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बृज विवि 'ऑटो-पायलट' मोड में, चैंबर पर ताला, भ्रष्ट अब भी सुरक्षित

बृज विश्वविद्यालय में इस समय शासन, सिस्टम और जिम्मेदारी तीनों ही गायब मोड में दिख रही हैं...

Brij University Row
भरतपुर का बृज विश्वविद्यालय (ETV Bharat File Photo)
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By ETV Bharat Rajasthan Team

Published : November 28, 2025 at 3:40 PM IST

5 Min Read
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भरतपुर: भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद पूर्व कुलपति रमेश चंद्र के बर्खास्त होने के बाद माना जा रहा था कि बृज विवि की कार्यशैली पटरी पर आएगी, लेकिन हकीकत इससे उलट और ज्यादा चिंताजनक है. राजभवन की ओर से उप कुलसचिव डॉ. अरुण कुमार पांडेय, सहायक कुलसचिव प्रशांत कुमार और परीक्षा नियंत्रक फरवट सिंह पर निलंबन, एफआईआर और वित्तीय वसूली के आदेश जारी हैं, लेकिन तीनों अब भी सुरक्षित हैं और कार्रवाई शून्य.

विवि की बिगड़ी व्यवस्था को देखते हुए उच्च शिक्षा विभाग ने चार कर्मचारियों को प्रतिनियुक्ति पर भेजा, लेकिन यहां भी तमाशा हुआ पड़ा है. एक कर्मचारी ने ज्वाइन नहीं की, दूसरा छुट्टी पर है. वहीं, एक भ्रष्टाचार का आरोपी कर्मचारी चैंबर पर ताला लटका के गायब चल रहा है.

प्रतिनियुक्त अधिकारी भी गायब : विश्वविद्यालय की बदहाल कार्यशैली को सुधारने के लिए उच्च शिक्षा विभाग ने चार कर्मचारियों को एमएसजे कॉलेज से प्रतिनियुक्ति पर भेजा था. उद्देश्य यह था कि पुराने विवादित और भ्रष्ट अधिकारियों से हटकर प्रशासनिक कार्य निर्बाध चल सकें, लेकिन वास्तविकता उलट निकली. चार में से केवल तीन ही ज्वाइन कर पाए. तीन में से भी एक कर्मचारी कुछ ही समय बाद छुट्टी पर चला गया. जबकि चौथा कर्मचारी अब तक विवि पहुंचा ही नहीं है.

पढ़ें : बृज यूनिवर्सिटी : निलंबित कुलपति रमेश चंद्रा पद से हटाए गए, तीन भ्रष्ट कर्मचारियों पर कार्रवाई का इंतजार

कुलसचिव सीएस जोरवाल ने बताया कि चौथे कर्मचारी योगेन्द्र भानु को रिलीव कराने के लिए एमएसजे कॉलेज के प्राचार्य को पत्र लिखा गया था, जहां से जवाब मिला कि वे सेमिनार के बाद ज्वाइन करेंगे. यानी जिस विश्वविद्यालय की प्रशासनिक सांसें ही अटकी हों, वहां नियुक्त अधिकारी को ज्वाइन करने तक की जल्दी नहीं है.

चैंबर पर ताला…और काम ठप : दूसरी ओर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में घिरे सहायक कुलसचिव प्रशांत कुमार ने अपने चैंबर का ताला तक नहीं खोला है. दफ्तर में फाइलें रुकी हैं, प्रशासनिक आदेश लटके हुए हैं और अन्य आवश्यक काम बाधित हैं. इस संबंध में कुलसचिव सीएस जोरवाल का कहना है कि अगर प्रतिनियुक्ति वाले कर्मचारी बैठना चाहेंगे तो सहायक कुलसचिव का चैंबर खुलवा देंगे.

