यहां दिमाग, आंख, कान, नाक का इलाज नहीं होगा; बिहार के 38 करोड़ी 'मॉडल अस्पताल' बीमार
बिहार का यह मॉडल अस्पताल विशेषज्ञ डॉक्टरों और जांच उपकरणों की कमी के कारण खुद बीमार पड़ गया है, अटल बिहारी पांडे की रिपोर्ट.

Published : July 1, 2026 at 2:59 PM IST
गोपालगंज: बिहार स्वास्थ्य विभाग का एक 'मॉडल अस्पताल' है, जहां आंख, कान, नाक और दिमागी बीमारियों का इलाज करने वाले डॉक्टर नहीं हैं. यही नहीं, यहां पर ना ही कोई एक्स-रे होगा और ना ही कोई खून या फिर पेशाब जांच होगी, क्योंकि यहां रेडियोलॉजिस्ट और पैथोलॉजिस्ट दोनों नहीं हैं.
नाम बड़े और दर्शन छोटे की कहावत: हम बात कर रहे हैं गोपालगंज जिले के उस अस्पताल की, जिसे मॉडल अस्पताल का तमगा मिला है. यह अस्पताल 'नाम बड़े और दर्शन छोटे' की कहावत को पूरी तरह चरितार्थ कर रहा है. 38 करोड़ की भारी-भरकम लागत से इसका निर्माण किया गया था, ताकि जिले की 30 लाख की आबादी को सीधा लाभ मिल सके. लेकिन दुर्भाग्य है कि यहां आज भी मरीजों को बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं का घोर अभाव है.
गरीब मरीजों पर दोहरी मार: ईएनटी, रेडियोलॉजिस्ट, पैथोलॉजिस्ट, साइकेट्रिक, चर्म, न्यूरोलॉजी और टीबी जैसी गंभीर बीमारियों के मरीजों को इलाज के लिए निजी अस्पतालों या अन्य शहरों पर निर्भर रहना पड़ता है. कई विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद रिक्त पड़े हैं या उन्होंने इस्तीफा दे दिया है. डॉक्टरों के साथ-साथ जीएनएम और अन्य नर्सों की संख्या में भी भारी कमी दर्ज की गई है.

"हम दूर-दराज के गांवों से भाड़ा लगाकर इस उम्मीद में आते हैं कि यहां बड़ा अस्पताल है, अच्छा इलाज होगा, लेकिन यहां आने पर पता चलता है कि चर्म रोग के डॉक्टर साहब नहीं हैं. हमारे जैसे गरीबों के लिए यह मॉडल अस्पताल नहीं, बल्कि एक मुसीबत का केंद्र बन गया है." - हरेंद्र कुमार, मरीज के परिजन
अस्पताल में डॉक्टरों का हाल: सामान्य डॉक्टर के कुल स्वीकृत पद 24 हैं, लेकिन महज 15 डॉक्टर ही कार्यरत हैं. वहीं फिजीशियन का स्वीकृत पद 4 है लेकिन केवल 1 मौजूद है. सर्जन तीन हैं लेकिन केवल एक की मौजूदगी है. अस्पताल में गाइनी के आठ पदों में से 5 डॉक्टर मौजूद हैं. एनेथिसिया के 8 पदों में से केवल 1 मौजूद है. नेत्र रोग विशेषज्ञ के 2 में से सिर्फ 1 मौजूद है. ईएनटी के 2 में से दोनों पद खाली पड़े हैं. रेडियोलॉजिस्ट के सभी 5 पद रिक्त हैं. पैथोलॉजिस्ट का 1 पद स्वीकृत है लेकिन यह भी खाली है. साइकेट्रिक का पद भी खाली है.
प्रशासनिक स्टाफ का भी टोटा: अस्पताल में क्लर्क के 74 स्वीकृत पदों में से 53 पद खाली हैं. वहीं जीएनएम का स्वीकृत पद 200 है लेकिन 96 पद खाली पड़े हैं, जिसमें केवल 77 वर्किंग हैं और 19 जीएनएम डेपुटेशन पर चल रही हैं. इसके अलावा, अस्पताल आधुनिक जांच उपकरणों की गंभीर समस्या से भी जूझ रहा है. संसाधनों की इस कमी से संकट गहरा गया है.

मरहम पट्टी केंद्र बना मॉडल अस्पताल: संसाधनों और डॉक्टरों की इस कमी के कारण यह मॉडल अस्पताल केवल 'प्राथमिक उपचार केंद्र' बनकर रह गया है. यह अब सिर्फ मरहम-पट्टी तक ही सीमित होकर रह गया है. दुर्घटना या किसी गंभीर बीमारी की स्थिति में अस्पताल प्रशासन के हाथ-पांव फूल जाते हैं. नतीजतन, आपातकालीन स्थिति में अधिकांश मरीजों को तुरंत बाहर भेज दिया जाता है.
पटना और गोरखपुर का सफर: गंभीर मरीजों को बेहतर इलाज के लिए तुरंत उत्तर प्रदेश के गोरखपुर या राजधानी पटना के लिए रेफर कर दिया जाता है. रेफर किए गए मरीजों में से कई आर्थिक रूप से इतने कमजोर होते हैं कि वे बाहर के महंगे इलाज का खर्च नहीं उठा पाते. वहीं, कई मरीज तो रास्ते की लंबी दूरी तय करते-करते दम तोड़ देते हैं.
कागजी खानापूर्ति बंद करने की मांग: जनता की मांग है कि सरकार और स्वास्थ्य विभाग सिर्फ कागजी खानापूर्ति बंद करे. इस मॉडल अस्पताल में डॉक्टरों की स्थायी व पर्याप्त नियुक्ति की जाए. अस्पताल में आधुनिक वेंटिलेटर, आईसीयू और ट्रामा सेंटर की सुविधा उपलब्ध कराई जाए, ताकि गोपालगंज के लोगों को अपने ही जिले में सही और समय पर मुफ्त इलाज मिल सके.

