Ground Report: उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर बड़ा सवाल, बजट बढ़ा फिर भी NAAC और NIRF में क्यों पिछड़ा बिहार?
बिहार में उच्च शिक्षा में बजट बढ़ने के बावजूद NAAC में ज्यादातर संस्थान B/C ग्रेड ला रहे, वहीं NIRF टॉप 100 में पारंपरिक यूनिवर्सिटी अनुपस्थित.

Published : February 14, 2026 at 2:01 PM IST
रिपोर्ट: कृष्णनंदन
पटना: बिहार में उच्च शिक्षा की तस्वीर लगातार चिंता बढ़ाने वाली बनती जा रही है. राज्य सरकार हर साल शिक्षा मद में सबसे अधिक बजट खर्च करने का दावा करती है और हाल के वर्षों में उच्च शिक्षा विभाग को अलग विभाग का दर्जा भी दिया गया है, ताकि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों पर विशेष ध्यान दिया जा सके. इसके बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि बिहार के अधिकांश कॉलेज और विश्वविद्यालय राष्ट्रीय स्तर की गुणवत्ता कसौटी पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं.
बिहार के संस्थानों की नैक रैंकिंग खराब: साल 2026-27 में शिक्षा विभाग का बजट 68216.95 करोड़ रुपये का है. राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद (NAAC-नैक) के आंकड़े बताते हैं कि राज्य के करीब 80 प्रतिशत उच्च शिक्षण संस्थान बी और सी श्रेणी में सिमटे हुए हैं, जबकि ए और ए+ श्रेणी के संस्थानों की संख्या बेहद सीमित है.
NIRF 2025 की रैंकिंग में बुड़ा हाल: यही नहीं, नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क (NIRF) 2025 की रैंकिंग में भी बिहार के पारंपरिक विश्वविद्यालय लगभग नदारद नजर आते हैं. यह स्थिति तब है, जब सरकार संसाधनों के विस्तार और प्रशासनिक ढांचे को मजबूत करने की बात कर रही है. सवाल उठता है कि आखिर सुधार की राह क्यों नहीं निकल पा रही है?
यूनिवर्सिटी और विश्वविद्यालयों के बदतर हालात: बिहार सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में इस समय 39 विश्वविद्यालय और 1356 संबद्ध कॉलेज संचालित हो रहे हैं. इनमें से गिने-चुने संस्थान ही नैक से मान्यता प्राप्त हैं और उनमें भी अधिकांश को बी या सी ग्रेड मिला हुआ है. अधिकांश विश्वविद्यालय तो नैक ग्रेडिंग से हीं बाहर हैं.
महज 7 यूनिवर्सिटी को ही नैक मान्यता: साल 2024-25 में बिहार के कुल 7 यूनिवर्सिटी और 102 कॉलेज को ही नेक की मान्यता प्राप्त हुई. नैक मान्यता इस बात का मूल्यांकन करती है कि संस्था लैंगिक समानता, अकादमिक गतिविधि और दक्षताओं को सुदृढ़ करने के लिए डिजिटल उपकरण को कितना उपयोगी बना पा रहा है.
बिहार के अधिकांश संस्थान बी और सी श्रेणी के: आर्थिक सर्वेक्षण के रिपोर्ट के अनुसार बिहार में अभी के समय एए++ श्रेणी में बिहार में एक विश्वविद्यालय और एक महाविद्यालय है, ए+ श्रेणी में एक भी विश्वविद्यालय नहीं है और एक कॉलेज है, ए श्रेणी में एक विश्वविद्यालय और एक कॉलेज है. बी++ श्रेणी में दो विश्वविद्यालय और 7 कॉलेज हैं. बी+ श्रेणी में एक विश्वविद्यालय और 9 कॉलेज हैं. बी श्रेणी में एक विश्वविद्यालय और 45 कॉलेज हैं.
सी श्रेणी में ये संस्थान: बिहार में सी श्रेणी में एक विश्वविद्यालय और 38 कॉलेज है. जबकि डी श्रेणी में एक भी यूनिवर्सिटी और कॉलेज नहीं है. शिक्षाविद बताते हैं है कि नैक मान्यता किसी कॉलेज या विश्वविद्यालय की गुणवत्ता का आईना होती है. नैक की ग्रेडिंग यह बताती है कि किसी संस्थान में पढ़ाई, रिसर्च, शिक्षक व्यवस्था, इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रशासनिक प्रक्रिया किस स्तर की है.
क्या है नैक मान्यता: राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद देश की वह स्वायत्त संस्था है, जो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अधीन काम करती है और उच्च शिक्षण संस्थानों का मूल्यांकन करती है. नैक का मुख्य उद्देश्य यह देखना होता है कि कोई कॉलेज या विश्वविद्यालय न्यूनतम शैक्षणिक मानकों पर खरा उतर रहा है या नहीं. नैक संस्थानों को ए++, ए+, ए, बी++, बी+, बी और सी जैसी श्रेणियों में ग्रेड देता है.
