बिहार के इस अस्पताल में नहीं है डॉक्टर, 30 सालों से लापता.. कब भरे जाएंगे स्पेशलिस्ट 102 पद?
बक्सर में 30 डॉक्टर सालों से लापता हैं और मरीजों के इलाज के लिए कुल 355 में से 159 डॉक्टर उपलब्ध हैं. रिपोर्ट- उमेश पांडे

Published : September 1, 2026 at 12:17 PM IST
बक्सर: बिहार सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए स्वास्थ्य विभाग के लिए ₹21,270.40 करोड़ का बजट प्रस्तावित किया है. इसके तहत सरकार का दावा है कि हर नागरिक को बेहतर और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है. हालांकि, बिहार के बक्सर से इन दावों के उलट पूरी व्यवस्था और सरकारी दावों पर सवाल उठाती तस्वीर सामने आई है.
व्यवस्था से लड़ने को मजबूर लोग: दरअसल जिले में सरकारी अस्पताल की चौखट पर पहुंचा गरीब मरीज बीमारी से कम और व्यवस्था से लड़ने को ज्यादा मजबूर है. जिले की आबादी करीब 28 लाख है और सामान्य दिनों में औसतन करीब एक हजार मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं.

डॉक्टर के पास वक्त नहीं: किसी के हाथ में पुरानी जांच रिपोर्ट है, किसी की आंखों में इलाज की उम्मीद, तो किसी के साथ बीमार बच्चा है. सामने डॉक्टरों के कमरे के बाहर लंबी कतार है और भीतर मरीजों की संख्या इतनी कि डॉक्टर के पास हर मरीज को सुनने के लिए वक्त ही नहीं.
डॉक्टरों की कमी से मरीज परेशान: सिविल सर्जन डॉ शिव कुमार प्रसाद चक्रवर्ती की माने तो 30 ऐसे सरकारी डॉक्टर है, जो बिना किसी सूचना के कोई पांच साल से तो कोई चार और तीन साल से गायब है. ऐसे में जिले भर में डॉक्टरों की घोर कमी से जूझ रहे मरीज परेशान हैं. जिले में कुल सरकारी अस्पतालों की संख्या पर नजर डालें तो यहां 7 पीएचसी, 4 सीएचसी, 28 एपीएचसी, 160 एचएससी, एक अनुमंडलीय अस्पताल और एक सदर अस्पताल है.

जिले में कुल डॉक्टरों के स्वीकृत पद: सिविल सर्जन के मुताबिक जिले में 156 सामान्य चिकित्सा पदाधिकारी के पद हैं, जिसमें से मात्र 76 पूरे जिले में उपलब्ध हैं. वहीं स्पेशलिस्ट चिकित्सकों के 122 पद स्वीकृत हैं, जिसमें से मात्र 20 उपलब्ध हैं. दंत चिकित्सकों के कुल 27 पद स्वीकृत हैं, जिसमें से 10 उपलब्ध हैं.आयुष चिकित्सकों के 50 पद स्वीकृत हैं, जिसमें से 43 उपलब्ध हैं. उन्होंने बताया कि अभी पूरे जिले में जनरल फिजिशियन एवं स्पेशलिस्ट चिकित्सकों की संख्या कुल 96 है, जिसमें से 30 डॉक्टर नदारद हैं.
दावों से उलट हकीकत: जिले में शेष बचे चिकित्सकों के बदौलत ही सरकार के आदेश पर कैंप भी लगाया जा रहा है, जिसके कारण अस्पताल आने वाले मरीजों को परेशानी हो रही है. 28 लाख की आबादी को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा देने के लिए दर्जनों छोटे बड़े सरकारी अस्पतालों में करोड़ों रुपये खर्च कर मशीनें और तमाम चिकित्सा संसाधन लगाए गए हैं. सरकार का दावा है कि आम आदमी को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उसके नजदीक मिले इसके लिए पूरी व्यवस्था की गई है. लेकिन जमीन पर तस्वीरें बिल्कुल अलग हैं.

