बिहार का अनोखा स्कूल: यहां पढ़ाई बिल्कुल फ्री, पानी के लिए चुकानी होती फीस
गया जिला स्थित स्कूल में नल-जल योजना ठप होने से शिक्षक अपनी जेब से चंदा कर बच्चों के लिए पानी खरीद रहे हैं. रिपोर्ट-सरताज अहमद

Published : August 29, 2026 at 5:35 PM IST
गया: बिहार में शिक्षा व्यवस्थाओं को लेकर सरकार लाख दावा कर ले कि सब कुछ ठीक ठाक है, लेकिन सरकारी विद्यालयों में समस्याओं का अंबार आज भी है. दिल्ली के जंतर मंतर पर शिक्षा व्यवस्थाओं को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन, देश भर में जेन जी के प्रदर्शन के बाद बिहार के भी अलग अलग हिस्सों से जेन अल्फ़ा सरकारों से शिकायतें करने में पीछे नहीं हट रही हैं.
कहीं भवन के जर्जर हालत में होने की शिकायतें हैं तो कहीं भवन विहीन विद्यालय, मिड-डे मील से लेकर शौचालय, विद्यालय तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क के नहीं होने के साथ मूलभूत सुविधाओं के अभाव की शिकायतें हैं. लेकिन बिहार के गया जिला के एक विद्यालय के छात्रों और शिक्षकों की अलग ही शिकायत है, उन्हें शौच के लिए भी पानी खरीदना पड़ता है.
आमस प्रखंड के तेतरिया टू गांव की रिपोर्ट: गया जिला मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर दूर आमस प्रखंड के तेतरिया टू गांव में एक प्राथमिक विद्यालय है. शिक्षक बृजनन्दन यादव ने बताया कि यहां अन्य सरकारी विद्यालयों की तरह ही मूलभूत सुविधाओं का घोर अभाव है. लेकिन यहां एक समस्या अन्य विद्यालयों से जरा हट कर और गंभीर है, यहां पानी की घोर समस्या है.
"पानी के लिए महीने में 1500 से 2000 रुपए की राशि खर्च करनी पड़ जाती है, इससे काफी परेशानी भी झेलनी पड़ती है. हमलोग आपस में पैसे जमा करके पानी पर खर्च करते हैं क्योंकि यह एक दिन या महीने की बात नहीं है." -बृजनन्दन यादव, शिक्षक
सालों भर पानी की समस्या: यह स्थिति सालों भर ऐसी ही रहती है, ऐसे में हमें पानी खरीदना मजबूरी है और कोई एक शिक्षक ऐसा करे तो भी अच्छा नहीं है. नवनीत कुमार शिक्षक बताते हैं कि इस गंभीर समस्या के बीच पहले कोई सुनने वाला नहीं था. पानी के साथ-साथ और कई समस्याएं हैं.

"डेढ़ दो सालों से पानी खरीद रहे हैं. गया का ये विद्यालय कई वर्षों से प्यासा है. पिछले डेढ़ सालों से प्यास बुझाने से लेकर खाना बनाने और शौच तक के लिए पानी खरीदा जा रहा है." -नवनीत कुमार, शिक्षक
दुखनी देवी का स्मार्ट मीटर: पानी बेचने वाली महिला दुखनी देवी का घर भी विद्यालय के पास ही है, वो कहती हैं कि यहां नल जल योजना तो फाइल में है लेकिन धरातल पर सही से उसको विकसित नहीं किया गया है. जिसकी वजह से गांव के हर घर या विद्यालय तक पानी नहीं पहुंचता है. विद्यालय वर्षों से त्राहिमाम कर रहा था बच्चों को पानी के लिए तरसते देखते थे तो विद्यालय को हमने पानी देना शुरू किया.
"मैं पैसे लेती हूं. क्योंकि ज्यादा सुखी संपन्न नहीं हूं. बिजली का कनेक्शन तो है लेकिन स्मार्ट मीटर है, ज्यादा खपत पर रिचार्ज खत्म हो जाता है. मैं स्कूल से पैसे नहीं लेती, लेकिन मेरी भी मजबूरी है. टंकी फुल करने में जितना यूनिट बिजली खपत होती है, उतने पैसे लेती हूं." -दुखनी देवी, पानी सप्लायर
गांव में नल जल योजना ने तोड़ा दम: नल जल योजना ने तोड़ा दम, हैरानी की बात तो यह है कि इस गांव में नल जल योजना की स्कीम आधी अधूरी है, विद्यालय तक नल जल स्कीम के तहत कार्य पूरे नहीं हुए हैं. विद्यालय में खुद की बोरिंग और चापानल नहीं होने की वजह से उसे दूसरे घर से पानी खरीदने पर निर्भर होना पड़ता है.

