World Bicycle Day: पर्यावरण के लिए बेहतर फिर भी दिल्ली-NCR की सड़कों पर घटी साइकिलों की संख्या
पर्यावरण और ऊर्जा संरक्षण के लिए साइकिल सवारी करने के दिग्गजों के संदेशों के बाद भी घटी साइकिल सवारों की संख्या

Published : June 3, 2026 at 6:58 AM IST
नई दिल्ली: हर साल 3 जून को पूरे उत्साह के साथ विश्व साइकिल दिवस मनाया जाता है. मंचों से भाषण दिए जाते हैं, पर्यावरण संरक्षण की कसमें खाई जाती हैं और साइकिल चलाने को मानव स्वास्थ्य के लिए बेहद अहम बताया जाता है. लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट व भयावह है.
देश की राजधानी दिल्ली और इससे सटे एनसीआर के इलाकों में साइकिल चलाना किसी खतरे के खेल से कम नहीं है. दिल्ली पुलिस की रिपोर्ट के मुताबित तो सड़क हादसों में जान गंवाने वालों में सबसे बड़ी संख्या पैदल चलने वालों (पेडस्ट्रियन) और साइकिल सवारों की होती है. यही कारण है कि पिछले दो वर्षों में दिल्ली-एनसीआर की सड़कों पर पैडल मारने वाले शौकिया और पेशेवर साइकिलिस्टों की संख्या में भारी गिरावट आई है.
रफ्तार के शौकीनों का खौफ और घटती संख्या: अल्ट्रा साइकिलिस्ट प्रतिम गूंन, जो ट्रिपल एसआर (Super Randonneur) का खिताब हासिल कर चुके हैं और गुरुग्राम से अटारी बॉर्डर तक की लंबी दूरी तय कर चुके हैं. सड़कों के दर्द को बयां हुए उन्होंने बताया कि व्यस्त जीवनशैली में खुद को फिट रखने के लिए दिल्ली-एनसीआर में कई साइकिलिंग ग्रुप्स बने, जो बीआरएम (Brevet Populaires) जैसे बड़े इवेंट्स आयोजित करते हैं. इनमें साइकिल चालक 200 से लेकर 600 किलोमीटर तक का सफर तय करते हैं, लेकिन हाल के दिनों में सड़कों पर हुए जानलेवा हादसों ने इन राइडर्स के हौसले पस्त कर दिए हैं.
सुरक्षा के लिहाज से भी साइकिल सवारों को कई समस्याएं: हाल ही में पंजाब में दो राइडर्स पर गाड़ी सवारों द्वारा डंडों से जानलेवा हमला किया गया. प्रतिम के अनुसार हम लोग तड़के 4 बजे या देर रात मुख्य राजमार्गों व केएमपी (कुंडली-मानेसर-पलवल) एक्सप्रेसवे पर निकलते हैं. सुरक्षा के लिहाज से हम हेलमेट, रिफ्लेक्टर बेल्ट व साइकिल में महंगी लाइट्स जैसी सभी गाइडलाइंस का पालन करते हैं, क्योंकि इसके बिना इवेंट में डिस्क्वालिफाई (डीएनएफ) कर दिया जाता है.
साइकिल सवारों को ड्रिंक एंड ड्राइव के शिकार होने का खतरा: साइकिल सवारों की चुनौती उन बेलगाम वाहन चालकों से है जो ड्रिंक एंड ड्राइव के शिकार हैं. कई बार कार चालक जानबूझकर साइकिल को दबाने या हिट करने का प्रयास करते हैं. जब साइकिल 30 से 35 किमी प्रति घंटे की औसत रफ्तार पर हो, तो जरा सा भी धक्का जानलेवा साबित होता है. स्थिति ये है कि पहले जहां हम 500 लोग एक साथ राइड करते थे, अब वह संख्या घटकर महज 20 से 30 प्रतिशत रह गई है. मेरे एक साथी को लाजपत नगर में सुबह की राइड के दौरान एक लग्जरी कार ने टक्कर मार दी थी. जिसका एम्स (AIIMS) में इलाज कराना पड़ा.

दिल्ली-एनसीआर के ट्रैफिक सिस्टम अव्यवस्थित : डॉ. अंकित भाटिया भी दिल्ली-एनसीआर के ट्रैफिक सिस्टम से खासे चिंतित हैं. वे कहते हैं कि
हमारे देश में ट्रैफिक (बसें, मोटरसाइकिलें, कारें) बेहद अव्यवस्थित तरीके से चलते हैं. सड़कों पर अनुशासन की भारी कमी के कारण आए दिन साइकिल सवार हादसों का शिकार हो रहे हैं. इसी डर की वजह से लोग साइकिल लेकर बाहर निकलने से कतराते हैं. इसके अतिरिक्त मौसम की मार व अत्यधिक गर्मी भी एक बड़ी बाधा बनती है, जिससे विकसित देशों की तुलना में हमारे यहां साइकिलिंग के प्रति रुझान कम हो रहा है.