क्या होता है मॉडल अस्पताल?: मॉडल अस्पताल का मुख्य उद्देश्य मरीजों को गुणवत्तापूर्ण, आधुनिक और किफायती स्वास्थ्य सेवाएं एक ही छत के नीचे उपलब्ध कराना है. ये अस्पताल उन्नत तकनीक, आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल प्रबंधन प्रणाली से लैस होते हैं. इनमें ओपीडी, इमरजेंसी, आईसीयू और एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड की सुविधा एक ही जगह होती है ताकि मरीजों को न भटकना पड़े.
तकनीक के नाम पर सिर्फ ढांचा: इन अस्पतालों में संक्रमण मुक्त मॉड्यूलर ओटी होते हैं, जो सी-सेक्शन, आई ऑपरेशन और अन्य जटिल सर्जरी के लिए अत्यधिक सुरक्षित और आधुनिक होते हैं. मरीजों की बदलती जरूरतों के अनुसार चौड़े फ्रेम, आधुनिक मॉनिटर और वेंटिलेटर से युक्त सुसज्जित बेड होते हैं. कई मॉड्यूलर अस्पताल प्रीफैब्रिकेटेड संरचनाओं से बनते हैं, जिन्हें कम समय में तैयार किया जा सकता है.
डिजिटल सिस्टम की जमीनी हकीकत: मॉडल अस्पताल डिजिटल मैनेजमेंट सिस्टम का उपयोग करते हैं, जिससे मरीजों का रजिस्ट्रेशन, दवाओं की उपलब्धता और बिलिंग का कार्य पारदर्शी और त्वरित होता है. लेकिन गोपालगंज के इस कथित अस्पताल परिसर में कदम रखते ही बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव साफ नजर आने लगता है. यहां की हकीकत दावों से कोसों दूर दिखाई देती है. इस अस्पताल में सिर्फ इलाज की कमी नहीं है, बल्कि साफ-सफाई की भी कमी है. नाली का पानी अस्पताल परिसर में फैला रहता है. हल्की बारिश से जलजमाव जैसी स्थिति हो जाती है.

गरीबों की लाचारी का फायदा: गोपालगंज और आसपास के ग्रामीण इलाकों के गरीब लोग निजी अस्पतालों का भारी-भरकम खर्च उठाने में असमर्थ हैं. उनके लिए यह सरकारी अस्पताल ही एकमात्र सहारा है. लेकिन जब मॉडल अस्पताल ही सिर्फ रेफरल सेंटर बनकर रह जाए, तो मरीज जाएं तो जाएं कहां. कागजी आंकड़ों में आंकड़ों की बाजीगरी करके वाहवाही लूटना बेहद आसान है.
भाड़ा लग गया पर इलाज नहीं: मरीजों का कहना है कि हम दूर-दराज के गांवों से वाहन किराये पर लेकर इस उम्मीद में आते हैं कि यहां बड़ा अस्पताल है, अच्छा इलाज होगा. लेकिन यहां आने पर पता चलता है कि चर्म रोग के डॉक्टर साहब नहीं हैं. हमारे जैसे गरीबों के लिए यह मॉडल अस्पताल नहीं, बल्कि एक मुसीबत का केंद्र बन गया है.
रास्ते में दम तोड़ते लोग: मरीज के परिजन हरेंद्र कुमार और रोहित कुमार का कहना है कि थोड़ा सा पैर या सिर में चोट लगे तो यहां से तुरंत पटना या गोरखपुर रेफर किया जाता है. गंभीर मरीज वहां जाते-जाते रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं. अगर यहां रेफर न करके प्रॉपर तरीके से इलाज होता तो गरीबों की जान आसानी से बच सकती थी.
प्राइवेट लोग कर रहे मरहम पट्टी: अस्पताल में न तो आईसीयू की व्यवस्था है और न ही ट्रामा सेंटर है, जिससे लोगों की जान रास्ते में जा रही है. कई विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है. पर्याप्त स्टाफ की कमी कहें या लापरवाही, यहां प्राइवेट लोग मरीजों को मरहम-पट्टी और ड्रेसिंग करते हैं. सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह से निजी हाथों के भरोसे चल रही है.
"थोड़ा सा पैर या सिर में चोट लगे तो यहां से तुरंत पटना या गोरखपुर रेफर किया जाता है. गंभीर मरीज पटना या गोरखपुर जाते-जाते रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं. इतना ही नहीं यहां आईसीयू, ट्रामा सेंटर की व्यवस्था नहीं है. विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है. स्टाफ की भी भारी कमी है." - रोहित कुमार, मरीज के परिजन

सिविल सर्जन का दावा: इस अव्यवस्था पर गोपालगंज के सिविल सर्जन डॉ. बीरेंद्र प्रसाद का कहना है कि हमारे यहां किसी चीज की कोई कमी नहीं है. कुछ विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है जिसे आंतरिक रूप से मैनेज किया जाता है. मरीजों को कोई असुविधा न हो उसका पूरा ध्यान रखा जाता है. विभाग पूरी मुस्तैदी से काम कर रहा है.
"हमारे यहां किसी चीज की कोई कमी नहीं है. कुछ विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है, जिसे मैनेज किया जाता है. मरीजों को कोई असुविधा ना हो उसका ध्यान रखा जाता है. डॉक्टर या मानव बल की कमी के लिए विभाग को सूचित किया गया है." - डॉ. बीरेंद्र प्रसाद, सिविल सर्जन, गोपालगंज
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