महिला कर रही है स्कूल की बड़ी मदद: विद्यालय के शिक्षकों का भी कहना है की जो काम पिछले कई सालों से सरकार इस विद्यालय के लिए नहीं कर पाई वो यहां की एक महिला विद्यालय के लिए कर रही है. हालांकि बदले में वह पैसे भी लेती है मगर इतना जरूर है कि समय पर पानी मिल जाता है.
शिक्षिकाओं को गंभीर तकलीफ: बच्चे तो पानी पीने या अन्य कामों के लिए घर चले जाते हैं लेकिन यहां शिक्षकों को अधिक समस्या होती थी. शौच के लिए भी पानी नहीं, स्कूल की शिक्षिका कुमारी रिजु कहती हैं कि विद्यालय में तो हम लोग पीने के लिए पानी अपने साथ बोतल में लेकर आते थे.
गर्मी और बरसात में प्यासे रहने की लाचारी: ठंड के मौसम में तो किसी तरह वो पानी पूरा हो जाता है लेकिन गर्मी और बरसात में अपने साथ लाया हुआ पानी खत्म हो जाता था, प्यास लगने के बाद भी पीते नहीं थे क्योंकि लंच में उसका उपयोग करना होता था. उसी पानी से हाथ भी धोते थे.
"प्यासे रहने की वजह से डिहाइड्रेशन की भी समस्या होती थी. विद्यालय में पीने के पानी की समस्या को देखते हुए हेडमास्टर साहब ने बड़े डब्बे में पानी खरीदना शुरू किया था. पहले दो जार पानी खरीदा जाता था. जब वो काफी नहीं हुआ तो 5 डिब्बा कर दिया गया. एक दिन में सिर्फ पानी पर 150 रुपए खर्च हो जा रहे थे तब पास के घर से पानी खरीदा जाने लगा." -कुमारी रिजु, शिक्षिका
खेतों में शौच का डर: विद्यालय की 5 वीं कक्षा की छात्रा बताती है की विद्यालय में शिक्षकों की कमी नहीं है, पढ़ाई भी अच्छी ही हो जाती है, कमी है तो सिर्फ संसाधनों की है, विद्यालय को पानी खरीद कर ही पीना पड़ता है. शौचालय नहीं होने की वजह से शौच के लिए खेतों में जाना पड़ता है.
भोजन बनाने के लिए भी नहीं था पानी: हेडमास्टर रवेंद्र कुमार रजक कहते हैं कि पानी मजबूरी में खरीदना पड़ रहा है. स्कूल के पास ज्यादा जगह नहीं है, गांव की सड़क के किनारे भवन स्थित है. पास में एक चापानल था जिस से पहले विद्यालय की पानी की जरूरत पूरी हो जाती थी.

बढ़ी पड़ोसी पर निर्भरता: लेकिन जब कई सालों वो खराब हो गया तो पानी की समस्या होने लगी. कुछ महीने तक गांव के घरों से पानी मांग मांग कर काम चलाया जा रहा था, लेकिन जब लोगों को नागवार गुजरने लगा तब फिर डब्बे का पानी खरीदने लगे. लेकिन जब उस से भी नहीं हुआ तब पड़ोस के एक घर से एक तरह से मोटर का किराया देकर पानी लिया जाने लगा है.
गांव में नलजल स्कीम के तहत एक बोरिंग हुई थी लेकिन गांव में पूरी तरह से पानी की सप्लाई नहीं है. विद्यालय की तरफ तो पानी की सप्लाई है ही नहीं जबकि कुछ घरों में अगर सप्लाई होती भी है तो वो भी अधूरा ही मामला है. विद्यालय का तो अपना अलग से सब कुछ होना चाहिए था लेकिन हुआ नहीं है ये बड़ी दुख वाली बात है. जगदेव यादव स्थानीय व्यक्ति.
"हमारा विद्यालय तो ऐसे बहुत अच्छा है, लेकिन यहां समस्याएं भी हैं. यहां सबसे बड़ी समस्या पानी और भवन की है. एक शौचालय है लेकिन स्कूल से दूरी पर स्थित है और उसका उपयोग शिक्षक और छात्र दोनों ही करते हैं." -रवेंद्र कुमार रजक, हेड मास्टर
शौचालय के बहाने घर भाग जाते हैं छात्र: एक शौचालय होने की वजह से काफी कठिनाई भी होती है, छात्र यहां से शौचालय के नाम पर जाते हैं और फिर वहां से वह घर चले जाते हैं जिसकी वजह से उनकी पढ़ाई भी बाधित होती है. हमारे विद्यालय में सबसे ज्यादा भवन की ही कमी है.
चबूतरे और मंदिर में लगती हैं कक्षाएं: इसके बारे में न सिर्फ विभाग को कई बार अवगत कराया गया है बल्कि स्थानीय स्तर पर भी पहल की गई है, ताकि ग्रामीण कुछ जगह दे दें तो समस्या दूर हो जाए. विद्यालय में सिर्फ दो कमरा है, जबकि छात्रों की यहां संख्या 200 से अधिक है.