रोजाना औसतन करीब एक हजार मरीज: सिविल सर्जन की माने तो बक्सर सदर अस्पताल में सामान्य दिनों में औसतन करीब एक हजार मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं. जनरल मेडिसिन में एक डॉक्टर को 300 से अधिक मरीज देखने पड़ते हैं. वही हड्डी विभाग में करीब 150, सर्जरी में करीब 50, स्त्री रोग विभाग में 100 से अधिक, आंख विभाग में करीब 50 और मानसिक रोग विभाग में 60 से 70 मरीजों का दबाव केवल एक-एक चिकित्सक पर है.
"बक्सर सदर अस्पताल में सामान्य दिनों में औसतन करीब एक हजार मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं. जनरल मेडिसिन में एक डॉक्टर को 300 से अधिक मरीज देखने पड़ते हैं. वही हड्डी विभाग में करीब 150, सर्जरी में करीब 50, स्त्री रोग विभाग में 100 से अधिक, आंख विभाग में करीब 50 और मानसिक रोग विभाग में 60 से 70 मरीजों का दबाव केवल एक-एक चिकित्सक पर है."- डॉ शिव कुमार प्रसाद चक्रवर्ती, सिविल सर्जन, बक्सर
प्रति मरीज 45-50 सेकेंड का समय: सिविल सर्जन डॉ शिव कुमार ने कहा कि इन हालातों में सीमित समय के अंदर ही सारे मरीजों को देख लेना चिकित्सकों की भी मजबूरी है. ऐसे में आप भी अंदाजा कर सकते है कि इलाज किस तरह हो पा रहा है. मरीजों की संख्या और उपलब्ध डॉक्टरों के हिसाब से एक चिकित्सक के पास एक मरीज की तकलीफ सुनने, जांच देखने और दवा लिखने तक के लिए औसतन महज 45 से 50 सेकेंड का ही समय मिलता है.
ग्रामीणों का सवाल: सदर अस्पताल में पहुंची महिला मरीज विद्यावती देवी कहती हैं कि ग्रामीण इलाके से पैसा खर्च कर सुबह से घंटों लाइन में लगकर पर्ची कटाई. उम्मीद थी कि डॉक्टर से अपनी समस्या बताऊंगी, लेकिन डॉक्टर है ही नहीं. आखिर हमारा इलाज डॉक्टर करेंगे या बिल्डिंग!
"ग्रामीण इलाके से पैसा खर्च कर सुबह से घंटों लाइन में लगकर पर्ची कटाई. उम्मीद थी कि डॉक्टर से अपनी समस्या बताऊंगी, लेकिन डॉक्टर है ही नहीं. आखिर हमारा इलाज डॉक्टर करेंगे या बिल्डिंग"- विद्यावती देवी,मरीज

मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए परेशानी: वहीं, पति का मृत्यु प्रमाण पत्र लेने चुरामनपुर से चलकर सदर अस्पताल पहुंची श्यामा देवी कहती हैं कि अपने पति का मृत्यु प्रमाण पत्र लेने के लिए महीनों से सदर अस्पताल का चक्कर लगा रही हूं, लेकिन हर बार केवल एक ही जवाब मिलता है कि नहीं बना है. वहीं, उनके परिजन ओम प्रकाश कहते हैं कि अराजकता की स्थिति है. लगता है कि इस बुजुर्ग महिला को मृत्यु प्रमाण पत्र तभी मिलेगा, जब इसकी भी दौड़ते-दौड़ते मौत हो जाएगी.
"अपने पति का मृत्यु प्रमाण पत्र लेने के लिए महीनों से सदर अस्पताल का चक्कर लगा रही हूं, लेकिन हर बार केवल एक ही जवाब मिलता है कि नहीं बना है."- श्यामा देवी, पीड़ित महिला