“एक्रेडिटेड” और “नॉट एक्रेडिटेड”: हाल के वर्षों में नई प्रणाली के तहत “एक्रेडिटेड” और “नॉट एक्रेडिटेड” का मॉडल भी लागू किया गया है, ताकि अधिक से अधिक संस्थानों को मूल्यांकन के दायरे में लाया जा सके. लेकिन बिहार की स्थिति यह है कि बड़ी संख्या में संस्थान अब भी या तो नैक से दूर हैं या फिर न्यूनतम ग्रेड पर ही अटके हुए हैं.
इन मानकों पर नैक मान्यता मिलती है: नैक किसी भी कॉलेज या विश्वविद्यालय को ग्रेड देने के लिए कई व्यापक मानकों पर जांच करता है. इसमें सबसे पहला मानक होता है पाठ्यक्रम के पहलू, यानी पाठ्यक्रम की गुणवत्ता और उसका नियमित अपडेट. यह देखा जाता है कि संस्थान का सिलेबस समय की मांग के अनुरूप है या नहीं, उसमें स्किल डेवलपमेंट और रोजगारोन्मुखी विषय शामिल हैं या नहीं. दूसरा प्रमुख मानक है टीचिंग लर्निंग और मूल्यांकन. जिसमें शिक्षकों की योग्यता, छात्र-शिक्षक अनुपात, पढ़ाने की पद्धति और परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता को परखा जाता है.
रैंकिंग के लिए ये मानक हैं खास: तीसरा मानक रिसर्च इनोवेशन और एक्सटेंशन से जुड़ा होता है, यानी संस्थान में शोध कार्य कितना हो रहा है. फैकल्टी और छात्रों के शोध पत्र प्रकाशित हो रहे हैं या नहीं, पेटेंट या इनोवेशन पर काम हो रहा है या नहीं. चौथा मानक इंफ्रास्ट्रक्चर और लर्निंग रिसोर्सेस है, जिसके तहत भवन, कक्षाएं, लैब, लाइब्रेरी, आईटी सुविधाएं और डिजिटल संसाधनों की स्थिति देखी जाती है. पांचवां मानक छात्र सहयोग और प्रगति है, जिसमें छात्रवृत्ति, प्लेसमेंट, करियर काउंसलिंग और छात्रों की आगे की शैक्षणिक प्रगति को आंका जाता है.
इन मानकों पर बेहतर प्रदर्शन है जरूरी: छठा मानक शासन, नेतृत्व और प्रबंधन से जुड़ा है. यानी संस्थान का प्रशासनिक ढांचा कितना पारदर्शी और प्रभावी है. सातवां और अंतिम मानक संस्थागत मूल्य और सर्वोत्तम प्रथाएं है. जिसमें नैतिकता, पर्यावरण संरक्षण, लैंगिक समानता और सामाजिक दायित्व जैसे पहलुओं को देखा जाता है. शिक्षाविद बताते हैं कि अगर किसी कॉलेज को अच्छा नैक ग्रेड चाहिए, तो उसे इन सभी मानकों पर लगातार बेहतर प्रदर्शन करना होता है.
योग्य शिक्षक भी हैं अहम: उदाहरण के तौर पर, ए या ए+ ग्रेड पाने के लिए जरूरी है कि कॉलेज में योग्य शिक्षक हों, नियमित कक्षाएं चलती हों, रिसर्च का माहौल हो, लाइब्रेरी और लैब आधुनिक हों, छात्र सहायता तंत्र मजबूत हो और प्रशासनिक व्यवस्था पारदर्शी हो. लेकिन बिहार के अधिकांश कॉलेज इन बुनियादी शर्तों को भी पूरी तरह नहीं निभा पा रहे हैं. कई जगहों पर शिक्षक पद वर्षों से खाली हैं, पढ़ाई सत्रों में अनियमितता है, शोध संस्कृति लगभग गायब है और इंफ्रास्ट्रक्चर बेहद कमजोर है.
टॉप 100 में कोई विश्वविद्यालय नहीं: दूसरी ओर, नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क (NIRF) 2025 के आंकड़े भी यही कहानी बयान करते हैं. इस रैंकिंग में बिहार से मुख्य रूप से राष्ट्रीय महत्व के संस्थान ही जगह बना पाए हैं, जबकि राज्य के पारंपरिक विश्वविद्यालय शीर्ष 100 की सूची में दिखाई नहीं देते. इसका अर्थ यह है कि बिहार के विश्वविद्यालय न तो रिसर्च में आगे हैं, न शिक्षण गुणवत्ता में और न ही ग्रेजुएट आउटकम यानी छात्रों के भविष्य निर्माण में. NIRF पांच मुख्य मानकों पर रैंकिंग करता है, जो है टीचिंग, लर्निंग एंड रिसोर्सेस, रिसर्च एंड प्रोफेशनल प्रैक्टिस, स्नातक स्तर की पढ़ाई के परिणाम पहुंच और समावेशिता और धारणा. इन सभी पैमानों पर बिहार के अधिकतर संस्थान कमजोर पड़ते नजर आते हैं.
