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रुढ़िवादी सोच पर प्रहार:बिहार की गुड़िया ने बदली ग्रामीण महिलाओं की किस्मत, सैनिटरी पैड को बनाया आत्मनिर्भरता का हथियार

मुजफ्फरपुर की गुड़िया देवी ने जीविका समूह के साथ मिलकर सैनिटरी पैड यूनिट शुरू की और ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया.

SANITARY PAD MANUFACTURING UNIT
बिहार की गुड़िया देवी (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Bihar Team

Published : July 6, 2026 at 7:10 AM IST

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मुजफ्फरपुर: बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित सकरा प्रखंड के सरमस्तपुर पंचायत में महिलाओं ने आत्मनिर्भरता की ऐसी मिसाल पेश की है, जो सिर्फ रोजगार तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य, जागरूकता और सामाजिक बदलाव की नई कहानी भी लिख रही है. यहां जीविका से जुड़ी महिलाएं अब सैनिटरी पैड का निर्माण कर रही हैं. इस पहल ने ग्रामीण महिलाओं को रोजगार देने के साथ-साथ मासिक धर्म स्वच्छता को लेकर जागरूकता भी बढ़ाई है. इस बदलाव के केंद्र में हैं सच्ची सहेली स्वावलंबी सहकारी समूह की अध्यक्ष गुड़िया देवी, जिनकी कहानी संघर्ष, सपनों और हौसले की मिसाल बन चुकी है.

गुड़िया का संघर्ष: गुड़िया देवी कभी एक साधारण छात्रा थीं. उन्होंने इंटर आर्ट्स की पढ़ाई की थी और आगे पढ़कर समाज के लिए कुछ बड़ा करने का सपना देखा था. साल 2006 में उनकी शादी अमरेंद्र कुमार से हो गई. शादी के बाद घर-परिवार की जिम्मेदारियों के बीच उनका सपना कहीं पीछे छूट गया. पति मजदूरी करते थे और परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी. ऐसे में समाज के लिए कुछ बड़ा करने का उनका सपना अधूरा सा लगने लगा.

बिहार की गुड़िया देवी (ETV Bharat)

जीविका से जुड़ाव: हालांकि किस्मत ने उनके लिए कुछ और ही तय कर रखा था. साल 2012 में गुड़िया देवी जीविका से जुड़ीं. शुरुआत में यह उनके लिए सिर्फ एक समूह से जुड़ने जैसा था, लेकिन धीरे-धीरे यह मंच उनके सपनों को नई उड़ान देने लगा. साल 2022 में जीविका की टीम उनके गांव पहुंची और महिलाओं को सैनिटरी पैड के उपयोग तथा मासिक धर्म स्वच्छता के बारे में जानकारी दी.

गुड़िया का संकल्प: इसी दौरान गुड़िया देवी ने महसूस किया कि ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी अधिकांश महिलाएं पुराने कपड़ों का इस्तेमाल करती हैं, जिससे संक्रमण और कई गंभीर बीमारियों का खतरा बना रहता है. गुड़िया बताती हैं कि उन्होंने अपने आसपास कई महिलाओं को इन समस्याओं से जूझते देखा था. जब उन्हें सैनिटरी पैड के महत्व और उससे होने वाले स्वास्थ्य लाभ के बारे में बताया गया, तो उन्होंने उसी समय तय कर लिया कि वह अपने गांव और आसपास की महिलाओं के लिए कुछ करेंगी.

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पैड की कटिंग करती महिलाएं (ETV Bharat)

प्रशिक्षण से निर्माण तक का सफर: गुड़िया देवी का लक्ष्य सिर्फ पैड बनाना नहीं था, बल्कि महिलाओं के स्वास्थ्य और सम्मान की रक्षा करना भी था. इसके बाद उन्होंने अन्य महिलाओं के साथ सैनिटरी पैड निर्माण की ट्रेनिंग ली. कई महीनों तक प्रशिक्षण चला, जिसमें मशीन संचालन से लेकर पैकिंग और गुणवत्ता नियंत्रण तक की बारीकियां सिखाई गईं. प्रशिक्षण के बाद उनके कार्य और समर्पण को देखते हुए जीविका की ओर से उन्हें अनुदान पर मशीन उपलब्ध कराई गई. साथ ही गांव के एक सरकारी भवन में उत्पादन यूनिट शुरू करने की व्यवस्था भी की गई.

