नक्सलमुक्त बस्तर की नई पहचान, 'मिट्टी' से जुड़कर रोजगार के साथ पारंपरिक कला को जीवित रख रहे युवा
दंतेवाड़ा में कुम्हार कला को बढ़ाने में माटी कला केंद्र मदद कर रहा है. युवा इससे जुड़कर भविष्य बना रहे. मुकेश श्रीवास की रिपोर्ट

By ETV Bharat Chhattisgarh Team
Published : April 25, 2026 at 7:22 PM IST
|Updated : April 25, 2026 at 8:33 PM IST
दंतेवाड़ा: दक्षिण बस्तर का दंतेवाड़ा जिला, जो कभी नक्सल गतिविधियों के कारण सुर्खियों में रहता था, आज विकास, आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की नई कहानी लिख रहा है. यहां के युवा अब परंपरा और और कला को रोजगार से जोड़ रहे हैं. इसी कड़ी में परंपरागत कुम्हार कला को पुनर्जीवित कर इसे आधुनिकता से भी जोड़ा जा रहा है. इस बदलाव में माटी कला केंद्र भी मदद कर रहा है.
जिला प्रशासन की पहल
दंतेवाड़ा की कुम्हार बस्ती, जिसे रास कुम्हार बस्ती के नाम से जाना जाता है, वर्षों से मिट्टी के बर्तन बनाने की परंपरा को संजोए हुए है. यहां के कारीगर पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी इस कला को आगे बढ़ाते आए हैं. समय के साथ जब आधुनिकता ने पारंपरिक व्यवसायों को पीछे धकेलना शुरू किया, तब इस कला के अस्तित्व पर भी संकट मंडराने लगा था. लेकिन जिला प्रशासन की पहल ने इस परंपरा में नई जान फूंक दी.
ट्रेनिंग लेकर भविष्य बना रहे युवा
दंतेवाड़ा में माटी कला केंद्र की स्थापना वर्ष 2022 में की गई, इससे जुड़कर स्थानीय बेरोजगार युवा प्रशिक्षण ले रहे हैं. वे आत्मनिर्भर तो बन ही रहे हैं साथ ही अपनी बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखते हुए इसे आगे बढ़ा रहे हैं. इस केंद्र में युवाओं को मिट्टी के बर्तन बनाने की बारीकियां सिखाई जाती हैं, जिसमें सुराही, हांडी, गमला, चूल्हा, कढ़ाई, दीये के साथ नवाचार के रूप में मिट्टी की बोतल और जार जैसे उत्पाद भी शामिल हैं.

गर्मी के मौसम को बनाएं अवसर
गर्मी के मौसम में मिट्टी के बर्तनों की मांग तेजी से बढ़ जाती है, खासकर सुराही और हांडी की. यह मांग कुम्हारों के लिए एक बड़ा अवसर बनकर सामने आई है. वर्तमान में लगभग 15 लोग केंद्र में कार्यरत हैं, जो अपने हुनर से न केवल स्थानीय बाजार, बल्कि अन्य जिलों की मांग को भी पूरा कर रहे हैं. बाकी युवा भी रजिस्ट्रेशन कर यहां ट्रेनिंग ले सकते हैं.

मैंने यहां प्रशिक्षण प्राप्त किया. पहले रोजगार की कोई स्थायी व्यवस्था नहीं थी, लेकिन अब मिट्टी के बर्तन बनाकर अच्छी आमदनी हो रही है. गर्मियों में मांग बढ़ने से काम भी ज्यादा मिल रहा है.- विष्णु देव, केंद्र में कार्यरत
एक ट्रेनिंग से फायदे अनेक
माटी कला केंद्र के संचालक सुदामा राणा का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य सिर्फ रोजगार देना नहीं, बल्कि बस्तर की पारंपरिक कला को जीवित रखना भी है. उन्होंने बताया कि शुरुआती दौर में 15 लोगों को प्रशिक्षण दिया गया, जो अब खुद का व्यवसाय कर रहे हैं. साथ ही, समय-समय पर आयोजित होने वाले मेलों और प्रदर्शनी में भी कारीगरों को अपने उत्पाद प्रदर्शित करने का अवसर मिलता है, जिससे उनकी आय में वृद्धि होती है.

रोजगार और संस्कृति एक साथ- कलेक्टर
जिला कलेक्टर देवेश कुमार ध्रुव ने बताया कि यह केंद्र स्थानीय लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला रहा है. हमारा उद्देश्य है कि जिले के बेरोजगार युवाओं को रोजगार के अवसर मिलें और वे आत्मनिर्भर बनें. साथ ही, बस्तर की सांस्कृतिक परंपराएं भी संरक्षित रहें. प्रशासन द्वारा प्रशिक्षण, संसाधन और बाजार उपलब्ध कराने में हर संभव सहयोग किया जा रहा है.

आज माटी कला केंद्र सिर्फ एक प्रशिक्षण केंद्र नहीं, बल्कि उम्मीद और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन चुका है. यह पहल दिखाती है कि सही दिशा और सहयोग मिलने पर पारंपरिक कला भी आधुनिक समय में अपनी जगह बना सकती है. दंतेवाड़ा की यह बदलती तस्वीर न केवल बस्तर, बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणादायक है. नक्सलमुक्त बस्तर अब विकास, रोजगार और सांस्कृतिक गौरव की राह पर आगे बढ़ रहा है, और माटी कला केंद्र इस परिवर्तन का एक मजबूत आधार बनकर उभरा है.