क्यों सुधार नहीं हो रहा गुणवत्ता में: शिक्षाविदों का मानना है कि समस्या केवल धन की नहीं, बल्कि धन के उपयोग की है. कई योजनाएं कागज पर बन जाती हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन सही तरीके से नहीं हो पाता. कॉलेजों को मिलने वाला अनुदान अक्सर भवन निर्माण या औपचारिक खर्चों में चला जाता है, जबकि लाइब्रेरी, लैब, रिसर्च और फैकल्टी डेवलपमेंट पर अपेक्षित निवेश नहीं हो पाता. इसके अलावा, नैक की तैयारी को लेकर भी संस्थानों में गंभीरता की कमी देखी जाती है. कई कॉलेज केवल निरीक्षण के समय कागजी औपचारिकताएं पूरी करते हैं, लेकिन स्थायी सुधार पर ध्यान नहीं देते.
पैरवी पर शिक्षकों की नियुक्ति: पटना यूनिवर्सिटी की छात्रा सबा ने बताया की बिहार में विश्वविद्यालय की स्थिति इसलिए खराब है क्योंकि अगर पटना यूनिवर्सिटी की बात करें जो कभी पूरब का ऑक्सफोर्ड कहा जाता था, आज न्यू एजुकेशन पॉलिसी लागू करने के बाद परीक्षा सत्र गड़बड़ हो गया है और काफी विलंब से चल रहा है. शिक्षकों की नियुक्ति पैरवी पर हो रही है और योग्यता का ध्यान नहीं रखा जा रहा.

"स्थाई के बजाय अस्थाई गेस्ट फैकल्टी से पूरा क्षेत्र की व्यवस्था चल रहा है और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी है. छात्र खुद को प्रतियोगी परीक्षाओं या रोजगार के लिहाज से तैयार महसूस नहीं करते, क्योंकि पाठ्यक्रम और शिक्षण पद्धति समय से पीछे चल रही है."-सबा, छात्रा, पटना यूनिवर्सिटी
विलंब चल रहा शैक्षणिक सत्र: पटना विश्वविद्यालय की ही छात्रा प्रीति पासवान ने बताया कि न्यू एजुकेशन पॉलिसी लागू कर दी गई जिसमें सेमेस्टर सिस्टम है. लागू करने से पहले तैयारी नहीं की गई. टीचिंग और नॉन टीचिंग स्टाफ की जो कमी थी उसे पूरा नहीं किया गया जिसके कारण शिक्षकों पर कॉपी चेक करने का ही दबाव अधिक बढ़ गया है और शैक्षणिक कार्य से शिक्षक दूर हो गए हैं.

"कॉलेज में सिर्फ परीक्षाएं ही चल रही हैं और बावजूद इसके शैक्षणिक सत्र विलंब हो गया है. गेस्ट फैकल्टी या संविदा शिक्षकों के भरोसे पढ़ाई चल रही है, जिससे न तो शोध संस्कृति विकसित हो पा रही है और न ही छात्रों को निरंतर मार्गदर्शन मिल पा रहा है."-प्रीति पासवान, छात्रा, पटना विश्वविद्यालय
इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी: पटना विश्वविद्यालय के ही छात्र स्वराज गुप्ता ने बताया कि पटना विश्वविद्यालय में पहले कैंटीन और सभी कॉलेजों में लाइब्रेरी की अच्छी सुविधा थी लेकिन अब कैंटीन और लाइब्रेरी की सुविधा पूरी तरीके से बदहाल हो गई है. डिजिटल लाइब्रेरी की बात हो रही थी लेकिन यह भी किसी कॉलेज में नहीं हो पाया. भूख लगती है तो छात्र लंच पीरियड में कॉलेज से बाहर निकाल कर सड़क पार करके बाहर खाना खाने जाते हैं.

"समय पर शैक्षणिक सत्र नहीं चल रहा है. शिक्षकों की कमी बनी हुई है. ऐसे में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे संभव है? जब तक शिक्षक ही शोध और नवाचार में सक्रिय नहीं होंगे, तब तक संस्थान नैक और NIRF जैसे पैमानों पर कॉलेज आगे नहीं बढ़ पाएंगे."-स्वराज गुप्ता, छात्र, पटना विश्वविद्यालय
कॉलेज में गुरु नहीं और बता रहे विश्व गुरु: राष्ट्रीय जनता दल के विधान पार्षद सैयद फैसल अली ने कहा कि प्रदेश में उच्च शिक्षा में शिक्षकों की कमी है. हालत यह है कि कॉलेज में गुरु है नहीं और सरकार विश्व गुरु बनने में लगी हुई है. साल 2011 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की शाखा सीमांचल क्षेत्र में खुली. सरकार ने इसके लिए जमीन तो दिया लेकिन ना तो फैकल्टी की कोई व्यवस्था हो पाई है और ना ही इन्फ्रास्ट्रक्चर डिवेलप हो रहा है.
