बिहार में अद्भुत 'अदृश्य पुल', शेरशाह सूरी से जुड़ा है इतिहास
बिहार में एक ऐसा पुल है जो कभी-कभी अदृश्य यानी गायब हो जाता है. खासकर बरसात के दिनों में यह आपको नजर नहीं आयेगा. पढ़ें.

Published : February 21, 2026 at 3:00 PM IST
रिपोर्ट: रवि कुमार
रोहतास: देश में कई ऐतिहासिक पुल अपनी बनावट और कहानी के लिए मशहूर हैं, लेकिन बिहार में मौजूद एक ऐसा पुल है जो सचमुच लोगों को हैरान कर देता है. यह पुल बरसात के दिनों में आंखों से ओझल हो जाता है और गर्मी या सर्दी के मौसम में फिर से धरती पर उभर आता है, मानो इतिहास खुद पानी से बाहर निकलकर सामने आ गया हो.
कहां है बिहार का अद्भुत अदृश्य पत्थर पुल?: करीब 500 वर्ष पूर्व ऐतिहासिक ग्रैंड ट्रंक रोड के विस्तार के दौरान सोन नदी के बीचों-बीच इस अद्भुत पत्थर पुल का निर्माण कराया गया था. बताया जाता है कि यह पुल रोहतास और औरंगाबाद को जोड़ता है. भारी भरकम पत्थरों के स्लीपर से बना यह पुल लगभग 3:30 किलोमीटर लंबा और करीब 17 फीट चौड़ा है.
शेरशाह सूरी ने करवाया था निर्माण: इलाके के लोग बताते है कि इस ऐतिहासिक पुल को मध्यकाल में अफगान शासक शेरशाह सूरी के द्वारा बनवाया गया था. उनके शासनकाल 1540 से 1545 के दौरान उनके प्रशासनिक और सामरिक महत्व का हिस्सा थी. उन्होंने इस क्षेत्र में विकास के काफी कार्य कराए थे. शेरशाह सूरी ने क्षेत्र में सड़क नेटवर्क, सामरिक और अन्य बुनियादी ढांचे का निर्माण किया जो सोन नदी के पास से गुजरा था.
बारिश में डूब जाता है पुल: इलाके की वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र तिवारी बताते हैं कि डेहरी ऑन सोन में शेरशाह सूरी के द्वारा बनवाया गया यह पत्थरों के पटिए का पुल वाकई में अद्भुत है. बरसात के दिनों में जैसे-जैसे सोन नदी का जलस्तर ऊपर बढ़ता है, यह पुल पानी के अंदर चला जाता है. लेकिन जब पानी का स्तर नीचे जाता है तो यह पत्थर का ऐतिहासिक पुल साफ नजर आने लगता है.

"पुल जीटी रोड का हिस्सा रहा है और यह प्राचीन कारीगरी का शानदार नमूना है. ठीक सोन नदी के बीचों-बीच तकरीबन 3 किलोमीटर लंबी इस पत्थर के पुल की चौड़ाई 17 फीट है. यह उस जमाने में इतने बेहतरीन व मजबूत तरीके से बनवाया गया था कि आज भी इसके पत्थर जस के तस हैं. पुल के एक-एक स्लीपर की लंबाई तकरीबन 9 से 10 फीट है."- सुरेंद्र तिवारी,वरिष्ठ पत्रकार
पुल के अस्तित्व पर मंडरा रहा खतरा: कहते हैं कि जब शेरशाह सूरी का साम्राज्य था तो उन्होंने पूरे देश में खासकर सड़क मार्ग को काफी व्यवस्थित किया था. उसी दौर में आवागमन के लिए इस पुल का निर्माण कराया गया था. हालांकि जैसे-जैसे समय बदलता गया, इस पुल की उपयोगिता लगभग खत्म-सी हो गई. अब सोन नदी पर आधुनिक पुल बन चुके हैं.