बरसार और गर्मी में बढ़ती है बड़ी मुसीबत: क्लास के लिए बरामदा भी छोटा पड़ जाता है, इसकी वजह से स्कूल के बाहर गांव के चबूतरा, मंदिर और कम्युनिटी भवन में क्लास लगाई जाती है. ठंड में तो ज्यादा दिक्कत नहीं होती है लेकिन बरसात और गर्मी के दिनों में हमारे लिए यह एक बड़ी मुसीबत और चुनौती होती है. रवेंद्र कुमार रजक हेड मास्टर.
जगह की कमी से शिक्षा देने में भारी कठिनाई: 7 शिक्षक और रसोइया बहाल है, विद्यालय में शिक्षकों की कमी नहीं है, चार शिक्षक और तीन सेवा शिक्षक हैं. लेकिन जगह नहीं रहने के कारण शिक्षा देने में काफी कठिनाई होती है. हेडमास्टर के अनुसार उनके विद्यालय में अपना पानी का व्यवस्था नहीं है.
एक ही कक्षा में बेंच: हमारे पास सिर्फ एक ही कक्षा में बेंच टेबल है, जबकि और बच्चे जमीन पर बैठते हैं, इसलिए उन्हें घर भेजना मजबूरी हो जाती है. रवींद्र कुमार रजक. विद्यालय की एक छात्रा पिंकी कुमारी ने कहा कि विद्यालय में क्लास तो हर दिन लगती है. पढ़ाई शिक्षकों की वजह से नहीं बल्कि व्यवस्थाओं के कारण खराब हो रही है. वर्षा के बाद घर जाना पड़ता है क्योंकि विद्यालय के क्लास में पानी घुस जाता है. स्कूल के पास की सड़क भी खराब हो गई है क्योंकि पानी जमा होता है.

"खुले खेत में शौचालय जाना पड़ता है जिस से सांप बिच्छू के काटने का डर लगा रहता है. सरकार हमारे विद्यालय की स्थिति को सुधारे यहां शौचालय और पानी की व्यवस्था करे, विद्यालय कैंपस के पास से पानी भी निकाले ताकि हम लोग आसानी से बैठ कर पढ़ सकें." - पिंकी कुमारी छात्रा
ऐसा नहीं है कि इस समस्या से शिक्षा विभाग के अधिकारी बेखबर हैं, बल्कि वर्षों की समस्या से वो पूरी तरह अगवत हैं, मगर विद्यालय की सुध किसी के द्वारा अब तक नहीं लीगई है. शिक्षक और टोला सेवक मिला कर 7 शिक्षक कार्यरत हैं. इस संबंध में ईटीवी भारत के प्रतिनिधि ने आमस प्रखंड विकास पदाधिकारी नीरज कुमार राय से बात की तो उन्होंने मामले की जानकारी नहीं होने की बात कही. उन्होंने कहा कि उनके संज्ञान में मामला नहीं है."
"जेईई से इस संबंध में जांच कराएंगे. अगर पानी की व्यवस्था नहीं है तो चापानल को ठीक कराया जाएगा, गांव में नल जल की स्थिति को सुधारा जाएगा और अगर नलजल योजना के तहत स्कूल तक कार्य नहीं हुए हैं तो वो भी कराया जाएगा." -नीरज कुमार राय, BDO
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