"राज्य में सरकार कहती है कि यह केंद्र का मामला है लेकिन जब यही गठबंधन की सरकार केंद्र में भी है और डबल इंजन की सरकार है तो सरकार फिर भी सही जवाब नहीं दे रही. दूसरे राज्यों में जहां एएमयू की शाखा खुली, वहां शैक्षणिक स्थिति काफी बेहतर है."-सैयद फैसल अली, विधान पार्षद, आरजेडी

समग्र रणनीति की जरूरत: शिक्षाविद प्रोफेसर बीएन प्रसाद कहते हैं कि बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था में सुधार केवल प्रशासनिक आदेशों से नहीं होगा. इसके लिए एक समग्र रणनीति की जरूरत है. नैक के मानकों को केवल ग्रेड पाने का जरिया नहीं, बल्कि संस्थागत सुधार का रोडमैप मानना होगा. हर कॉलेज और विश्वविद्यालय को अपने स्तर पर यह देखना होगा कि पाठ्यक्रम कैसे बेहतर हों, शिक्षक कैसे प्रशिक्षित हों, रिसर्च को कैसे बढ़ावा मिले और इंफ्रास्ट्रक्चर को कैसे आधुनिक बनाया जाए. साथ ही, सरकार को भी फंड आवंटन के साथ-साथ उसकी निगरानी और मूल्यांकन की व्यवस्था मजबूत करनी होगी.
बाजार सिद्धांत पर चल रही शिक्षा: प्रो. बीएन प्रसाद ने कहा कि जो आज का समाज है वह बाजार के मूल्य से और बाजार के सिद्धांत से संचालित हो रहा है. बाजार के आवश्यकता के अनुरूप शिक्षा है तो संस्थान का महत्व है. यही कारण है कि जब एनआईआरएफ रैंकिंग होती है तो आईआईटी और एनआईटी को छोड़कर कोई दूसरा संस्थान नहीं टिकता और राज्य के रेगुलर यूनिवर्सिटी देश के टॉप 100 में भी नहीं आते हैं. बाजार के अनुरूप बिहार के यूनिवर्सिटी में शिक्षा नहीं होने के कारण यहां बजट की कमी है. बजट की कमी होने से शिक्षक की कमी है, लेबोरेटरी में सामान की अनुपलब्धता है.
"यहां की यूनिवर्सिटीज में लगभग 50-60% शिक्षकों के पद रिक्त हैं. ऐसे में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा संभव नहीं और शिक्षा गुणवत्तापूर्ण नहीं होगी तो रैंकिंग में भी सुधार नहीं होगा. दूसरी बात यह है कि बाजार के अनुरूप यदि हम अपने युवाओं को डालने की कोशिश करते हैं तो जो सामाजिक कंसर्न है, जो समाज के लिए दृष्टिकोण है उसमें कमी आ जाएगी. यह पूरे सामाजिक संरचना को प्रभावित कर देगा."-प्रोफेसर बीएन प्रसाद, शिक्षाविद

पीयू के सभी कॉलेजों को निर्देश: पटना विश्वविद्यालय के डीन स्टूडेंट वेलफेयर प्रो. अनिल कुमार ने कहा कि विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर नमिता सिंह के निर्देश पर न्यायिक मूल्यांकन के लिए संस्थाओं की गुणवत्ता सुधार की विस्तार पूर्वक जानकारी दी गई है. विश्वविद्यालय के सभी कॉलेजों के प्रिंसिपल और एडमिनिस्ट्रेशन से जुड़े लोगों को निर्देश दिया गया है कि नेक प्रक्रिया में बेहतर करने के लिए तैयारी करें.
"नैक मूल्यांकन संस्थाओं की गुणवत्ता सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है और इसके लिए सभी महाविद्यालयों को योजनाबद्ध तरीके से कार्य करने के लिए कहा गया है."-प्रो. अनिल कुमार, डीन, स्टूडेंट वेलफेयर, पटना विश्वविद्यालय
ये भी पढ़ें-
बिहार के 73000 नियोजित शिक्षक बनेंगे सरकारी टीचर, दिया जाएगा एक मौका, नीतीश कुमार का ऐलान
जदयू के 9 मंत्री भाजपा के 14 मंत्रियों पर भारी, जानिए बिहार बजट का असली खेल

