बिहार चुनाव में भी लगा AAP को झटका, केजरीवाल ने उतारे थे 99 उम्मीदवार; जानिए क्या हाल रहा?
बिहार के बहुकोणीय मुकाबले में आप ने अकेले ताल ठोकते हुए 99 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन पार्टी के लिए परिणाम बेहद निराशाजनक रहा.

Published : November 15, 2025 at 3:03 PM IST
नई दिल्ली: बिहार विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (AAP) ने अकेले दम पर मैदान में उतरकर एक बड़ा राजनीतिक दांव खेला. हालांकि, चुनावी नतीजों ने स्पष्ट कर दिया कि राष्ट्रीय फलक पर अपनी पहचान बना चुकी यह पार्टी, बिहार की जटिल और स्थापित चुनावी बिसात पर अपनी कोई खास छाप नहीं छोड़ पाई है. आम आदमी पार्टी का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा, जहां वह एक भी सीट जीतने में नाकाम रही. चुनाव मैदान में उतरे सभी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई.
सीटों का गणित और निराशाजनक प्रदर्शन
दिल्ली में (वर्ष 2015 और 2020) और पंजाब में प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाने वाली आम आदमी पार्टी ने इस बार बिहार की जनता को भी 'केजरीवाल मॉडल' के तहत गवर्नेंस का विकल्प देने की कोशिश की. पार्टी ने कुल 99 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे, जो 243 सदस्यीय विधानसभा के एक बड़े हिस्से को कवर करता है. पार्टी के बड़े नेताओं, जिनमें राज्यसभा सांसद संजय सिंह भी शामिल थे, ने उम्मीदवारों के लिए प्रचार किया, लेकिन जमीनी स्तर पर मतदाताओं के बीच अपनी पैठ बनाने में वे विफल रहे. पार्टी ने बड़ी उम्मीदों के साथ अलग-अलग चरणों में उम्मीदवारों की सूचियां जारी की थीं, जिसमें 11, 48, 28 और अंत में 12 उम्मीदवारों के नाम शामिल थे, लेकिन यह रणनीति चुनावी नतीजों में तब्दील नहीं हो सकी.

वोट प्रतिशत: हाशिए की लड़ाई
आम आदमी पार्टी के लिए सबसे बड़ा झटका उसका वोट प्रतिशत रहा. चुनाव आयोग के आधिकारिक आंकड़े और अंतिम विश्लेषणों से पता चलता है कि पार्टी को न्यूनतम वोट (0.30%) शेयर प्राप्त हुआ है. जबकि NOTA को 1.81फीसद 2025 के इस चुनाव में प्राप्त हुआ. पार्टी बिहार के मुख्य राजनीतिक दलों राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यूनाइटेड), और भारतीय जनता पार्टी, एलजेपी (रामविलास) के मजबूत गढ़ में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में असमर्थ रही.
चुनाव आयोग से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, आम आदमी पार्टी का कुल वोट प्रतिशत एक फीसद से भी काफी कम 0.30 फीसद रहा, जो बिहार जैसे बड़े राज्य में पार्टी के अस्तित्व को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है. कई सीटों पर, आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों को NOTA (उपर्युक्त में से कोई नहीं) और अन्य छोटी पार्टियों के उम्मीदवारों की तुलना में भी कम वोट मिले, जिससे उनकी जमानत तक जब्त हो गई. यह स्पष्ट है कि बिहार की जनता ने उनके 'विकास मॉडल' और राष्ट्रीय राजनीति से अलग पहचान को सिरे से नकार दिया.

