कैंसर रोगियों के लिए वरदान है प्रोटोन थेरेपी, रेडिएशन का दुष्प्रभाव होगा कम
भोपाल में इंटरनेशनल स्कूल ऑन रेडिएशन रिसर्च सेमिनार का आयोजन, डॉक्टरों ने बताया बायोमार्कर बताएंगे रेडिएशन का उचित डोज.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : December 18, 2025 at 9:53 PM IST
भोपाल: वर्तमान में पारंपरिक रेडिएशन थेरेपी की बड़ी चुनौती यह है कि यह कैंसरग्रस्त ऊतकों के साथ-साथ आसपास के सामान्य ऊतकों को भी प्रभावित करती है, जिससे दुष्प्रभाव बढ़ जाते हैं और दीर्घकालिक जटिलताओं की आशंका रहती है. इसी समस्या के समाधान के रूप में प्रोटॉन थेरेपी एक प्रभावी विकल्प के रूप में सामने आई है.
'प्रोटॉन थेरेपी में स्वस्थ ऊतकों न्यूनतम नुकसान'
प्रोटॉन थेरेपी की विशेषता यह है कि इसमें रेडिएशन की ऊर्जा मुख्य रूप से ट्यूमर तक ही सीमित रहती है. जिससे स्वस्थ ऊतकों को न्यूनतम नुकसान होता है. यह जानकारी भोपाल मेमोरियल हास्पिटल एंड रिसर्च सेंटर में आयोजित कैंसर उपचार और रेडिएशन विज्ञान में नई संभावनाओं पर आयोजित सेमिनार में यूनिवर्सिटी ऑफ डुइसबर्ग-एसेन मेडिकल स्कूल जर्मनी के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. आशीष सोनी ने दी.
कई देशों में हो रहा प्रोटोन थेरेपी का इस्तेमाल
आईसीएमआर भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर (बीएमएचआरसी) में आयोजित चौथे इंटरनेशनल स्कूल ऑन रेडिएशन रिसर्च के दौरान देश-विदेश से आए प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों ने कैंसर उपचार एवं रेडिएशन विज्ञान के क्षेत्र में हो रहे नवीनतम शोध, उन्नत तकनीकों और भविष्य की संभावनाओं पर मंथन किया.
इसमें डॉ. आशीष सोनी ने बताया कि "अमेरिका, जापान और जर्मनी जैसे देशों में प्रोटान थेरेपी तकनीक के माध्यम से कैंसर रोगियों का सफल उपचार किया जा रहा है. विशेष रूप से बच्चों में होने वाले कैंसर के मामलों में, जहां दीर्घकालिक दुष्प्रभावों की आशंका अधिक होती है, प्रोटॉन थेरेपी का व्यापक उपयोग किया जा रहा है. भारत में भी अब कुछ चयनित केंद्रों में इस तकनीक के माध्यम से उपचार शुरू हो चुका है."
बायोमार्कर बताएंगे उपयुक्त रेडिएशन डोज
स्टॉक होम यूनिवर्सिटी स्वीडन के वैज्ञानिक डॉ. प्रबोध मेहेर ने बताया कि "हर व्यक्ति के शरीर में रेडिएशन को सहन और अवशोषित करने की क्षमता अलग-अलग होती है. इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिक ऐसे बायोमार्कर्स की पहचान पर कार्य कर रहे हैं, जिनकी सहायता से यह निर्धारित किया जा सके कि किसी मरीज को रेडिएशन का कितना डोज देना उसके लिए सुरक्षित और प्रभावी होगा.

बायोमार्कर्स के माध्यम से यह समझना संभव होगा कि कौन-सा मरीज रेडिएशन के प्रति अधिक संवेदनशील है और किसे अपेक्षाकृत अधिक डोज दिया जा सकता है. इससे उपचार को व्यक्ति-विशेष के अनुसार अनुकूलित किया जा सकेगा, जिससे उपचार के बेहतर परिणाम मिलेंगे और अनावश्यक दुष्प्रभावों को कम किया जा सकेगा."
रेडिएशन विज्ञान में उन्नत तकनीकी से बेहतर परिणाम
सोसायटी ऑफ रेडिएशन रिसर्च के वरिष्ठ वैज्ञानिक और संस्थापक अध्यक्ष डॉ. केपी मिश्रा ने बताया कि "मानव शरीर के कई अंगों में होने वाले कैंसर, जैसे लिवर, किडनी, फेफड़े, ब्रेन ट्यूमर तथा रक्त कैंसर, ऐसे हैं जिनका उपचार वर्तमान में उपलब्ध दवाओं या पारंपरिक रेडिएशन तकनीकों से पूरी तरह संभव नहीं हो पाता है. लेकिन अब रेडिएशन विज्ञान में प्रोटॉन रेडिएशन थेरेपी, कार्बन आयन थेरेपी तथा फ्लैश रेडिएशन जैसी उन्नत तकनीकें विकसित हो रही हैं, जिनसे इन जटिल कैंसरों के उपचार में बेहतर परिणाम मिलने की संभावना है."
मॉलिक्यूलर बायोलॉजी से मिलेंगे सटीक परिणाम
डॉ. केपी मिश्रा ने बताया कि "ब्रेन ट्यूमर, सिर एवं गले के ट्यूमर जैसे कई मामलों में पारंपरिक रेडिएशन थेरेपी अपेक्षित प्रभाव नहीं दिखा पाती है. ऐसे में मॉलिक्यूलर बायोलॉजी के माध्यम से यह समझने का प्रयास किया जा रहा है कि कुछ ट्यूमर रेडिएशन के प्रति प्रतिरोधी क्यों होते हैं. यदि इसके कारणों की पहचान हो जाती है, तो इन ट्यूमर के लिए अधिक प्रभावी उपचार रणनीतियां विकसित करना संभव हो सकेगा."

बता दें कि 18 और 19 दिसंबर 2025 को सोसायटी ऑफ रेडिएशन रिसर्च (एसआरआर) के तत्वावधान में चौथा इंटरनेशनल स्कूल ऑन रेडिएशन रिसर्च आयोजित किया जा रहा है.
राज्यपाल बोले- 'चिकित्सक मानवता के सच्चे सेवक'
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए राज्यपाल मंगू भाई पटेल ने कहा कि "चिकित्सक मानवता के सच्चे सेवक होते हैं और रोगियों के लिए भगवान के समान होते हैं. उपचार के दौरान चिकित्सक का मरीजों के प्रति व्यवहार अत्यंत महत्वपूर्ण होता है. चिकित्सक की आत्मीयता, सरलता और सहजता मरीज के मनोविज्ञान तथा उपचार प्रक्रिया को सकारात्मक रूप से प्रभावित करती है."
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राज्यपाल ने आगे कहा, "यह आयोजन केवल वैज्ञानिक विमर्श का मंच नहीं है, बल्कि मानवता के भविष्य को अधिक सुरक्षित, स्वस्थ और आशावान बनाने की दिशा में एक सराहनीय पहल है." उन्होंने अपेक्षा व्यक्त की कि रेडिएशन के जैविक प्रभावों की पहचान, बायोमार्कर्स के वैज्ञानिक उपयोग तथा रेडियोथेरेपी की उन्नत तकनीकों पर होने वाली चर्चा, चिकित्सा विज्ञान को और अधिक सटीक, सुरक्षित एवं सुलभ बनाने में सहायक सिद्ध होगी.

