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इतिहास के बंद पन्ने खुले, 169 बाद सामने आया तात्या तोपे का हुक्मनामा, ऐसा था 1857 की क्रांति का प्लान

भोपाल के अभिलेखागार में मिली तात्या टोपे के साइन वाली चिट्ठी, पत्र में 1857 की क्रांति की योजना का उल्लेख, पढ़ें पूरी खबर.

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169 बाद सामने आया तात्या तोपे का हुक्मनामा (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Madhya Pradesh Team

Published : May 1, 2026 at 12:07 PM IST

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Updated : May 1, 2026 at 1:00 PM IST

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भोपाल: इतिहास के पन्नों में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी गई गाथाएं उल्लेखित हैं. ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ 1857 में हुए पहले विद्रोह को लेकर भी इतिहास में कई घटनाओं का जिक्र है, लेकिन इस विरोध के 167 साल बाद इससे जुड़ा महत्वपूर्ण लिखित दस्तावेज सामने आया है. करीब 250 पन्नों के यह दस्तावेज में तात्या टोपे का हुक्मनामा था, जो ज्ञान भारत मिशन में अभिलेख डिजिटाइजेशन के दौरान मिला है. इस हुक्मनामे को इतिहास की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जो जल्द ही ऑनलाइन आम लोगों को दिखाई देगा.

क्या है हुक्मनामा में
यह हुक्मनाम बुंदेली भाषा में काली स्याही से लिखा गया था. इसे तात्या टोपे ने सभी सूबेदार, सरदार, सिपाही, पलटन, तोपखाना को संबोधित करते हुए लिखा था. इन्हें संबोधित करते हुए वे लिखते हैं कि राजा चरखानी ने एक मसविदा लिखकर भेजा है. अब आप सभी सिपाही और सरदार एकत्र होकर योजना तैयार करें, जो आप सबको स्वीकार होगा, वह हमको भी स्वीकार होगा. 7 लाइनों में लिखे गए इस संदेश के बाद पत्र के पीछे तारीख लिखी है. इसमें लिखा गया है मिति चैत्र, वदी सात, संवत 1914 यानी वर्ष 1857. इसके ऊपर तात्या टोपे का हस्ताक्षर के रूप में तात्या टोपे का नाम पर हस्ताक्षर लिखा है.

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तात्या तोपे की दर्लभ तस्वीर (Courtesy- State Archives)

1857 के करीबन 250 पन्ने मिले
यह सभी पत्र पुरातत्व विभाग के अभिलेखागार में मिले हैं, जो सालों से यहां रखे हुए थे, लेकिन अब पत्रों के डिजिटाइजेशन के दौरान यह मिले हैं. बताया जाता है कि अधिकारियों को भी इनके रखे होने की जानकारी नहीं थी. इन दस्तावेजों को रियासतों के विलय के बाद 1965 में शिवपुरी से लाए गए थे. हालांकि डिजिटाइजेशन के दौरान जब इन्हें देखा गया तो इनका अनुवाद भाषा विषेषज्ञ सैयद नैमुद्दीन से कराया गया. इससे इन पत्रों में लिखे गए संदेश का पता चला.

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यह पत्र महाराजा रतन सिंह को संबोधित है, इसमें विद्रोही नेताओं के बीच समन्वय, तथा किसी भी प्रकार के विश्वासघात ना हो इसका आश्वासन दिया गया है. (Courtesy- State Archives)

इन पत्रों में तात्या टोपे के हुक्मनामा के अलावा कई परवाना यानी पत्र भी लिखे. शुदि चार, संवत 1914 यानी वर्ष 1857 कालपी से उन्होंने बुंदेलखंड के दो कस्बो इटावा और आटा को लिखा कि किराना आने जाने को छोड़कर अन्य किसी तरह का हासिल यानी हिस्सा या कर नहीं लिया जाए. आठ पंक्तियों के इस परवाना में सबसे ऊपर मुहर लगी हुई है.