बिहार में आप की असफलता के कारण
आम आदमी पार्टी की बिहार में असफलता के पीछे कई बड़े कारण रहे. राजनीतिक विश्लेषक जगदीश ममगांई ने बताया कि बिहार में आम आदमी पार्टी के पास कोई मजबूत और विश्वसनीय स्थानीय चेहरा नहीं था, जो केजरीवाल की अनुपस्थिति में पार्टी को आगे ले जा सके. केजरीवाल को इस नतीजे का अनुमान था, शायद यही वजह रही कि वे बिहार में चुनाव प्रचार के लिए नहीं गए. आप ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और महागठबंधन दोनों से दूरी बनाकर अकेले चुनाव लड़ा, जिससे उसका मुकाबला सीधे स्थापित और मजबूत क्षेत्रीय शक्तियों से हो गया.
बिहार के हर बूथ पर आप का संगठन मजबूत नहीं
आम आदमी पार्टी ने दिल्ली के विधायक अजेश यादव को बिहार का प्रभारी बनाया था, पार्टी का संगठन बिहार के हर बूथ और पंचायत स्तर पर उतना मजबूत नहीं हो पाया, जितना कि दिल्ली और पंजाब में है. बिहार की राजनीति जाति और क्षेत्रीय समीकरणों पर टिकी है. आम आदमी पार्टी की 'विकास की राजनीति' का नैरेटिव इन स्थापित समीकरणों को भेद नहीं पाया. राष्ट्रीय स्तर के बड़े प्रचारकों की कमी और सीमित संसाधनों के कारण पार्टी जनता तक अपना संदेश प्रभावी ढंग से नहीं पहुंचा पाई. जबकि पार्टी ने चुनाव आयोग को 40 नेताओं की सूची स्टार प्रचारकों के तौर पर सौंपी थीं.
बिहार में अज्ञानेश कुमार ने जीत का प्रमाण पत्र मोदी जी को पहले ही दे दिया था‼️
— AAP (@AamAadmiParty) November 14, 2025
👉 जिस राज्य में 80 लाख वोट काट दिए जायें और 5 लाख फ़र्ज़ी वोट बनाये जायें तो उस राज्य के चुनाव परिणाम का अंदाज़ा पहले ही लगाया जा सकता था
👉 इन्होंने दिल्ली में भी ऐसे ही किया था, नई दिल्ली विधानसभा… pic.twitter.com/KlWQrX6gI4
भविष्य की राह को लेकर पार्टी की नीति
बिहार विधानसभा चुनाव के निराशाजनक परिणाम आम आदमी पार्टी के लिए एक महत्वपूर्ण सबक है. यह दिखाता है कि दिल्ली का 'आप' मॉडल बिहार की सामाजिक-राजनीतिक हकीकत से काफी अलग है. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राकेश यादव कहते हैं कि बिहार में अपनी जगह बनाने के लिए, पार्टी को अब केवल अपनी नीतियों के प्रचार पर निर्भर रहने के बजाय, स्थानीय नेतृत्व विकसित करने और जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करना होगा. यह चुनाव एक स्पष्ट संदेश देता है कि बिहार की राजनीति में प्रवेश करना और सफलता हासिल करना एक लंबी और कठिन यात्रा है, जिसके लिए अपनी रणनीति में व्यापक बदलाव करने होंगे.
जिस राज्य में 80 लाख वोट काट दिए जायें और 5 लाख फ़र्ज़ी वोट बनाये जायें तो उस राज्य के चुनाव परिणाम का अंदाज़ा पहले ही लगाया जा सकता था. इन्होंने दिल्ली में भी ऐसे ही किया था, नई दिल्ली विधानसभा में BJP ने हज़ारों वोट कटवाये और हज़ारों फ़र्ज़ी वोट बनवाये थे.- संजय सिंह, सांसद आप
बता दें कि वर्ष 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में, आम आदमी पार्टी ने औपचारिक रूप से बिहार विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा था और न ही अपने कोई उम्मीदवार उतारे थे. पार्टी ने अपनी ऊर्जा और संसाधनों को दिल्ली पर केंद्रित रखा था और बिहार की राजनीति में सीधे हस्तक्षेप न करने का निर्णय लिया था. पार्टी उस समय दिल्ली और पंजाब जैसे राज्यों पर अपना संगठनात्मक आधार मजबूत करने पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रही थी, जहां वह पहले से ही सत्ता में थी.
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