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बिहार सरकार का बड़ा फैसला! घोड़परास और जंगली सुअरों से फसल क्षति पर दोगुना मुआवजा, जान जाने पर मिलेंगे 10 लाख

बिहार सरकार ने घोड़परास और जंगली सुअरों से फसल क्षति पर मुआवजा बढ़ा दिया है. प्रति हेक्टेयर 50,000 रुपये. मौत पर 10 लाख मुआवजा. पढ़ें-

Nilgai In Bihar
बिहार में नीलगाय (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Bihar Team

Published : January 9, 2026 at 10:18 AM IST

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नालंदा: बिहार के किसानों को लंबे समय से घोड़परास (नीलगाय) और जंगली सुअरों के आतंक से जूझना पड़ रहा है. इन जानवरों के झुंड फसलों को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा रहे हैं, जिससे कई किसान खेती छोड़ने को मजबूर हो गए हैं. सरकार ने इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए मुआवजे की राशि बढ़ाने के साथ-साथ इन जानवरों को नियंत्रित करने के लिए विशेष कदम उठाए हैं.

किसानों की बढ़ती परेशानी: बिहार के कई जिलों में घोड़परास और जंगली सुअरों की संख्या तेजी से बढ़ी है. अनुमान के अनुसार, 34 जिलों में घोड़परास की संख्या करीब तीन लाख और 30 जिलों में जंगली सुअरों की संख्या 67 हजार से अधिक है. किसानों ने बताया कि पटना और नालंदा के सीमावर्ती टाल क्षेत्रों समेत वैशाली, चंपारण, बक्सर जैसे जिलों में स्थिति सबसे गंभीर है. किसान गेहूं, सरसों, दलहन और सब्जियों की फसलें बचाने के लिए रात-दिन पहरा देने को मजबूर हैं.

बिहार में किसान को मुआवजा (ETV Bharat)

“अहरावा, गदनपुरा, मुर्तजापुर समेत दर्जनों गांवों में स्थिति भयावह है. घोड़परास के झुंड दिन-रात गेहूं, सरसों और दलहन की फसल रौंद रहे हैं. पहले मुनाफा कमाते थे, अब खेत परती छोड़ने को मजबूर हैं.”-किसान

फसल नुकसान पर बढ़ा मुआवजा: वन विभाग के नए प्रावधानों के तहत फसल क्षति पर प्रति हेक्टेयर 50,000 रुपये का मुआवजा दिया जाएगा. यदि 0.5 हेक्टेयर फसल नष्ट हुई तो 25,000 रुपये मिलेंगे. इससे पहले फसल नुकसान को मुआवजे के दायरे में नहीं शामिल किया गया था. मुआवजा जमीन मालिक के खाते में जाएगा, लेकिन बटाईदारों को लेकर अक्सर विवाद होता है. आवेदन के लिए किसानों को मुखिया से शिकायत कर कृषि पदाधिकारी के पास जमीन के कागजात सहित आवेदन देना होगा. जांच के बाद राशि जारी की जाएगी.

मानव हमले में राहत राशि दोगुनी: जंगली जानवरों के हमले में मौत होने पर अब 10 लाख रुपये मुआवजा मिलेगा, जो पहले 5 लाख था. गंभीर रूप से घायल होने पर 1.44 लाख रुपये और मामूली चोट पर 24 हजार रुपये का प्रावधान है. नालंदा के डीएफओ राजकुमार एम के अनुसार, ये बदलाव किसानों की समस्याओं को देखते हुए किए गए हैं.

मुखिया को मिला जानवर मारने का अधिकार: सरकार ने कैबिनेट स्तर पर फैसला लिया है कि पंचायती राज प्रतिनिधियों यानी गांव के मुखिया को घोड़परास और जंगली सुअरों को मारने का अधिकार दिया जाए. किसान प्रपत्र 'क' में आवेदन देकर शिकायत कर सकते हैं. वन विभाग ने 13 पेशेवर शूटर्स की सूची तैयार की है, जिन्हें मुखिया सीधे बुला सकते हैं. एक दिन में अधिकतम 50 जानवरों को मारा जा सकता है, लेकिन गर्भवती मादा और छोटे बच्चों को मारने पर सख्त प्रतिबंध है.

नियंत्रण अभियान की प्रक्रिया: शूटिंग के दौरान वन विभाग, पुलिस और राजस्व विभाग के अधिकारी मौजूद रहेंगे. जानवरों को मारने के बाद दफनाने की जिम्मेदारी भी मुखिया की होगी. यह अभियान मुख्य रूप से उन जिलों में चलाया जाएगा जहां फसल क्षति सबसे अधिक है. पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के साथ कृषि विभाग मिलकर इसकी निगरानी करेगा.

किसानों में उम्मीद की किरण: इस फैसले से किसानों में राहत की लहर है. पहले जहां वे असहाय महसूस कर रहे थे, अब मुआवजा और नियंत्रण के इन कदमों से खेती जारी रखने की उम्मीद जगी है. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय में वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को संरक्षित करने की जरूरत भी है ताकि मानव-वन्यजीव संघर्ष कम हो. सरकार का यह कदम किसानों की आय और खाद्य सुरक्षा को मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण है.

"फील्ड लेवल पर किसानों को इस नए नियम की जानकारी नहीं है. जिसके लिए जागरूकता फैलाई जा रही है. किसान इस योजना का लाभ उठाएं और डरने के बजाय मुखिया के माध्यम से समस्या का समाधान कराएं."-राजकुमार एम, डीएफओ, नालंदा

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