अवैध बालू खनन से पुल पर बढ़ा खतरा: ये ब्रिज बिहार के लिए ऐतिहासिक धरोहर है, लेकिन सोन नदी में बालू के अवैध खनन का असर भी इस पुल पर पड़ा रहा है. इसके चलते पुल जमींदोज होने के कगार पर है. ऐसे मे अब इस प्राचीन धरोहर को संरक्षित करने की दिशा में कारगर कदम उठाने के कवायद की जरूरत है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस पुल को देख सकें.
प्रशासनिक लापरवाही से चिंता: सुरेंद्र तिवारी का कहना है कि पुरात्तव विभाग के उदासीन रवैए और स्थानीय प्रशासन की लापरवाही से इस ऐतिहासिक धरोहर का अस्तित्व मिटता जा रहा है. सबसे चिंता की बात है कि पुरातत्व विभाग की उदासीनता और स्थानीय प्रशासन की लापरवाही के कारण धरोहर धीरे-धीरे क्षरण का शिकार हो रही है. यदि समय रहते संरक्षण के प्रयास नहीं किए गए आने वाली पीढ़ियां इस अदृश्य पुल की कहानी केवल किताबों में ही पढ़ेंगी.

सरकार से ब्रिज के संरक्षण की मांग: अक्स सामाजिक संस्था के अध्यक्ष कमलेश कुमार ने इस मुद्दे को उठाने के लिए ईटीवी भारत का धन्यवाद दिया. उन्होंने कहा कि एक तरफ सरकार जहां धरोहरों को संरक्षित करने की बात कहती है, बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं. वहीं रोहतास के डेहरी ऑन सोन में शेरशाह सूरी के द्वारा बनवाया गया यह पत्थरों के स्लीपर का ब्रिज लुप्त होने के कगार पर है. सरकार को इसे संरक्षित करना चाहिए.

"ईटीवी भारत की पहल को दिल से धन्यवाद है कि पहली बार किसी मीडिया प्लेटफॉर्म ने इस मुद्दे को उठाया है. सरकार को चाहिए कि विशेष कार्य योजना बनाकर इस प्राचीन धरोहर को संरक्षित करे, ताकि यह ध्वस्त न हो."- कमलेश कुमार, अध्यक्ष, अक्स सामाजिक संस्था
स्थानीय निवासी भीम सिंह ने कहा कि जब इस इलाके में आवागमन के साधन नहीं थे, तब शेरशाह सूरी के द्वारा ठीक सोन नदी के बीचो-बीच पुल का निर्माण कराया गया था. इस पुल के माध्यम से आवागमन के साथ-साथ बड़े-बड़े वाहन भी आते जाते थे. यानी कहा जाए तो दिल्ली से कोलकाता तक इस पुल को पार कर लोग आते-जाते थे.

"यह पुल इस इलाके के लोगों के लिए किसी लाइफ लाइन से कम नहीं थी, लेकिन सोन के बीच बालू के अवैध खनन ने भी इस पुल को जमींदोज करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. सरकार इस धरोहर को संरक्षित करने की दिशा में उचित कदम उठाए."- भीम सिंह, स्थानीय निवासी

सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक: गौरतलब है कि यह पुल सिर्फ पत्थरों का ढांचा नहीं बल्कि भारत की मध्यकालीन इंजीनियरिंग, प्रशासनिक दूरदृष्टि और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है. जरूरत है कि इसे संरक्षित किया जाए, शोध किया जाए और पर्यटन मानचित्र पर उचित स्थान दिया जाए ताकि यह 500 साल पुरानी कहानी आने वाले 500 साल तक भी यू ही जीवित रहे.

आधुनिक पुल ने समाप्त की ऐतिहासिक पुल की उपयोगिता: बहरहाल समय के साथ सोन नदी पर आधुनिक पुल बन गए और आवागमन के नए साधन विकसित हो गए. नतीजन इस ऐतिहासिक पुल की उपयोगिता लगभग समाप्त-सी हो गई है. आज यह पुल केवल इतिहास की एक मौन गवाही बनकर रह गया है.
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