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ETV Bharat GFX (ETV Bharat)

पैकेजिंग और कीमत: आज सच्ची सहेली स्वावलंबी सहकारी समूह के तहत 31 महिलाएं सैनिटरी पैड निर्माण कार्य से जुड़ी हुई हैं. यह महिलाएं प्रतिदिन लगभग 2500 से 3000 सैनिटरी पैड तैयार कर रही हैं. एक पैकेट में 6 पैड पैक किए जाते हैं. इसकी बाजार कीमत लगभग 45 रुपये है, जबकि थोक में इसकी कीमत 28 रुपये रखी गई है ताकि अधिक से अधिक महिलाओं तक यह कम लागत पर पहुंच सके.

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महंगे ब्रांड्स को टक्कर: गुड़िया देवी बताती हैं कि एक सैनिटरी पैड की उत्पादन लागत लगभग 3 रुपये आती है. बावजूद इसके उनकी कोशिश रहती है कि ग्रामीण महिलाओं को कम कीमत पर बेहतर गुणवत्ता वाला उत्पाद मिले. उनके द्वारा बनाए गए पैड की खासियत यह है कि इसमें लगभग 200 ग्राम तक ब्लड सोखने की क्षमता है. समूह की महिलाओं का दावा है कि गुणवत्ता के मामले में उनका पैड बाजार में उपलब्ध कई महंगे ब्रांड्स को टक्कर देता है.

"एक सैनिटरी पैड की उत्पादन लागत लगभग 3 रुपये आती है. हमारी कोशिश होती है कि ग्रामीण महिलाओं को कम कीमत पर बेहतर गुणवत्ता वाला उत्पाद मिले. हमारे पैड की खासियत यह है कि इसमें लगभग 200 ग्राम तक ब्लड सोखने की क्षमता है."- गुड़िया देवी, सहकारी समूह की अध्यक्ष

कठिन शुरुआत: हालांकि गुड़िया देवी की शुरुआत आसान नहीं थी, उत्पादन शुरू होने के बाद सबसे बड़ी चुनौती बिक्री को लेकर सामने आई. ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं सैनिटरी पैड खरीदने के लिए तैयार नहीं थीं. जागरूकता की कमी और पुराने सोच की वजह से वे पैड की जरूरत को समझ नहीं पा रही थीं. इससे समूह की महिलाएं काफी निराश भी हुईं.

अपनाई नई रणनीति: गुड़िया देवी बताती हैं कि एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने पैड बनाना लगभग बंद कर दिया. लेकिन हार मानने के बजाय उन्होंने नई रणनीति अपनाई. समूह की महिलाएं गांव-गांव जाकर महिलाओं को मासिक धर्म स्वच्छता के बारे में समझाने लगीं. उन्होंने बताया कि गंदे कपड़ों के इस्तेमाल से संक्रमण, त्वचा रोग और गर्भाशय संबंधी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं. धीरे-धीरे महिलाओं की सोच बदलने लगी.

"किसी को सैनेटरी पैड के बारे में कोई जानकारी ही नहीं थी, किसी को पता ही नहीं था कि ये क्या होता है. गांव-गांव जाकर सबको जागरुक किया, सबको समझाया पैड के फायदे और कपड़े से होने वाले नुकसान बताए तब जाकर धीरे-धीरे बदलाव आया."- गुड़िया देवी, सहकारी समूह की अध्यक्ष

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महिलाएं हुईं जागरुक: जागरूकता अभियान का असर यह हुआ कि पहले कुछ महिलाएं जुड़ीं, फिर उनकी संख्या बढ़ती चली गई. आज सकरा प्रखंड के कई गांवों की महिलाएं सच्ची सहेली समूह द्वारा बनाए गए पैड का इस्तेमाल कर रही हैं. पैड की बिक्री जीविका दीदियों के नेटवर्क और गांव संगठन के माध्यम से भी की जा रही है. इसके अलावा वेलफेयर डिपार्टमेंट और कई गैर सरकारी संगठन भी इन पैड्स की खरीद कर रहे हैं.

रोजगार का मजबूत माध्यम: अब यह पहल सिर्फ स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रही, बल्कि रोजगार का मजबूत माध्यम भी बन गई है. पैड निर्माण से जुड़ी महिलाओं को आर्थिक आत्मनिर्भरता मिली है. हर पैड पर समूह को लगभग 2 रुपये तक की बचत हो रही है.अच्छी मार्केटिंग के बाद इससे समूह को बेहतर मुनाफा होने लगा है. मार्केटिंग और हिसाब-किताब के लिए भी जीविका दीदियों को जिम्मेदारी दी गई है.

