कबीर की जयंती बनी भोजपुरी दिवस की पहचान, लेकिन आठवीं अनुसूची का इंतजार कब होगा खत्म?
कबीर जयंती पर भोजपुरी दिवस मनाया गया. साहित्यकारों ने भोजपुरी की समृद्ध विरासत का उल्लेख करते हुए आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग दोहराई.

Published : June 29, 2026 at 1:44 PM IST
पटना: चित्रकूट अधिवेशन में बनी सहमति के बाद से कबीर जयंती पर भोजपुरी दिवस मनाने की परंपरा लगातार निभाई जा रही है. संत कबीर की जयंती के अवसर पर देश विदेश में भोजपुरी भाषी समाज ने उन्हें श्रद्धापूर्वक याद किया. इस मौके पर कई साहित्यिक और सामाजिक संगठनों ने भोजपुरी दिवस भी मनाया
दुनियाभर में बोली जाती है भोजपुरी : इस अवसर पर भोजपुरी भाषा की समृद्ध साहित्यिक विरासत और उसे भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग एक बार फिर प्रमुखता से उठी. भाषाविदों के अनुसार भोजपुरी केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर व्यापक रूप से बोली और समझी जाने वाली भाषा है. वर्ष 2011 की जनगणना में करीब 5.1 करोड़ लोगों ने भोजपुरी को अपनी मातृभाषा बताया था.
8 करोड़ लोग भोजपुरी बोलते या समझते हैं : विशेषज्ञों का मानना है कि दूसरी भाषा के रूप में बोलने वालों को शामिल किया जाए तो दुनिया भर में 7 से 8 करोड़ से अधिक लोग भोजपुरी बोलते या समझते हैं. वर्तमान जनगणना में भी भोजपुरी भाषा का अलग विकल्प उपलब्ध कराया गया है, जिसे बड़ी संख्या में लोगों ने चुना है.
10 से अधिक देशों में है भोजपुरी भाषा की पहचान : भोजपुरी भाषा का विस्तार भारत के कई राज्यों में है. बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सहित अनेक राज्यों में बड़ी आबादी भोजपुरी बोलती है. वहीं नेपाल, मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, गुयाना और त्रिनिदाद एवं टोबैगो समेत 10 से अधिक देशों में भोजपुरी भाषी समुदाय अपनी भाषा और संस्कृति को आज भी जीवित रखे हुए है.
कबीर की वाणी ने दिलाई भोजपुरी को विशेष पहचान : भोजपुरी साहित्यकारों का मानना है कि संत कबीर ने अपनी साखियों और पदों के माध्यम से लोकभाषा को नई प्रतिष्ठा दी. उनकी रचनाओं में पूर्वांचल की लोकभाषा, विशेषकर भोजपुरी का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है. इसी कारण कबीर को भोजपुरी लोकचेतना और अस्मिता का प्रमुख प्रतीक माना जाता है. यही वजह है कि कबीर जयंती के अवसर पर भोजपुरी दिवस मनाने की परंपरा को व्यापक समर्थन मिलता रहा है.

''संत कबीर की अनेक साखियां और पद लोकभाषा में रचे गए, जिन्हें भोजपुरी क्षेत्र ने पीढ़ियों से अपनी सांस्कृतिक धरोहर के रूप में अपनाया गया है. उनकी कालजयी रचना के चलते संत कबीर को भोजपुरी अस्मिता से जोड़कर देखा जाता है. चित्रकूट अधिवेशन में यह सहमति बनी थी कि संत कबीर के जयंती के मौके पर भोजपुरी दिवस मनाया जाना चाहिए और तब से यह परंपरा चली आ रही है.''- डॉ सुनील पाठक, भोजपुरी के कवि और समीक्षक
'कबीर की रचनाएं भोजपुरी समाज की धरोहर' : भोजपुरी के कवि, समीक्षक और बिहार सरकार में उपनिदेशक डॉ. सुनील कुमार पाठक ने कहा कि संत कबीर की अनेक साखियां और पद लोकभाषा में रचे गए हैं, जिन्हें भोजपुरी समाज ने सदियों से अपनी सांस्कृतिक धरोहर के रूप में संरक्षित रखा है. उन्होंने बताया कि चित्रकूट अधिवेशन में यह निर्णय लिया गया था कि कबीर जयंती को भोजपुरी दिवस के रूप में भी मनाया जाएगा और तब से यह परंपरा निरंतर जारी है.
भोजपुरी में डॉ. सुनील पाठक का योगदान : सिवान निवासी डॉ. सुनील कुमार पाठक ने अब तक भोजपुरी में दस से अधिक पुस्तकों की रचना की है. उनकी प्रकाशित पुस्तकों में 'नेवान' (1993), 'छवि और छाप', 'पढ़त लिखत', 'रूचि रचाव' और 'सबकर साथी सबकर मीत' प्रमुख हैं. उनका कहना है कि भोजपुरी साहित्य निरंतर समृद्ध हो रहा है और इसकी स्वीकार्यता देश के साथ साथ विदेशों में भी बढ़ रही है.
व्याकरण से लेकर महाकाव्य तक का विशाल भंडार : डॉ. पाठक के अनुसार भोजपुरी केवल बोलचाल की भाषा नहीं, बल्कि एक विकसित साहित्यिक भाषा है. इसमें दर्जनों व्याकरण ग्रंथ, अनेक काव्यशास्त्र, भाषा विज्ञान संबंधी पुस्तकें, 50 से अधिक नाटक, 100 से अधिक उपन्यास और 50 से अधिक महाकाव्य उपलब्ध हैं. उन्होंने यह भी बताया कि प्रसिद्ध गीतकार शैलेंद्र, जिनका संबंध आरा से था, ने भी भोजपुरी में कई यादगार गीतों की रचना की.

'भोजपुरी को 8वीं अनुसूची में मिले जगह' : भोजपुरी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने की सभी आवश्यक योग्यताएं रखती है. बिहार सरकार पहले ही केंद्र सरकार को भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की अनुशंसा भेज चुकी है. केंद्र के कई मंत्रियों की ओर से भी समय समय पर सकारात्मक आश्वासन मिले हैं. भोजपुरी समाज और साहित्यकारों को उम्मीद है कि निकट भविष्य में इस भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिलेगा
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