तनाव को भूलाने के लिए साइकिलिंग एक अच्छा जरिया: कॉर्पोरेट जगत के बढ़ते तनाव को कम करने के लिए साइकिलिंग को जरिया बनाने वाले शलभ गुप्ता भी व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं. वे कहते हैं कि दैनिक जीवन और बिजनेस के तनाव को भूलकर हम दोस्त सुबह हवा से बातें करने निकलते हैं, जिससे मानसिक सुकून मिले. लेकिन दिल्ली-एनसीआर में हमारे सामने दो बड़ी चुनौतियां हैं. पहला दिवाली के आसपास होने वाला जानलेवा वायु प्रदूषण व दूसरा सड़कों पर सुबह-सुबह होने वाली रैश ड्राइविंग (तेज व लापरवाही से वाहन चलाना) है. सुबह के वक्त सड़कें खाली देखकर ट्रक व अन्य वाहन चालक बेहद खतरनाक स्पीड में गाड़ियां दौड़ाते हैं. हम पूरी तरह से विजिबल कपड़े व लाइट्स लगाकर सड़क के बिल्कुल कोने में चल रहे होते हैं. इस खौफ ने साइकिल चालकों के मन में घर कर लिया है.
बड़े लोग डर से नहीं खरीद रहे साइकिल: सड़कों के इस खौफ का सीधा असर अब व्यापार पर भी दिखने लगा है. साइकिल विक्रेता मोहम्मद इलियास ने बताया कि दुकानों पर अब सिर्फ बच्चों की साइकिलों की मांग रह गई है. बड़े लोग अब साइकिल खरीदने से परहेज कर रहे हैं. जब उनसे इसका कारण पूछा गया तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि बड़े लोग अब साइकिल इसलिए नहीं खरीदते क्योंकि उन्हें सड़कों पर चलने में डर लगता है. जान का खतरा इतना ज्यादा है कि लोग शौक के लिए भी साइकिल पर पैसा लगाने को तैयार नहीं हैं.
बच्चों की शारीरिक गतिविधि के लिए साइकिल जरूरी: अपने बच्चे के लिए साइकिल खरीदने आए अभिभावक रोहित भी बड़े शहरों की इस दुर्दशा की पुष्टि करते हैं. खुद साइकिल चलाने वाले रोहित का कहना है कि छोटे शहरों में ट्रैफिक कम होने के कारण साइकिल चलाना बेहद आसान है, लेकिन दिल्ली-एनसीआर जैसे महानगरों में गाड़ियां चलाने वाले साइकिल सवारों को कुछ समझते ही नहीं हैं. कहीं से भी गाड़ी घुसा दी जाती है. हालांकि वे यह भी मानते हैं कि बच्चों की शारीरिक गतिविधि और बेहतर भविष्य के लिए बचपन से ही साइकिल चलाना बेहद जरूरी है, जिससे वे स्वस्थ रह सकें.
साइकिलिस्टों की मांग:
दिल्ली-एनसीआर के साइकिलिस्टों व आम नागरिकों ने सरकार और प्रशासन के सामने कुछ बेहद जरूरी मांगें रखी हैं.
डेडिकेटेड साइकिल ट्रैक या फास्ट लेन: मुख्य सड़कों व एक्सप्रेसवे पर साइकिल चालकों के लिए सुरक्षित, अलग ट्रैक बनाए जाएं. प्रतिम का सुझाव है कि जिस तरह विदेशों में या कुछ चुनिंदा जगहों पर एम्बुलेंस लेन होती है, उसी तरह साइकिल को भी किसी सुरक्षित लेन के साथ संबद्ध किया जाए.
यातायात नियमों का कड़ाई से पालन: शराब पीकर गाड़ी चलाने वालों और सुबह के समय रैश ड्राइविंग करने वालों व भारी वाहनों पर पुलिस की पैनी नजर हो.
व्यावसायिक चालकों की काउंसलिंग: ऑटो, थ्री-व्हीलर व बस चालकों को जागरूक किया जाए. अक्सर देखा जाता है कि सवारियां बिठाने के चक्कर में ऑटो चालक साइकिल के आगे आकर अचानक ब्रेक लगा देते हैं, जिससे पीछे से आ रहा साइकिल सवार सीधे गाड़ी में जा भिड़ जाता है.
विश्व साइकिल दिवस पर केवल साइकिल चलाकर फोटो खिंचवाने से बदलाव नहीं आएगा. जब तक दिल्ली-एनसीआर की सड़कों पर साइकिल चालकों को सुरक्षा का अहसास व सम्मानजनक स्पेस नहीं मिलेगा, तब तक प्रदूषण मुक्त भारत व स्वस्थ भारत का सपना केवल कागजों और भाषणों तक ही सीमित रहेगा. सरकार को इस घटती संख्या को एक चेतावनी की तरह लेना चाहिए.
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