नहीं मिले हड्डी के डॉक्टर: वहीं, 30 किलोमीटर दूर नियाजीपुर से अपना इलाज कराने पहुंचे वीरेंद्र पाठक ने बताया कि वह खुद का एवं अपने बेटे का इलाज कराने के लिए आए थे. पर्ची कटी, तो डॉक्टर नदारद थे. सदर अस्पताल आने वाले अधिकांश मरीजों की यह शिकायत थी कि जिस डॉक्टर से दिखाने के लिए वे आए थे, वह डॉक्टर ही नहीं मिले.
"खुद का एवं अपने बेटे का इलाज कराने के लिए आए थे. पर्ची कटी, तो डॉक्टर नदारद थे. जिस डॉक्टर से दिखाने के लिए वे आए थे, वह डॉक्टर ही नहीं मिले.अराजकता की स्थिति हो गई है. कोई देखने वाला ही नहीं है."- वीरेंद्र पाठक, मरीज
बच्चों का विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध नहीं: सदर अस्पताल के डीएस डॉ. अमलेश कुमार के अनुसार अस्पताल में बच्चों का विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध ही नहीं है. वे खुद सदर अस्पताल के साथ ही साथ एसएनसीयू में भी बच्चों का इलाज करते हैं. बाकी बच्चों को इमरजेंसी में तैनात डॉक्टरों से इलाज कराना पड़ता है. अस्पताल में 4 डॉक्टरों की कमी से हालात बदहाल हैं.
बिना सूचना के 30 डॉक्टर गायब: स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे हैरान कर देने वाली बात ये है बिना सूचना के जो 30 डॉक्टर चार- पांच सालों से गायब हैं वे सभी कागजों पर जिले के सरकारी अस्पतालों में तैनात है. विभाग एवं मंत्रालय को कार्रवाई करने के लिए कई बार सरकारी पत्र एवं रिमाइंडर भेजा गया लेकिन उन चिकित्सकों के आगे सारे सरकारी पत्र बेअसर साबित हुए और अब तक कोई कार्रवाई नही हुई.
कार्रवाई की अनुशंसा पर भी कोई एक्शन नहीं: सीएस डॉ. शिव कुमार प्रसाद चक्रवर्ती के अनुसार ऐसे चिकित्सकों के खिलाफ कार्रवाई के लिए सरकार और विभाग को कई पत्र भेजे गए हैं.हाल में फिर रिमाइंडर भेजा गया है,उसके बाद भी कोई कार्रवाई नही हुई. सभी को यही लगता है कि कागजों पर इतने डाक्टर बक्सर में सेवा दे रहे है. लेकिन क्या हालात है,यह तो उपलब्ध चिकित्सक ही जानते है.

"लापता चिकित्सकों के खिलाफ कार्रवाई के लिए सरकार और विभाग को कई पत्र भेजे गए हैं.हाल में फिर रिमाइंडर भेजा गया है,उसके बाद भी कोई कार्रवाई नही हुई. सभी को यही लगता है कि कागजों पर इतने डाक्टर बक्सर में सेवा दे रहे है."- डॉ शिव कुमार प्रसाद चक्रवर्ती, सिविल सर्जन, बक्सर
कई सेवाएं आउटसोर्सिंग के जरिए संचालित: मिली जानकारी के अनुसार सदर अस्पताल में कई सेवाएं आउटसोर्सिंग के जरिए संचालित हैं. लैब, एक्स-रे, सीटी स्कैन, एंबुलेंस, भोजन, डायलिसिस, ईसीजी और डेटा ऑपरेटर जैसी सेवाओं में निजी एजेंसियों की भूमिका है. आउटसोर्सिंग अपने आप में गलत नहीं है लेकिन निगरानी के अभाव में व्यवस्था लचर है जिसका खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ता है.
शिशु चिकित्सा इकाई भी बंद: बक्सर के पुराने सदर अस्पताल परिसर में करोड़ों रुपये की लागत से तैयार गहन शिशु चिकित्सा इकाई भी अपने-आप में कई सवाल उठा रही हैं. भवन बना, मशीनें लगीं, पैसा खर्च हुआ. उम्मीद जगी कि गंभीर बीमार बच्चों को बेहतर इलाज मिलेगा. लेकिन वर्षों गुजर गए लेकिन अस्पताल के गेट खुलने का इंतजार खत्म नहीं हुआ. लापरवाही का आलम ये हैं कि असामाजिक तत्व वहां से एसी तक उखाड़ ले गए हैं.

जवाबदेही की कमी: बक्सर के सरकारी अस्पताल में डॉक्टर भी हैं, मरीज भी हैं, मशीनें भी हैं और करोड़ों रुपये का सरकारी निवेश भी है. पर जवाबदेही की कमी है जिस कारण आम लोगों तक जरुरी सहायता नहीं पहुंच पा रही है.अब देखना ये है कि पांच वर्षों से ड्यूटी से अनुपस्थित बताए जा रहे डॉक्टरों पर कार्रवाई कब होगी और सैकड़ों मरीजों का बोझ उठा रहे डॉक्टरों को राहत कब मिलेगी.
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