अनोखी प्रतिज्ञा, शानदार खेल: बिहार के इस स्कूल में नौनिहालों का कमाल
गया में प्राथमिक विद्यालय खपिया के शिक्षक अनोखी पहलों, खेल और कुरीतियों के खिलाफ प्रतिज्ञा से बच्चों को शिक्षित कर रहे हैं. रिपोर्ट-रत्नेश कुमार

Published : August 23, 2026 at 5:36 PM IST
गया: जिला मुख्यालय से करीब 55-60 किलोमीटर दूर डोभी प्रखंड अंतर्गत प्राथमिक विद्यालय खपिया है. बिहार के गया का यह सरकारी स्कूल अनोखा है. इस विद्यालय की कई खासियत है, जो इसे अलग करती है. प्राथमिक विद्यालय खपिया में ऐसी कुछ बातें हैं, जो इसे अन्य स्कूलों से अलग पहचान दिलाती है.
नक्सल प्रभावित क्षेत्र का इतिहास: प्राथमिक विद्यालय खपिया कभी घोर नक्सल प्रभावित क्षेत्र रहा है. बिहार-झारखंड का सीमावर्ती यह क्षेत्र पिछड़ेपन और अशिक्षा का दंश झेलता चला आ रहा है. ऐसे सुदूरवर्ती इलाके में प्राथमिक विद्यालय खपिया के शिक्षकों की पहल से अब एक खूबसूरत तस्वीर बनती दिख रही है.

प्राथमिक विद्यालय खपिया संभवत बिहार का ऐसा पहला सरकारी विद्यालय है, जहां प्रतिदिन छात्र-छात्राओं को सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ शपथ दिलाई जाती है. यह शपथ प्रतिज्ञा के रूप में होती है. एक सरकारी विद्यालय में प्रतिदिन इस तरह की प्रतिज्ञा का चलन एक बड़ी पहल है, जिससे यह विद्यालय चर्चा में आया है.
साउंड बॉक्स पर गूंजती आवाज: यहां साउंड बॉक्स माइक के साथ प्रेयर शुरू होती है. माइक पर जब बच्चे प्रतिज्ञा लेते हैं, तो यह दृश्य अनोखा होता है. 1 से 5वीं कक्षा तक के छात्र-छात्राएं प्रतिदिन दहेज प्रथा, शराब और बाल विवाह के खिलाफ प्रतिज्ञा लेते हैं. प्रतिज्ञा लेते समय सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ बातें गूंजती हैं.
प्रेयर के समय यहां के नौनिहाल बच्चे बाल विवाह नहीं करेंगे, शराब पीना सही नहीं है, दहेज प्रथा ठीक नहीं है, ऐसी प्रतिज्ञा लेते हैं. साथ ही हम भविष्य में अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वाहन करेगें, यह भी शपथ लेते हैं. बच्चों के मुंह से निकली प्रतिज्ञा क्षेत्र को बदलने की बड़ी कवायद है.
शिक्षकों की सकारात्मक पहलों से बच्चों को भी काफी अच्छा लगता है. यही वजह है, कि यहां पढ़ने को आने वाले बच्चों की संख्या अच्छी खासी है. इस स्कूल में 114 बच्चे नामांकित हैं, जिसमें से 80 से 90 बच्चों की औसतन उपस्थित होती है. रोजाना 90% के करीब उपस्थिति बड़ी बात है.

गरीब तबके के विद्यार्थी: प्राथमिक विद्यालय खपिया में ज्यादातर गरीब और पिछड़ेपन के शिकार तबके के बच्चे पढ़ने आते हैं. इनमें से किसी के पिता मजदूर, किसी के पिता छोटे किसान तो किसी के पिता दूसरे राज्यों में मजदूरी या छोटी-मोटी नौकरियां करते हैं. विद्यालय के शिक्षकों के कारण बच्चे स्कूल आने में रुचि रखते हैं.
यहां पढ़ने वाले तीसरी कक्षा के छात्र संदीप कुमार के पिता दूसरे राज्य में काम करते हैं. अपने पिता के दूसरे राज्य में काम करने की गैर मौजूदगी के बीच यह बच्चा रोजाना पढ़ने के लिए अपने विद्यालय में आता है. शिक्षकों और प्रधान शिक्षक की पहल से बच्चों की अच्छी खासी रोजाना संख्या होती है.

