अधिनियम की धारा ,11,27,35,161 और 511 वापस लिया जा सकता है. लेकिन धारा 9 शिकार से जुड़ा हुआ मामला है और इस धारा में दर्ज मुकदमा तभी वापस लिया जा सकता है, जब राज्य सरकार या लोक अभियोजक या न्यायालय की अनुमति से धारा 321 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत वन अधिकारी या अभियोजन अधिकारी को आवेदन दिया जाता है. इसके साथ ही बताया जाता है कि मामला समझौते गलतफहमी या समाधान से निपट गया है.

तराई इलाकों में रहते हैं थारू समुदाय के लोगः गौरतलब है कि थारू समुदाय उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार और दक्षिणी नेपाल के तराई क्षेत्र में रहते हैं. यूपी में लखीमपुर खीरी, बहराइच, बलरामपुर और श्रावस्ती जिलों में निवास करते हैं. 1977 में दुधवा को राष्ट्रीय उद्यान और 1988 में बाघ अभयारण्य घोषित किए जाने के बाद कई थारू गांव संरक्षित वन क्षेत्रों के भीतर या साथ में आ गए, जिससे भूमि और संसाधनों तक उनकी पहुंच समाप्त हो गई. 2011 की जनगणना के अनुसार, थारू जनजाति कुल एसटी आबादी का 77.4 प्रतिशत (लगभग 83,544) है. थारू समुदाय कृषि और वन-आधारित आजीविका पर निर्भर है. इनकी संस्कृति में मातृसत्तात्मक परंपराएं प्रमुख हैं, जहां महिलाओं की भूमिका मजबूत होती है. जड़ी-बूटियों की विशेषज्ञता के लिए प्रसिद्ध हैं और पारंपरिक चिकित्सा में कुशल होते हैं. दशहरा, दीवाली और कन्हैया अष्टमी पर उनके लोक नृत्य 'खयाल' और 'छुरा' जीवंत हो उठते हैं. साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से कम (55.7 प्रतिशत) है.
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