हाई वोल्टेज करंट के बाद अंगों को बचाने की नई उम्मीद, एम्स भोपाल में उन्नत सर्जरी से बची 23 मरीजों की जान
एम्स भोपाल के बर्न्स एवं प्लास्टिक सर्जरी विभाग की रिसर्च को मिली अंतरराष्ट्रीय मान्यता. अमेरिका के प्रतिष्ठित जर्नल एनल्स ऑफ प्लास्टिक सर्जरी में प्रकाशित.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : February 8, 2026 at 5:23 PM IST
भोपाल: हाई वोल्टेज करंट की चपेट में आने के बाद घायलों के अंग बच पाना बेहद कठिन माना जाता है, लेकिन एम्स भोपाल के बर्न्स एवं प्लास्टिक सर्जरी विभाग ने इस धारणा को बदल दिया है. उन्नत माइक्रोसर्जिकल तकनीक के जरिए डॉक्टरों की टीम ने 23 गंभीर रूप से घायल मरीजों के अंग सुरक्षित रखते हुए उन्हें नई जिंदगी की उम्मीद दी है. एम्स भोपाल के बर्न्स एवं प्लास्टिक सर्जरी विभाग की इस उपलब्धि को अंतरराष्ट्रीय मान्यता भी मिली है. विभाग की शोध टीम का अध्ययन अमेरिका के प्रतिष्ठित जर्नल एनल्स ऑफ प्लास्टिक सर्जरी में प्रकाशित हुआ है, जिसे विश्वभर के विशेषज्ञ संदर्भ के रूप में देखते हैं.
धैर्य से मिला बेहतर नतीजा, 87 प्रतिशत सफलता दर
इस अध्ययन का नेतृत्व डॉ गौरव चतुर्वेदी ने किया. शोध टीम में डॉ अभिनव सिंह, डॉ वेद प्रकाश राव चेरुवु और विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ मनाल मोहम्मद खान शामिल रहे. अध्ययन में एम्स भोपाल में उपचारित 23 हाई वोल्टेज इलेक्ट्रिकल बर्न मरीजों के उपचार परिणामों का विश्लेषण किया गया. शोध में पाया गया कि घाव की जैविक स्थिति का सही आकलन कर, पर्याप्त डिब्राइडमेंट के बाद पुनर्निर्माण को कुछ समय के लिए टालना बेहतर परिणाम देता है. इस रणनीति से अंग संरक्षण की दर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और गंभीर जटिलताएं कम हुईं. माइक्रोसर्जिकल फ्री-फ्लैप तकनीक में कुल 87 प्रतिशत फ्लैप जीवित रहने की दर दर्ज की गई.

क्या है माइक्रोसर्जिकल फ्री-फ्लैप तकनीक
यह एक आधुनिक सर्जिकल तकनीक है, जिसमें मरीज के शरीर के स्वस्थ हिस्से से त्वचा, मांसपेशी या हड्डी के भाग को लेकर क्षतिग्रस्त अंग में प्रत्यारोपित किया जाता है. माइक्रोस्कोप की मदद से बाल से भी पतली नसों और रक्त वाहिकाओं को जोड़ा जाता है, जिससे नए ऊतक विकसित होते हैं. हालांकि बर्न्स एवं प्लास्टिक सर्जरी विभाग के प्रमुख प्रो. डॉ मनाल मोहम्मद खान का कहना है कि "हाई वोल्टेज करंट से होने वाली चोटें अत्यंत जटिल होती हैं. ऐसे मामलों में जल्दबाजी में लिया गया सर्जिकल फैसला नुकसानदेह हो सकता है."
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विकलांगता से बाहर निकल रहे मरीज
यह अध्ययन साबित करता है कि सही समय और वैज्ञानिक आकलन से न केवल अंग बचाए जा सकते हैं बल्कि उनकी कार्यक्षमता भी सुरक्षित रखी जा सकती है. डॉ मनाल मोहम्मद खान के अनुसार "उन्नत माइक्रोसर्जिकल सर्जरी के जरिए गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त अंगों में नया ऊतक विकसित किया जा रहा है. इससे मरीज दोबारा चलने-फिरने और सामान्य जीवन जीने की ओर लौट रहे हैं. करंट लगने के बाद आजीवन विकलांगता के डर से जूझ रहे मरीजों के लिए यह उपलब्धि उम्मीद की मजबूत किरण बनकर सामने आई है."