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नवाब सरफराज़ खान गाज़ी द्वारा तात्या टोपे को भेजा गया पत्र है, जिसमें सैन्य परिस्थितियों और क्षेत्रीय घटनाओं का विवरण मिलता है. यह विद्रोहियों के बीच सूचना आदान-प्रदान को दर्शाता है. (Courtesy- State Archives)

कर्मचारियों की रखते थे जानकारी
दस्तावेजों में एक ऐसा पत्र भी मिला है, जिससे पता चलता है कि तात्या टोपे अपने भेजे गए कर्मचारियों की भी जानकारी लेते थे. यह पत्र राजा गजेन्द्र बली ने तात्या टोपे को लिखा था. यह पत्र भी वदि 12, संवत 1914 यानी 1857 का है, जो बुंदेली भाषा में है. इस पत्र में राजा गजेन्द्र ने लिखा है कि, ''सिद्धी श्री राजमान राजे श्री तात्या साहिब रामचंद्र पांडुरंग जी को राम-राम. दौलत राम और कुंवर मंगल सिंह आए हैं. सरकार चाकरी जो करने में आई है वह अपनी क्षमता के अनुसार कर रहे हैं. इससे पता चलता है कि इन्हें तात्या टोपे ने भेजा था.''

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तात्या टोपे द्वारा अपने सरदारों और सैनिकों को जारी आदेश है। इसमें चरखारी के राजा से प्राप्त प्रस्ताव पर विचार कर सामूहिक रणनीति बनाने का निर्देश दिया गया है, जो संगठित निर्णय प्रक्रिया को दर्शाता है. (Courtesy- State Archives)
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एक मानचित्र है जो जून 1858 से अप्रैल 1859 के बीच तात्या टोपे के व्यापक सैन्य अभियानों को दर्शाता है. इसे ‘मेरेथॉन दौड़’ के रूप में जाना जाता है, जो उनकी अद्भुत गतिशीलता और रणनीतिक कौशल को दर्शाता है. (Courtesy- State Archives)

प्रथम स्वाधीनता संग्राम के कुशल सेनानायक थे तात्या टोपे
तात्या टोपे 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के सबसे प्रमुख और कुशल सेनानायकों में से एक थे. अपनी अद्भुत रणनीति, तेज गति से सैन्य संचालन और अटूट संकल्प के कारण वे भारतीय प्रतिरोध के प्रतीक बन गए. 1814 में में जन्मे तात्या टोपे का नाम रामचंद्र पांडुरंग राव था. तात्या टोपे पेशवा नानासाहेब के घनिष्ठ सहयोगी थे. कानपुर, झाँसी और ग्वालियर जैसे महत्वपूर्ण मोर्चों पर उन्होंने नेतृत्व किया.

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कालपी किले से जारी तात्या टोपे द्वारा हस्ताक्षरित हुकुमनामा है, जिसमें उनके सेनापतियों एवं सैनिकों को आदेश दिया गया है कि, कुछ निश्चित राजस्व (महसूल) जनता से न वसूला जाए। यह विद्रोही प्रशासन द्वारा जनसमर्थन बनाए रखने के प्रयास को दर्शाता है. (Courtesy- State Archives)

रानी लक्ष्मीबाई सहित अन्य नेताओं के वीरगति को प्राप्त होने के बाद भी तात्या ने लगभग एक वर्ष तक संघर्ष जारी रखा. उनकी छापामार युद्ध नीति और लगातार स्थान परिवर्तन की रणनीति ने अंग्रेजों को लंबे समय तक परेशान रखा, अंततः 1859 में उन्हें पकड़कर फांसी दे दी गई.

पुरातत्व संचालनालय के आयुक्त मदन कुमार बताते हैं कि, "दस्तावेज के डिजिटलाइजेशन के दौरान तात्या टोपे से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेज प्राप्त हुए हैं. यह दस्तावेज शिवपुरी से राज्य पुरातत्व संग्रहालय में भेजे गए थे. प्राप्त दस्तावेजों से पता चलता है कि स्वतंत्रता संग्राम के पहले विद्रोह की रणनीति कितनी गुप्त थी और सूक्ष्म तरह से इसको तैयार किया गया था.'

Last Updated : May 1, 2026 at 1:00 PM IST