जहां पठार में रिसती बूंदों से बुझती थी प्यास; वहां बीहड़ को चीरकर फूट पड़ी उम्मीदों की जलधारा
जल निगम के अधिशासी अभियंता अशीष कुमार भारती ने बताया कि जनपद चित्रकूट में 68 गांवों को जोड़ा जाना है.

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : February 27, 2026 at 2:32 PM IST
|Updated : February 28, 2026 at 12:37 PM IST
रिपोर्ट: जूड मार्टिन
चित्रकूट: बुंदेलखंड का मानिकपुर पाठा. वह इलाका जहां पानी की जद्दोजहद में जिंदगियां बीत जाया करती थीं. एक-एक बूंद पानी सहजने के लिए महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे तक इस बीहड़ की कंकरीली जमीन को घंटों नापते थे. आज हालात बदल गए हैं. 'जल जीवन मिशन' योजना ने इस इलाके में उम्मीद और तरावट की वह जलधारा बहाई है, जिसने सदियों से बह रही आंसुओं के कलरव को विलुप्त कर दिया है.
ETV भारत ने मानिकपुर पाठा के केकरामार, रानीपुर, एलाहा, टिकुरी, कुबरी और बढ़ेया जैसे गांवों का दौरा किया. जमीनी हालात को देखा. लोगों से बातचीत की. आप भी जानें कैसे इस निर्जन इलाके की आबादी के चेहरों पर अब संतोष और तृप्ति के भाव उमड़ रहे हैं.
पहले क्या थे हालात: बुंदेलखंड का पथरीला इलाका चित्रकूट मानिकपुर का पाठा वह क्षेत्र है, जहां कभी पानी सिर्फ जरूरत नहीं, बल्कि संघर्ष की कहानी था. गर्मी की पहली किरण के साथ ही यहां की महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे हाथों में बाल्टियां और साइकिलों पर डिब्बे लादकर मीलों दूर निकल पड़ते थे. कुओं के किनारे रातभर इंतजार, हैंडपंप पर लंबी कतारें और एक-एक बूंद के लिए जद्दोजहद ही इस क्षेत्र की पहचान थी.
अब बदल गई तस्वीर: यहां की अब तस्वीर बदल चुकी है. सरकार की 'हर घर, नल से जल योजना' ने इस प्यासे इलाके में उम्मीद और राहत की नई धारा बहा दी है. चित्रकूट में पाठा क्षेत्र के केकरामार, रानीपुर कुबरी, ऐलहा बढ़ेया गोपीपुर और टीकुरी जैसे गांवों में अब घर-घर टोंटी से पानी बहता दिखाई देता है.

क्या कहते हैं यहां के लोग: ऐलहा बढ़ेया गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि एक समय ऐसा था, जब पूरी रात कुएं के पास बैठना पड़ता था. चोहड़े के गड्ढे में रिसकर भरने वाले पानी का इंतजार करना पड़ता था. गिलास या लोटे से बूंद-बूंद पानी बाल्टी में भरकर घर लाते थे. उसे छानकर पीते थे. पानी की तलाश में ही दिन-रात गुजर जाते थे. यह गांव की नियति बन चुकी थी.
आज वही गांव पाइपलाइन से मिलने वाले स्वच्छ पानी से अपनी प्यास बुझा रहा है. टीकुरी गांव की महिलाओं की आंखों में भी राहत की चमक है. वह बताती हैं कि पहले जंगलों में बने कुओं और तालाबों तक घंटों पैदल चलना पड़ता था.
कई बार मजबूरी में गंदा पानी लाकर उसी से घर का काम और बच्चों की जरूरतें पूरी करनी पड़ती थीं. इससे बीमारियां फैलती थीं, लेकिन अब 'हर घर, नल से जल' योजना ने साफ पानी घर तक पहुंचा दिया है. इससे महिलाओं का समय बच रहा है. बच्चों की सेहत सुधर रही है और गांव की दिनचर्या बदल गई है.

सरकार ने निभाई जिम्मेदारी: जल निगम के अधिशासी अभियंता अशीष कुमार भारती ने बताया कि कभी पानी की किल्लत इतनी गंभीर थी, कि सामाजिक रिश्तों पर भी असर पड़ता था. अब इस योजना के जरिए पठारी और दूरस्थ गांवों तक पाइपलाइन बिछाकर स्वच्छ पेयजल पहुंचाया जा रहा है.
पाठा की पथरीली धरती पर बहती यह पानी की धारा सिर्फ सुविधा नहीं, बल्कि सरकार की बड़ी उपलब्धि है. यह जिम्मेदारी के साथ ग्रामीण जीवन में आए सकारात्मक परिवर्तन की कहानी है. अब गांवो में पानी की टोंटी राहत लेकर आती है.

कैसे हो रही पानी की सप्लाई: जल निगम के अधिशासी अभियंता अशीष कुमार भारती ने बताया कि जनपद चित्रकूट में 68 गांवों को जोड़ा जाना है. इसमें 60 गांव में हमारा पानी चालू हो गया है. शेष 8 गांव जून 2026 तक पूर्ण कर लिए जाएंगे.
जनपद में 28 ओवरहेड टैंक का निर्माण किया गया है. इसमें 11 CWR पंप और उनमें ऑपरेटर नियुक्त किए गए हैं. गांव में प्रत्येक व्यक्ति को 55 लीटर पानी हमें देना है. सुबह 6 बजे पानी शुरू होकर 10 से 11 बजे तक चलता है.
इसके लिए जनपद के गुमता बांध से पानी लिया जाता है. वाटर ट्रीटमेंट प्लांट से पानी संशोधित किया जाता है. पानी के शंशोधित होने के बाद उसकी गुणवत्ता चेक करके उसे आगे ओवरहेड टैंक में सप्लाई देकर गांव तक भेजा जाता है.
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