183 कॉलेज, 2 लाख विद्यार्थी : बृज विश्वविद्यालय के अधीन भरतपुर और धौलपुर जिलों के 183 कॉलेज आते हैं, जिनमें लगभग दो लाख से अधिक विद्यार्थी अध्ययनरत हैं. वर्तमान समय परीक्षाओं, मूल्यांकन और प्रवेश से जुड़ी गतिविधियों का सबसे महत्वपूर्ण समय है, लेकिन विश्वविद्यालय के चैंबर बंद होने, प्रतिनियुक्त अधिकारियों के अनुपस्थित रहने और आरोपी अधिकारियों के सक्रिय न रहने से पूरा तंत्र अस्त-व्यस्त हो गया है.

भ्रष्ट अभी भी सुरक्षित, आदेश दरकिनार : राजभवन द्वारा निलंबन, एफआईआर और वित्तीय वसूली के स्पष्ट आदेश जारी होने के बावजूद बृज विश्वविद्यालय में आरोपी भ्रष्ट कर्मचारी अब भी सुरक्षित बैठे हैं. कार्रवाई शून्य है और आदेश फाइलों में धूल खा रहे हैं. इस संबंध में जब कुलसचिव सीएस जोरवाल से बात की गई तो उन्होंने कहा कि संबंधित दोषी माने जाने वाले कर्मचारियों को नोटिस जारी किया जाता है. उनसे जवाब मांगा जाता है. कुछ प्रक्रिया और औपचारिकताएं रह गई हैं, उन्हीं को पूरा किया जा रहा है.

कमेटी या लीपापोती ? : 21 नवंबर को हुई बोम बैठक में पूरे मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की गई, जिसका अध्यक्ष विधायक बहादुर सिंह कोली को बनाया गया है. कमेटी को विश्वविद्यालय में हुए सभी वित्तीय व प्रशासनिक अनियमितताओं की तथ्यात्मक और विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर बोर्ड के सामने पेश करनी है. बोम अब इसी रिपोर्ट के आधार पर अंतिम फैसला करेगा. देखना यह है कि कमेटी क्या रिपोर्ट पेश करती है और उस पर क्या कार्रवाई होती है, क्योंकि पहले की रिपोर्ट में स्पष्ट दोषी सिद्ध होने के बाद भी भ्रष्टाचारियों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई.

भ्रष्टाचार की लिस्ट :

  • कैश चोरी : 25 लाख रुपए गायब - विवि से 25 लाख रुपए नकद चोरी हो गए. आज तक न चोर पकड़ा गया और न ही पैसा मिला. विधायक बहादुर सिंह कोली ने इस मामले की शिकायत एसीबी में की.
  • वॉच टॉवर घोटाला : 7 लाख की हेराफेरी - ऊंचाई पर चार वॉच टॉवर लगाने का काम 2.5 लाख में संभव था, लेकिन भुगतान 9.5 लाख किया गया.
  • 3.9 करोड़ रुपए का फर्नीचर घोटाला : महंगे पर्दे, कुर्सियां, डाइनिंग टेबल - करोड़ों रुपए के फर्नीचर का न तो रिकॉर्ड है, न ही सामग्री दिखाई देती है.
  • 12 करोड़ की केमिस्ट्री लैब घोटाला.
  • 11.5 करोड़ की पुस्तक खरीद अनियमितता : पाठ्यक्रम से असंबंधित किताबें खरीदी गईं. छात्रों से इसका कोई लेना-देना नहीं था.
  • उत्तर पुस्तिका घोटाला : 1.5 करोड़ - घटिया क्वालिटी की कॉपियों पर बड़ी रकम का भुगतान.
  • संविदा भर्ती घोटाला : 14 शिक्षकों को योग्यता के विपरीत नियुक्ति दी गई.
  • पीएचडी प्रवेश घोटाला : 50 से अधिक छात्रों को बिना गाइड उपलब्ध कराए प्रवेश दे दिया गया. फीस भी ली गई, लेकिन कोर्स पूरा नहीं हो पाया.
  • 65 वर्ष से अधिक आयु के कर्मचारियों की पुनर्नियुक्ति.
  • नियमों को किनारे कर कई वृद्ध कर्मचारियों को दोबारा नौकरी दी गई.
  • फर्जी बिल और फर्जी फर्मों को भुगतान.
  • करोड़ों रुपए के बिल फर्जी कंपनियों के नाम से पास किए गए.