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12 दिन के बच्चे की सांसें थमने लगीं, 55% आक्सीजन पर एम्स ने स्टेंट डालकर बचाई जिंदगी

बड़ी सर्जरी से पहले स्टेंट उम्मीद की किरण, 12 दिन के नवजात को बचाने के लिए एम्स भोपाल ने RVOT स्टेंटिंग की. रिपोर्ट विश्वास चतुर्वेदी.

AIIMS INSERTED STENT 12 DAY NEWBORN
सांकेतिक तस्वीर (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Madhya Pradesh Team

Published : August 26, 2026 at 10:38 PM IST

3 Min Read
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भोपाल: एक परिवार जिसने करीब दो सप्ताह की उम्र में अपने पहले बच्चे को खो दिया था, उसके सामने दूसरी बार वही डर खड़ा था. 12 दिन का नवजात, महज 2.1 किलो वजन और आक्सीजन का स्तर गिरकर सिर्फ 55 प्रतिशत तक पहुंच गया. ऐसे में बच्चा वेंटिलेटर पर था और हर गुजरते पल के साथ माता-पिता की चिंता बढ़ रही थी. ऐसे मुश्किल समय में एम्स भोपाल के चिकित्सकों ने पहली बार नवजात में आरवीओटी (Right ventricular outflow tract) (RVOT) स्टेंटिंग कर फेफड़ों तक रक्त पहुंचने का रास्ता खोला. इस प्रक्रिया के बाद बच्चे की आक्सीजन करीब 88 प्रतिशत तक पहुंच गई और अगले ही दिन उसे वेंटिलेटर से हटा दिया गया.

पहले बच्चे को खोने का दर्द, फिर वहीं परेशानी

एम्स के डायरेक्टर लेफिटनेंट जनरल डॉ. नरेंद्र कोतवाल के अनुसार "बच्चे के माता-पिता पहले अपने एक बच्चे को गंभीर हृदय रोग के कारण करीब दो सप्ताह की उम्र में खो चुके हैं. इसलिए जब दूसरे नवजात की हालत बिगड़ी और डाक्टरों ने बताया कि उसका आक्सीजन स्तर 55 प्रतिशत तक पहुंच गया है, तो परिवार बेहद डर गया. बच्चे को जन्म से ही जटिल हृदय रोग था और फेफड़ों तक रक्त पहुंचाने वाला रास्ता बेहद संकरा था. इस बच्चे को डबल आउटलेट राइट वेंट्रिकल नामक जटिल हृदय रोग था. इसके कारण फेफड़ों तक पर्याप्त रक्त नहीं पहुंच पा रहा था. जन्म के समय आक्सीजन 85 से 90 प्रतिशत थी, लेकिन 12वें दिन यह घटकर 55 प्रतिशत रह गई. ऐसे में जब दवाओं से पर्याप्त सुधार नहीं हुआ, तो बच्चे को वेंटिलेटर पर रखना पड़ा."

बड़ी सर्जरी से पहले स्टेंट बना उम्मीद की किरण

दरअसल, बच्चे की स्थिति को देखते हुए एम्स की इंटरवेंशनल कार्डियोलाजी टीम ने आरवीओटी स्टेंटिंग का फैसला लिया. डा. भूषण शाह और डा. सुदेश प्रजापति ने प्रक्रिया की, जबकि एनेस्थीसिया और नवजात चिकित्सा टीम का नेतृत्व डा. वैशाली वैदेसकर और डा. चेतन खरे ने किया. संकरे रास्ते में छोटा स्टेंट डालकर फेफड़ों तक रक्त का प्रवाह बढ़ाया गया. इस प्रक्रिया के तुरंत बाद आक्सीजन करीब 88 प्रतिशत पहुंच गई और अगले दिन वेंटिलेटर भी हट गया.

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माता-पिता ने कहा, हमारे लिए नई उम्मीद लौटी

नवजात का सफल इलाज होने के बाद माता-पिता ने कहा कि "पहले बच्चे को खोने के बाद वे बेहद डरे हुए थे. लेकिन अपने नवजात की आक्सीजन बढ़ते और अगले ही दिन वेंटिलेटर से बाहर आते देखना उनके लिए नई उम्मीद लेकर आया." वहीं, डाक्टरों ने बताया कि स्टेंट अंतिम उपचार नहीं है. इसका उद्देश्य बच्चे को स्थिर रखना, फेफड़ों में रक्त प्रवाह बेहतर करना और वजन बढ़ाने का समय देना है. बच्चे की नियमित हृदय जांच और इकोकार्डियोग्राफी होगी. करीब छह माह की उम्र में उसकी स्थिति के अनुसार अंतिम सर्जरी की योजना बनाई जाएगी.