पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर में बनी चटाई की कीमत 30 हजार तक, 90 दिन में तैयार होती है एक मैट
भोपाल के राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में चल रहे शाश्वती उत्सव में पहुंचे बंगाल के कलाकार. साइपरेसी कुल के पौधे से तैयार होती है खास चटाई.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : December 31, 2025 at 11:05 PM IST
भोपाल: आमतौर पर चटाई की कीमत 200 से 1000 रुपए तक हो सकती है लेकिन टाटमी घास से बनने वाली चटाई की कीमत 20 हजार रुपए तक होती है. ऐसी ही चटाई लेकर भोपाल पहुंची हैं, पश्चिम बंगाल की हस्तशिल्प कलाकार रौली जांगा. उन्हें इस कला के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है. पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर जिले की यह चटाइयां अपनी खासियत के लिए प्रसिद्ध हैं. इसे साइपरेसी कुल के एक पौधे से तैयार किया जाता है.
मखमल जैसी चटाई
भोपाल के राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में चल रहे शाश्वती उत्सव में हस्तशिल्प कलाकार रौली जांगा पति तापस कुमार जांगा के साथ पहुंची हैं. तापस भी हस्तशिल्प के काम से जुड़े हुए हैं. रौली जांगा बताती हैं कि "पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर में बड़ी संख्या में लोग इस हस्तशिल्प से जुड़े हुए हैं. मुझे भी यह हुनर परंपरा में मिली. पुरखों से मेरे परिवार में घास से चटाई बनाने का काम होता आया है. या यूं कहें कि यही हमारी रोजी-रोटी का जरिया है.
शादी के बाद पति तापस कुमार जांगा के साथ इस काम में जुट गई. यह चटाई पश्चिम बंगाल में मदुर कोट्टी नामक सरकंडे से बुनी जाती है. इसमें जितनी ज्यादा फिनिशिंग उतना ज्यादा समय लगता है और कीमत भी उतनी ही ज्यादा होती है."
अपने आप में खास होती है यह चटाई
एक चटाई उठाकर रौली जांगा कहती हैं कि "इस घास को भिंगोने के बाद उसे बहुत बारीक-बारीक हिस्सों में बांटकर इसे रस्सी से बुना जाता है. यही वजह है कि यह छूने में ऐसा लगता है जैसे मखमल हो. इसे तैयार करने में 2 कारीगरों को कम से कम 90 दिन यानी तीन माह लग जाते हैं. इसकी कीमत 30 हजार रुपए तक होती है."

रौली जांगा बताती हैं कि "इस चटाई की अपनी अलग खासियत होती है. गर्मियां में यदि इस पर लेटो तो यह पसीना सोख लेती है. मदुरकठी चटाई पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर की पहचान है. 2018 में इसे जीआई टैग मिल चुका है."

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लेदर पर आकर्षक कलाकारी
शाश्वती उत्सव में पश्चिम बंगाल की हस्तशिल्प कलाकार सीमा बैनर्जी भी पहुंची है. सीमा शांति निकेतन संस्थान में लैदर वर्क का काम करती हैं. वे बताती हैं कि "लैदर पर पूरा वर्क और कलरिंग का काम हैंडमेड होता है. एक लैदर की शीट पर पहले हाथ से कलाकृतियों को हाथ से उकेरा जाता है और इसके बाद उस पर धीरे-धीरे हाथ से ही कलर किया जाता है. इसकी शुरूआत रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 1932 में की थी. इस हस्तशिल्प अपने अनोखे बैटिक, एल्पिक और एम्बॉसिंग डिजाइन के लिए जाना जाता है. इसमें हैंड बैग, पर्स, लिपिस्टिक बॉक्स, बैंगल बॉक्स जैसे कई उत्पाद बनाए जाते हैं." हालांकि वे कहती हैं कि इसको तैयार करने में जितनी मेहनत लगती है, उतनी कीमत नहीं मिलती.

