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कंधे पर शव, सीना तक उफनती नदी..जान पर खेलकर कब्रिस्तान पहुंचे लोग

किशनगंज से आयी यह तस्वीर विचलित करती है. कैसे लोग सीने तक उफनती नदी को पार कर कब्रिस्तान में शव दफन करने पहुंचे. रिपोर्ट-आशिष

eople reach cemetery after crossed river
किशनगंज में इस तरह कब्रिस्तान पहुंचे लोग (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Bihar Team

Published : September 1, 2026 at 10:41 AM IST

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किशनगंज. सोमवार को बहादुरगंज के लोग जब 20 वर्षीय शहनसवी बेगम के जनाजे को कंधे पर लेकर कब्रिस्तान की तरफ बढ़े, तो उनके सामने खकवा नदी की उफनती धारा थी. इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार जन्नत जाने के लिए 'पुल-सिरात' को पार करना जितना कठिन और खौफनाक बताया गया है, ठीक उसी तरह लोगों को कब्रिस्तान तक पहुंचने के लिए इस नदी को पार करना पड़ा.

'पुल-सिरात' जैसी परीक्षा: सीने तक गहरे पानी और तेज बहाव के बीच संतुलन खोने का मतलब सीधे मौत. व्यवस्था की नाकामी के चलते इन ग्रामीणों के लिए अपने परिजनों को सुपुर्द-ए-खाक करने का रास्ता, जीते-जी 'पुल-सिरात' जैसी परीक्षा बन चुका है. नोदिया टोली-बैसा घाट पर पुल नहीं होने के कारण दर्जनों गांवों के हजारों ग्रामीणों को जान जोखिम में डालनी पड़ती है. इसका ताजा उदाहरण सोमवार को दिखा.

देखें वीडियो (ETV Bharat)

नदी पार कर पहुंचे कब्रिस्तान: किशनगंज के जिला परिषद प्रतिनिधि इमरान आलम ने बताया कि बीते दिनों सड़क हादसे में वीरपुर ग्राम निवासी सईदुर्रहमान की 20 वर्षीय बेटी शहनसवी बेगम की मौत हो गयी थी. जिसे हमलोग कब्रिस्तान में दफनाने ले जा रहे थे. इसके लिए खकवा नदी को पार करना पड़ा. नदी पार करने से पहले लोगों ने कपड़े उतारे, फिर नदी पार कर कपड़ा पहने और शव को दफन किया.

एकमात्र बैसा कब्रिस्तान: इमरान आलम बताते हैं कि 50 एकड़ में फैले बैसा कब्रिस्तान का संबंध नोदिया टोली, चकचकी, झींगाकाटा इस्तमरार, झींगाकाटा तौफीर, दोगाछी, झींगाकाटा, दर्जी टोला, लाटटोला, बैसा, तेघरिया और धापरटोली सहित दर्जनों गांवों के हजारों लोगों से है. यही एकमात्र कब्रिस्तान है, जहां उक्त गांवों के लोग अपने पूर्वजों को दफनाते आ रहे हैं.

eople reach cemetery after crossed river
कब्रिस्तान जाने के लिए नदी पार करते लोग (ETV Bharat)

बरसात में खतरनाक हो जाती नदी: सबसे ज्यादा समस्या तब होती है, जब बारिश के समय नदी में पानी लबालब हो जाता है. बरसात के दिनों में जब खकवा नदी उफान पर होती है, तो यह रास्ता और भी खतरनाक हो जाता है. फिर भी लोग अपनी अम्मी, अब्बू और बहन के शव को इसी तरह ले जाते हैं.

"अंग्रेजों का जमाना होता तो मानते, लेकिन आजादी के वर्षों बाद भी इस घाट पर एक अदद पुल का निर्माण नहीं होना ग्रामीण कार्य विभाग की उदासीनता को दिखाता है." -इमरान आलम, जिला परिषद प्रतिनिधि

नदी पर नहीं है पुल: इमरान आलम ने बताया कि यह नदी किशनगंज जिले के बहादुर प्रखंड के महेश बथना (महेशपटन) पंचायत के वार्ड 14 में है. इस नदी पर वर्षों से ब्रिज नहीं होने के कारण हमारे यहां के लोग इसी तरह अपने परिजनों के शव को ले जाकर दफनाने का काम करते हैं. इस गंभीर समस्या को लेकर कई बार स्थानीय जनप्रतिनिधियों और बिहार सरकार के ग्रामीण कार्य विभाग से गुहार लगाई गई, लेकिन आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला.

eople reach cemetery after crossed river
कब्रिस्तान जाते लोग (ETV Bharat)

लाख कोशिशें नाकाम: इमरान आलम ने बताया कि पुल निर्माण को लेकर कई बार ग्रामीण कार्य विभाग के अधिकारियों द्वारा स्थलीय निरीक्षण करवाए गए हैं. कुछ दिन पूर्व उन्होंने बिहार सरकार के ग्रामीण कार्य मंत्री सुनील कुमार से उनके पटना स्थित कार्यालय में मिलकर अवगत कराया है, लेकिन फलाफल शून्य रहा है. ग्रामीणों ने जिलाधिकारी, किशनगंज एवं बिहार सरकार से अविलंब नोदिया टोली-बैसा घाट पर खकवा नदी पर पुल निर्माण की मांग की है. इसपर डीएम ने त्वरित कार्रवाई की बात कही है.

"मामला संज्ञान में आया है. इसकी जानकारी वरीय पदाधिकारी को दी जाएगी. वहां पर पुल निर्माण का प्रस्ताव भेजा जाएगा. जल्द ही समस्या का समाधान होगा." -नवीन कुमार, डीएम, किशनगंज

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कब्रिस्तान जाने के लिए नदी पार करते लोग (ETV Bharat)

पुल-सिरात क्या है?: जिस तरह हिन्दु धार्मिक मान्यताओं के अनुसार स्वर्ग का रास्ता बैतरणी नदी होकर जाता है. उसी तरह इस्लाम धर्म में जन्नत का रास्ता 'पुल सिरात' होकर जाता है. मान्यता है कि जन्नत से पहले जहन्नम के ऊपर पुल सिरात है. यह पुल इंसान के बाल से भी बारीक और तलवार की धार से भी तेज है. जिससे होकर लोगों को गुजरना होता है.

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