बलिदान दिवस: ब्रेवेस्ट ऑफ ब्रेव मेजर सुधीर वालिया, जननी मां और भारत माता में बसते थे उनके प्राण, धरती मां की सेवा में अर्पित कर दी जान
मां के वचन का मान, अनुशासन, आत्मविश्वास और अदम्य साहस ने मेजर सुधीर वालिया को रैंबो ऑफ इंडियन आर्मी बनाया. रजनीश शर्मा की रिपोर्ट.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : August 29, 2026 at 9:38 AM IST
|Updated : August 29, 2026 at 10:45 AM IST
शिमला: दरअसल, ऐसे ही महान सपूत जननी मां एवं भारत माता के दूध के ऋण को उतार सकते हैं. अपने अदम्य शौर्य के लिए अनेक नामों से अलंकृत मेजर सुधीर वालिया ने 27 साल पहले आज ही के दिन भारत माता की सेवा में अपने प्राण अर्पित किए थे. कश्मीर की धरती पर गिरे उनके पवित्र लहू ने ये ऐलान किया कि जब तक मेजर सुधीर वालिया जैसे सपूत हैं, दुश्मन कभी भारत मां की शान में गुस्ताखी नहीं कर सकते. हिमाचल के कांगड़ा जिला में पालमपुर के बनूड़ी गांव की मिट्टी का ये लाल बचपन से ही जननी मां एवं भारत मां की सेवा के लिए धरती पर आया था. यहां उनके बलिदान दिवस के अवसर पर रैंबों की स्मृतियों को फिर से दर्ज करना चाहिए. यहां उनके बचपन के कुछ किस्से अंकित किए जा रहे हैं. उन किस्सों से स्पष्ट हो जाएगा कि पूत ने अपने पांव पालने में ही दिखा दिए थे.
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ब्रेवेस्ट ऑफ ब्रेव मेजर सुधीर वालिया
सुधीर वालिया का जन्म 24 मई 1968 को वैसे तो जोधपुर में हुआ था, लेकिन बचपन उनका पालमपुर के बनूड़ी गांव की मिट्टी में परवान चढ़ा. उनके पिता भारतीय सेना में सेवारत थे. खैर, बचपन में मां के साए में वे बनूड़ी में पलने-बढ़ने लगे. वहां बनौड़ू में अप्रैल महीने में गांव का सालाना मेला लगता है. मेजर सुधीर वालिया उस समय संभवत: 11 साल के थे और पांचवीं कक्षा में पढ़ते थे. उन्होंने मां से मेले में जाने के लिए कुछ पैसे मांगे. समय का वो दौर अभावों का था. मां ने बेटे की इच्छा देखते हुए पांच रुपए दिए, लेकिन साथ ही ये भी कहा कि इन्हें खर्च मता करना. बालमन मेले की रौनक में खिलौनों और मिठाई के लिए ललचाता है, परंतु बालक सुधीर को मां की सीख याद थी. वहीं, मेले में दंगल भी होता था. सुधीर ने भी दंगल में भिड़ने की ठानी. संयोग देखिए कि वो अपनी आयु वालों के बीच की कुश्ती जीत गए. उन्हें ईनाम में पांच रुपए की रकम मिली. इनाम के पैसों से सुधीर ने जलेबी व पकौड़े लिए और घर पहुंचकर मां के हाथ में उनके दिए पांच रुपए व साथ में दंगल में जीती रकम से खरीदी जलेबी आदि धर दी.

ये घटना बेशक देखने-सुनने में छोटी लगे, लेकिन इसी घटना में बालमन में उपजे संस्कार हैं. मां के वचन की मान, अनुशासन, आत्मविश्वास और साहस. इन्हीं गुणों ने उन्हें रैंबो ऑफ इंडियन आर्मी बनाया.

'मां और भारत माता में बसते थे मेजर सुधीर वालिया के प्राण'
मेजर सुधीर वालिया की बहन आशा बताती हैं, "सुधीर भैया बचपन से ही मां से बहुत प्रेम करते थे. मां अकसर अपने खेतों के काम में व्यस्त रहती तो कई बार सुधीर वालिया रसोई में खाना बनाने में मदद करते थे. बहुत बार तो वे शाम के भोजन के लिए कुछ न कुछ बनाकर तैयार कर देते. बाद में सुधीर वालिया भारतीय सेना की शान बने. जब भी वे अवकाश पर घर आते तो अपना पर्स व सारा सामान मां के पास दे देते. वे अपने सारे पैसे मां को सौंप देते थे. छुट्टी काटकर जब जाने का समय आता तो वे मां से कहते-बस किराए लायक पैसे दे दो."

वहीं, बहनोई प्रवीण आहलूवालिया कहते हैं, "सुधीर भाई साहब में अनेक ऐसे गुण थे जो उन्हें महामानव बनाते हैं. मेजर सुधीर वालिया ने कश्मीर में कई अभियानों को लीड किया. उन्हें पैरा एसएफ का मोस्ट डेकोरेटेड ऑफिसर कहा जाता था. उन्होंने दो बार सियाचिन में टेन्योर काटा. वे माउंटेन वारफेयर के अद्भुत जानकार थे."

1987 में शुरू की थीं भारतीय सेना में सेवाएं
मेजर सुधीर वालिया ने एनडीए से पासआउट होकर 30 मई 1987 को भारतीय सेना में सेवाएं शुरू की थीं. इंडियन मिलिट्री अकादमी देहरादून से 20 साल की आयु में वे सेकेंड लेफ्टिनेंट बनकर शौर्य गाथा के अद्भुत अध्याय लिखने के लिए तैयार थे. वे चार जाट बटालियन के हिस्सा बने. कुछ ही महीने बाद उन्हें श्रीलंका जाने का आदेश मिला. श्रीलंका में ही उन्हें पैरा एसएफ के कमांडो के साथ काम करने का अवसर मिला. बस, उसी समय से उनके मन में मैरून बैरे और पैरा एसएफ की ओर आकर्षण बढ़ गया. आखिर उनके सपने को हकीकत का रंग मिला. सुधीर वालिया वर्ष 1990 में नाइन पैरा एसएफ का अंग बने.

धरती मां की सेवा में अर्पित कर दी जान
अमेरिका में पैंटागन में उनका भाषण देश के लिए गौरव का क्षण था. अमेरिका में अस्सी देशों के कमांडो आफिसर में टॉप करना और फिर उनका ध्यान अपनी ओर खींचना. मेजर सुधीर वालिया देश के सेना प्रमुख के ओएसडी रहे. करगिल युद्ध में उनकी टीम ने जुलू टॉप पर कब्जा किया. बाद में हफरुदा के जंगलों में आतंकियों को ठिकाने लगाते समय वे बुरी तरह से घायल हो गए. वर्ष 1999 में 29 अगस्त को धरती मां और भारत माता का ये लाल अपने देश की मिट्टी की शान के लिए न्यौछावर हो गया. उनके बलिदान के बाद पालमपुर में उनके नाम पर सीनियर सेकेंडरी स्कूल का नाम रखा गया. यहां उनके बलिदान दिवस पर हर साल उन्हें आदरांजलि अर्पित की जाती है. उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर कृतज्ञ राष्ट्र अपना शीश झुकाता है. धन्य है मां भारती और मेजर सुधीर वालिया जैसे इस मां के लाल. प्रणाम, मेजर सुधीर वालिया.


