Special: कैंसर के इलाज में रेडियोरेपी के दुष्प्रभाव कम करने को लेकर शोध, हर्बल पौधों से विकिरण के दुष्प्रभाव कम होने का दावा
शोध में कुछ हर्बल पौधों के उपयोग को रेडियोथेरेपी के बाद होने वाले विकिरणजनित दुष्प्रभावों को कम करने की संभावनाओं के तौर पर देखा गया.

Published : August 27, 2026 at 3:53 PM IST
बीकानेर : कैंसर के उपचार में रेडियोथेरेपी बेहद महत्वपूर्ण चिकित्सा पद्धति है, लेकिन इसके दौरान शरीर के स्वस्थ ऊतकों पर भी विकिरण का असर पड़ सकता है. इससे मरीजों को त्वचा में जलन, लालिमा, सूखापन, थकान और उपचार किए जा रहे हिस्से के आसपास अन्य दुष्प्रभावों का सामना करना पड़ सकता है. ऐसे में रेडियोथेरेपी के दुष्प्रभावों को कम करने के संभावित उपायों को लेकर बीकानेर के डूंगर कॉलेज के प्राणी शास्त्र विभाग में लंबे समय से शोध किए जाने का दावा किया गया है.
डूंगर कॉलेज के प्राणी शास्त्र विभाग के प्रोफेसर और डूंगर कॉलेज के प्राचार्य डॉ. राजेंद्र पुरोहित के अनुसार, शोध में कुछ हर्बल पौधों के उपयोग को रेडियोथेरेपी के बाद होने वाले विकिरणजनित दुष्प्रभावों को कम करने की संभावनाओं के तौर पर देखा गया. इनमें तुलसी, ग्वारपाठा यानी एलोवेरा, सहजन, आंवला के साथ हिमाचल प्रदेश में पाए जाने वाले कुटकी पौधे की पत्तियों को भी शोध में शामिल किया गया.
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चूहों पर किया गया तुलनात्मक प्रयोग : डॉ. पुरोहित के मुताबिक शोध के दौरान चूहों को रेडियोथेरेपी के विकिरण के प्रभाव में लाया गया. इसके बाद कुछ चूहों को निर्धारित हर्बल सामग्री दी गई, जबकि दूसरे समूह को तुलनात्मक अध्ययन के लिए अलग रखा गया. दोनों समूहों में विकिरण के प्रभाव और उसके बाद दिखाई देने वाले बदलावों का अध्ययन किया गया. शोधकर्ताओं का दावा है कि जिन चूहों को हर्बल सामग्री दी गई, उनमें रेडिएशन के कुछ दुष्प्रभाव तुलनात्मक रूप से कम दिखाई दिए. हालांकि, यह शोध अभी प्रयोगशाला स्तर पर है और इसके आधार पर कैंसर मरीजों के लिए किसी हर्बल पदार्थ को रेडियोथेरेपी का उपचार या विकल्प मानना जल्दबाजी होगी.

क्या होता है रेडियोथेरेपी का असर? : रेडियोथेरेपी में कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने या उनकी वृद्धि रोकने के लिए उच्च ऊर्जा वाले विकिरण का इस्तेमाल किया जाता है. विकिरण का लक्ष्य मुख्य रूप से कैंसर प्रभावित कोशिकाएं होती हैं, लेकिन उपचार वाले क्षेत्र के आसपास मौजूद कुछ स्वस्थ कोशिकाएं भी प्रभावित हो सकती हैं. दुष्प्रभाव इस बात पर निर्भर करते हैं कि शरीर के किस हिस्से में रेडियोथेरेपी दी जा रही है? कितनी मात्रा में विकिरण दिया जा रहा है और उपचार कितने समय तक चल रहा है?
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त्वचा पर रेडियोथेरेपी होने पर लालिमा, जलन, खुजली, सूखापन, संवेदनशीलता या त्वचा का रंग बदलना जैसी समस्या हो सकती है. इसके अलावा कई मरीजों में थकान भी देखने को मिलती है. कुछ मामलों में उपचार वाले अंग के अनुसार अलग-अलग दुष्प्रभाव सामने आ सकते हैं. उदाहरण के लिए सिर और गर्दन के क्षेत्र में रेडियोथेरेपी होने पर मुंह में सूखापन या निगलने में परेशानी हो सकती है, जबकि पेट या पेल्विस के आसपास रेडियोथेरेपी होने पर पाचन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं.
कैंसर विशेषज्ञ बोले- शोध के अभी कई चरण बाकी : बीकानेर स्थित आचार्य तुलसी रीजनल कैंसर इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर डॉ. शंकरलाल जाखड़ ने माना कि डूंगर कॉलेज में इस दिशा में शोध किया गया है, लेकिन इसके परिणामों को सीधे मरीजों के उपचार से जोड़ना अभी संभव नहीं है. उनका कहना है कि मेडिकल साइंस में किसी दवा या उपचार को मरीजों पर इस्तेमाल करने से पहले कई चरणों में वैज्ञानिक परीक्षण किए जाते हैं. चूहों पर किया गया प्रयोग प्रारंभिक स्तर का अध्ययन माना जाता है.
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इसके बाद सुरक्षा, प्रभावशीलता, सही मात्रा और संभावित दुष्प्रभावों को लेकर आगे के परीक्षण जरूरी होते हैं. डॉ. जाखड़ के मुताबिक, एलोवेरा जेल के इस्तेमाल से त्वचा पर ठंडक या लचीलेपन का अनुभव होने की बात कई मरीज भी बताते हैं और कुछ परिस्थितियों में चिकित्सक भी त्वचा की देखभाल के संबंध में सलाह देते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि एलोवेरा या कोई अन्य हर्बल पदार्थ रेडियोथेरेपी के दुष्प्रभावों का प्रमाणित उपचार बन गया है.
शोध से उम्मीद, लेकिन मरीजों को सावधानी जरूरी : डूंगर कॉलेज के प्राणी शास्त्र विभाग के इस शोध ने रेडियोथेरेपी से जुड़े दुष्प्रभावों को कम करने के लिए प्राकृतिक और हर्बल स्रोतों की संभावनाओं पर चर्चा जरूर शुरू की है. शुरुआती प्रयोगों में सकारात्मक संकेत मिलने का दावा किया गया है, लेकिन इन परिणामों की पुष्टि के लिए आगे विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन आवश्यक होंगे. विशेषज्ञों के अनुसार, जब तक किसी हर्बल पदार्थ की प्रभावशीलता और सुरक्षा मानव परीक्षणों में प्रमाणित नहीं हो जाती, तब तक कैंसर मरीजों को अपनी रेडियोथेरेपी या चिकित्सकीय उपचार के साथ किसी भी हर्बल पदार्थ का इस्तेमाल अपने स्तर पर शुरू नहीं करना चाहिए. अब डूंगर कॉलेज के शोध के आगे के चरणों और विस्तृत वैज्ञानिक परिणामों पर नजर रहेगी. भविष्य के परीक्षणों में भी इसके सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं तो रेडियोथेरेपी के दुष्प्रभावों को नियंत्रित करने के लिए हर्बल आधारित सहायक उपचार की दिशा में महत्वपूर्ण संभावनाएं विकसित हो सकती हैं.