लॉकडाउन में बढ़ीं मुश्किल: समूह से जुड़ी रेणु देवी की कहानी भी प्रेरणादायक है. वह बताती हैं कि पहले वह सिर्फ घर पर रहकर बच्चों की देखभाल करती थीं. उनके पति दूसरे प्रदेश में मजदूरी करते थे. लेकिन कोरोना लॉकडाउन के दौरान उन्हें घर लौटना पड़ा. लॉकडाउन में परिवार की जमा पूंजी लगभग खत्म हो गई और आर्थिक स्थिति बेहद खराब हो गई. हालात ऐसे हो गए कि परिवार के सामने रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो गया.

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कच्चे माल से पैड का निर्माण करती महिलाएं (ETV Bharat)

मशीन संचालन का काम: इसी दौरान रेणु देवी को गांव में सैनिटरी पैड निर्माण यूनिट की जानकारी मिली. उन्होंने जीविका से प्रशिक्षण लिया और काम से जुड़ गईं. आज वह उत्पादन प्रक्रिया का अहम हिस्सा हैं. वह सैनिटरी पैड को सैनिटाइज करने से लेकर मशीन संचालन तक का काम संभालती हैं. कम पढ़ी-लिखी होने के बावजूद उन्हें यह अच्छी तरह समझ है कि उत्पादन के दौरान स्वच्छता कितनी जरूरी है. वे कहती हैं कि जो मशीन है, उसमें एक बार में लगभग 1000 पैड सैनिटाइज किए जा सकते हैं और इसमें करीब 20 मिनट का समय लगता है.

जीवन में बड़ा बदलाव: गांव में ही रोजगार मिलना रेणु देवी के लिए सबसे बड़ी खुशी है, अब वह परिवार की आर्थिक मदद कर रही हैं और उनके दोनों बच्चे अच्छी पढ़ाई कर रहे हैं. रेणु देवी कहती हैं कि इस काम से उन्हें इतनी आमदनी हो जाती है कि परिवार सम्मानपूर्वक चल सके. हालांकि वह सटीक मासिक आय बताने से बचती हैं, लेकिन उनके चेहरे की मुस्कान यह बताने के लिए काफी है कि यह काम उनके जीवन में बड़ा बदलाव लेकर आया है.

निर्माण की प्रक्रिया: सैनिटरी पैड निर्माण की प्रक्रिया पूरी तरह स्वच्छता और मशीन आधारित प्रणाली से होती है. सबसे पहले पैड बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल एब्जॉर्बेंट शीट, कॉटन पल्प, टिश्यू लेयर और लीकेज-प्रूफ बैक शीट को तैयार किया जाता है. इसके बाद मशीन की मदद से इन सभी परतों को तय आकार में काटकर एक साथ जोड़ा जाता है. बीच की एब्जॉर्बेंट लेयर पैड की सबसे महत्वपूर्ण परत होती है, जो रक्त को तेजी से सोखने का काम करती है

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पैकेजिंग करती गुड़िया देवी (ETV Bharat)

आर्थिक फैसलों में भागीदारी: इसके बाद पैड को प्रेस मशीन से आकार दिया जाता है ताकि उसकी पकड़ मजबूत रहे. फिर तैयार पैड को सैनिटाइजेशन मशीन में रखा जाता है, जहां लगभग 20 मिनट तक उसे संक्रमण मुक्त किया जाता है. सैनिटाइज होने के बाद हर पैड की गुणवत्ता जांची जाती है, फिर उसे पैकिंग सेक्शन में भेजा जाता है. सिर्फ रेणु देवी ही नहीं, समूह से जुड़ी अनीता देवी समेत कई महिलाओं का कहना है कि सैनिटरी पैड निर्माण ने उनकी जिंदगी बदल दी है. पहले जहां वे घर की चारदीवारी तक सीमित थीं, वहीं अब वे आर्थिक फैसलों में भागीदारी कर रही हैं और परिवार में उनकी भूमिका मजबूत हुई है.

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गुड़िया देवी के समूह द्वारा निर्मित सैनिटरी पैड (ETV Bharat)

बदलाव की नींव: सकरा के सरमस्तपुर पंचायत की यह पहल दिखाती है कि जब महिलाओं को अवसर, प्रशिक्षण और मंच मिलता है तो वे न सिर्फ अपनी जिंदगी बदल सकती हैं, बल्कि पूरे समाज में बदलाव की नींव रख सकती हैं. गुड़िया देवी और उनकी टीम आज यह साबित कर रही है कि छोटे गांवों से भी बड़े बदलाव की शुरुआत हो सकती है. ये महिलाएं उदाहरण है इस बात की कि ग्रामीण भारत की नारी अब मजबूर नहीं है, वह किसी पर आश्रित भी नहीं है. वह खुद अपने समाज और आने वाली पीढ़ियों की नई भाग्य विधाता बन चुकी है.

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