जानलेवा बीमारी का अलार्म है स्लीप एपनिया, 10 फीसदी बच्चों की रात में सोते वक्त रुक जाती है सांस
भोपाल AIIMS ने एक शोध में पाया कि स्लीप एपनिया से 32 प्रतिशत वयस्क और 10 फीसदी बच्चे पीड़ित. हार्ट अटैक-ब्रेन स्ट्रोक का खतरा बढ़ा.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : January 9, 2026 at 8:44 PM IST
रिपोर्ट: विश्वास चतुर्वेदी
भोपाल: नींद के दौरान आने वाले खर्राटों को लोग आम समझकर नजरअंदाज कर जाते हैं. यदि आपने भी खर्राटों को हल्के में लिया, तो भविष्य में समस्या और बढ़ सकती है. दरअसल, खर्राटे या कहें स्लीप एपनिया कोई आम बीमारी का संकेत नहीं है. यदि समय पर इलाज न कराया जाए, तो यह जानलेवा भी हो सकता है. इसको लेकर आल इंडिया इंस्टिट्यूट आफ मेडिकल सांइस, भोपाल में शोध किया गया है. इसमें सामने आया है कि 32 प्रतिशत वयस्क और 10 फीसदी बच्चे इससे पीड़ित हैं.
5 से 10 साल के बच्चे भी प्रभावित
विशेषज्ञों के अनुसार स्पील एपनिया से लोगों की नींद तो टूटती ही है, साथ ही यह गंभीर खतरे का संकेत भी है. वर्तमान में किए शोध के अनुसार मध्य प्रदेश में स्लीप एपनिया से 15 से 60 वर्ष की आयु वर्ग के लगभग 32 प्रतिशत वयस्क प्रभावित हैं, जबकि 5 से 10 वर्ष तक के 10 प्रतिशत बच्चे भी इसकी चपेट में हैं. इस बीमारी में नींद के दौरान सांस बार-बार रुकती है, जिससे शरीर में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है. इसका सीधा असर दिल और दिमाग पर पड़ता है, जिससे हार्ट अटैक और ब्रेन स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है.

40 प्रतिशत महिलाएं और 60 प्रतिशत पुरुष पीड़ित
एम्स भोपाल के डाक्टरों ने बताया कि आयुवर्ग के अनुसार 18 से 40 वर्ष के लगभग 20 प्रतिशत युवा स्लीप एपनिया की चपेट में आ रहे हैं. जबकि 40 वर्ष की उम्र के बाद यह समस्या और गंभीर हो जाती है, जहां करीब 45 प्रतिशत लोगों में खर्राटों की शिकायत सामने आ रही है. आंकड़ों के अनुसार इस परेशानी से 40 प्रतिशत महिलाएं और करीब 60 प्रतिशत पुरुष प्रभावित हैं, जो जीवनशैली और स्वास्थ्य के लिए गंभीर चेतावनी है.

बच्चों में बढ़ती खर्राटों की समस्या
रिसर्च के अनुसार 5 से 10 वर्ष की उम्र के करीब 10 प्रतिशत बच्चों में खर्राटों की समस्या देखी जा रही है. स्लीप एपनिया से पीड़ित बच्चों को रात में बार-बार पेशाब के लिए उठना पड़ता है. ऐसे बच्चों का पढ़ाई में मन नहीं लगता और नींद के दौरान सांस रुकने की समस्या होती है. कई मामलों में बच्चे असामान्य रूप से चंचल या हाइपर एक्टिव हो जाते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ये लक्षण दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए.

नींद की समस्या से ग्रसित हर तीसरा व्यक्ति पीड़ित
एम्स में पल्मोनरी विभाग के एचओडी डा. अल्केश खुराना ने बताया कि "अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, भोपाल में नींद की समस्या लेकर आने वाले 1080 मरीजों पर रिसर्च किया गया है. जिसमें सामने आया कि ओपीडी में आने वाले लगभग 32 प्रतिशत लोग स्लीप एपनिया यानी खर्राटों की बीमारी से ग्रसित हैं. डा. खुराना ने बताया कि इस दौरान नींद में सांस कुछ समय के लिए रुक जाती है, जिससे नींद बार-बार टूटती है. इसके परिणामस्वरूप हाई ब्लड प्रेशर, शुगर, हार्ट अटैक और डिप्रेशन जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ रहा है. बड़ी बात ये है कि खर्राटों की बीमारी से पीड़ित 66 प्रतिशत मरीज ब्लड प्रेशर से पीड़ित मिले हैं.

स्लीप एपनिया दो प्रकार की होती है
- ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया जिसमें पीड़ित को सांस लेने के रास्ते में रुकावट की समस्या होती है. ये तब होता है जब नींद के दौरान पीड़ित के गले के पीछे का साफ्ट टिश्यू गिर जाता है.
- सेंट्रल स्लीप एपनिया गंभीर होता है. इसमें सांस लेने का रास्ता तो अवरुद्ध नहीं होता, लेकिन यहां मस्तिष्क सांस को नियंत्रित करने वाली मांसपेशियों को ठीक से संकेत नहीं भेज पाता है
दवाईयों और मशीनों से ईलाज संभव
जयप्रकाश चिकित्सालय भोपाल के पूर्व अधीक्षक डा. आईके चुघ ने बताया कि "बेहतर स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त और सही नींद बेहद जरूरी है. शारीरिक व मानसिक थकान के कारण व्यक्ति नींद में गलत अवस्था में चला जाता है, जिससे स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ता है. बैठे-बैठे थोड़ी देर झपकी सामान्य है, लेकिन बार-बार नींद आना बीमारी का संकेत हो सकता है. अत्यधिक गहरी नींद, करवटें बदलना और नींद में बोलना इसके लक्षण हैं. इस रोग में ज्यादा या कम नींद दोनों हो सकती है." डा. चुघ ने बताया कि मोटापा इसका मुख्य कारण है, लेकिन दवाइयों व मशीनों से इसका इलाज संभव है.

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इस तरह स्लीप एपनिया से हो सकता है बचाव
योगाचार्य डा. मोहित कुमार ने बताया कि "बेहतर नींद और स्लीप एपनिया से बचाव के लिए जीवनशैली में छोटे लेकिन जरूरी बदलाव अपनाना बेहद जरूरी है. नियमित योगाभ्यास से शरीर और मन संतुलित रहते हैं. सोने से कम से कम एक घंटे पहले मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से दूरी बनानी चाहिए. बिस्तर पर जाने से पहले डीप ब्रीदिंग करना और श्वासन की स्थिति में लेटना लाभकारी होता है. इस दौरान बेहद धीमी और शांत संगीत भी मन को शांति देता है."