खेल और रचनात्मक गतिविधियां: इस प्राइमरी स्कूल के बच्चों को विद्यालय में लाने के लिए कई प्रयास शिक्षकों द्वारा किए गए हैं. इसमें शतरंज और क्राफ्टिंग- पेंटिंग भी शामिल है. यहां के बच्चे पहली कक्षा से ही शतरंज की प्रेक्टिस करने लगते हैं. बच्चे क्रिकेट, फुटबॉल, कबड्डी तो खेलते ही हैं, शतरंज भी खेलने लगे है.
सर्वांगीण मानसिक विकास पर जोर: शतरंज खेलने को लेकर शिक्षकों का मानना है, कि इससे बच्चों के सर्वांगीण मानसिक विकास हो सकेंगे और बच्चा आगे चलकर अपना लक्ष्य आसानी से हासिल कर लेगा. वही, बच्चों में विभिन्न कलाओं को भी सिखाया जा रहा है, जिसमें क्राफ्टिंग और पेंटिंग भी शामिल है. शिक्षकों द्वारा इसकी शिक्षा दी जाती है.
कृषि और महापुरुषों की शिक्षा: प्रधान शिक्षक श्रीकांत कुमार बताते हैं कि कम उम्र से ही बच्चों को कृषि के बारे में भी जानकारियां दी जाती है. इस सरकारी स्कूल के बच्चे खेती-बाड़ी के बारे में भी अच्छी खासी जानकारी प्राप्त कर लेते हैं. वहीं, महापुरुषों और संघर्ष से आगे बढ़े हस्तियों के बारे में भी बच्चों को बताया जाता है, जिससे उन्हें प्रेरणा मिले.

मैरी कॉम से प्रेरणा: यहां बॉक्सिंग की चैंपियन मैरी कॉम के बारे में बताया जाता है, कि किस तरह से गरीबी से उठकर इंटरनेशनल चैंपियन बनी. चूंकि इस इलाके के बच्चे ज्यादातर गरीब तबके से आते हैं, तो उनके लिए ऐसी कहानी प्रेरणा भारी साबित हो सकती है. बच्चे कम उम्र में सामाजिक दायित्वों को सीख रहे हैं.
बुनियादी सुविधाओं का अभाव: इस विद्यालय में शिक्षकों की पहल के कारण काफी अनुशासन है. बच्चे अनुशासित होकर रहते हैं. हालांकि विद्यालय में सुविधाओं का थोड़ा अभाव भी है. इस विद्यालय में भवनों की घोर कमी है. यहां एक से पांच तक की कक्षा संचालित होती है, किंतु भवन सिर्फ दो हैं.
समस्याओं को दूर करने की जरूरत: भवन की कमी के कारण बच्चों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. वहीं, बच्चे आज भी जमीन पर ही बैठकर शिक्षा अर्जित कर रहे हैं. इस तरह अलग पहचान बनाने वाले इस स्कूल में व्याप्त समस्याओं को दूर करने की जरूरत है, ताकि बच्चों को कोई परेशानी न हो.
विशेष अवसरों की गाइडलाइन: प्राथमिक विद्यालय खपिया के प्रधान शिक्षक श्रीकांत कुमार बताते हैं, कि विशेष अवसरों पर बच्चों को शराबबंदी, दहेज प्रथा, बाल विवाह आदि सामाजिक कुरीतियों के संबंध में संकल्प दिलाने का गाइडलाइन सरकारी तौर पर होता है. बिहार सरकार के द्वारा विशेष अवसरों के लिए ऐसे गाइडलाइन आते हैं.

"हम लोग इसे रोजाना के दिनचर्या में शामिल करते हैं, ताकि बच्चे हमेशा इन कुरीतियों को याद रखें और इससे दूर रहें. हमारे विद्यालय के शिक्षकों की कई पहल ऐसी है, जो रंग ला रही है. इससे बच्चों में पढ़ाई के प्रति भावना जागती है." -श्रीकांत कुमार, प्रधान शिक्षक
गरीबी से उठकर संघर्ष करने की सीख: चूंकि बच्चे पिछड़े इलाके के हैं और काफी गरीबी तबके के बच्चे यहां आते हैं, तो उन्हें गरीबी का एहसास न हो. गरीबी से उठकर किस तरह से संघर्ष कर आगे बढ़ा जाता है, वह ऐसी कहानियों से प्रेरणा ले. इस तरह से कुछ खासियत हमारे विद्यालय को अन्य स्कूलों से अलग रखती है.
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