विश्व प्रसिद्ध बस्तर फागुन मेला 2026: 1100 देवी देवताओं के साथ बस्तर महाराजा का नगर भ्रमण
विश्व प्रसिद्ध फागुन मेले में आस्था, परंपरा और संस्कृति का अनूठा संगम देखने को मिलता है. हजारों देशी विदेशी पर्यटक इसे देखने आते हैं.

By ETV Bharat Chhattisgarh Team
Published : March 4, 2026 at 5:35 PM IST
दंतेवाड़ा: 10 दिनों तक चलने वाले विश्व प्रसिद्ध फागुन मेले की रौनक देखते ही बन रही है. आज बस्तर राज परिवार के महाराज 1100 देवी देवताओं के साथ नगर भ्रमण पर निकले. 22 फरवरी से शुरू हुआ ये आयोजन होली के एक दिन बाद 5 मार्च तक चलेगा. इस मेले में बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा के दर्शन लोगों को होते हैं. विश्व प्रसिद्ध फागुन मेले में आस्था, परंपरा और संस्कृति का अनूठा संगम देखने को मिलता है.
फागुन मेले की शुरुआत होती है पौधों की पूजा एवं रंग भंग कार्यक्रम से
मेले के पहले दिन पौधों का पूजन और रंग भंग कार्यक्रम का आयोजन किया गया. परंपरा के अनुसार, मां दंतेश्वरी की पूजा कर विधि-विधान से रंग भंग की रस्म अदा की गई. इनके आशीर्वाद से ही पूरे मेले की शुरुआत मानी जाती है. इसके बाद शाम 4 बजे से 1100 देवी–देवताओं के साथ नगर भ्रमण की शुरुआत होती है.नगर भ्रमण के लिए शहर में कई स्थानों पर आम जनता हेतु दर्शन एवं आशीर्वाद प्राप्त करने की विशेष व्यवस्था की गई. इस अद्भुत दृश्य में देवी–देवताओं की पालकियां, ढोल-नगाड़ों की गूंज और भक्तों की जयकारे माहौल को दिव्य बना देते हैं.
बस्तर महाराजा की अगुवाई में सम्पन्न होती है नगर भ्रमण की रस्म
नगर भ्रमण की रस्में बड़े ही गौरव और परंपरा के साथ निभाई जाती हैं. इस दौरान महाराज कमलचंद्र भंजदेव खुद उपस्थित होकर परंपराओं का निर्वहन करते हैं. बस्तर महाराज जगदलपुर और दंतेवाड़ा में अपनी कुलदेवी के दर्शन कर पूजा-अर्चना करते हैं और मेले की सफलता तथा बस्तर की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं. आज परंपरा अनुसार कमलचंद्र भंजदेव ने मां दंतेश्वरी की विधि विधान से पूजा अर्चना की.
मां दंतेश्वरी की निकली डोली, फागुन मेले का मुख्य आकर्षण रहा
फागुन मेले के दौरान पूजा-अर्चना के बाद मां दंतेश्वरी की डोली को नगर भ्रमण के लिए निकाला गया. यह डोली यात्रा सदियों पुरानी परंपरा है और फागुन मेले की सर्वाधिक महत्वपूर्ण रस्मों में से एक मानी जाती है. इस दौरान पुलिस जवानों द्वारा गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाना माता के प्रति सम्मान और भक्ति का प्रतीक है. हजारों श्रद्धालु डोली के दर्शन करने और माता का आशीर्वाद पाने के लिए उमड़ते हैं.
22 फरवरी से 5 मार्च तक हर दिन निभाई जाती अलग-अलग रस्में
फागुन मेले की शुरुआत 22 फरवरी को होती है, जब मेले की पहली रस्म कलश स्थापना के साथ की जाती है. इसके बाद प्रतिदिन मां दंतेश्वरी मंदिर में अलग-अलग परंपराओं और अनुष्ठानों का आयोजन होता है. पिछले वर्ष की तुलना में देवी–देवताओं की संख्या थोड़ी कम रही, लेकिन उत्साह और भव्यता में कोई कमी नहीं आई . मेले के अंत में होलिका दहन के बाद सभी देवी–देवताओं की सम्मानपूर्वक विदाई कराई जाती है, जो मेले के समापन की महत्वपूर्ण परंपरा है.
देश-विदेश से पहुंचे पर्यटक
विश्व प्रसिद्ध फागुन मेला को देखने के लिए इस बार भी हजारों की संख्या में देशी और विदेशी पर्यटक पहुंचे. पर्यटकों ने बस्तर की समृद्ध संस्कृति के दर्शन किए. कमलचंद्र भंजदेव ने कहा कि आज बस्तर में अमन और शांति स्थापित हो रही है, जो माता रानी की कृपा का परिणाम है. उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों ने जो परंपराएं शुरू की थी, उन्हें आज भी पूरी निष्ठा और भक्ति के साथ निभाया जा रहा है. उन्होंने जोर देकर कहा कि बस्तर की संस्कृति और परंपरा को जीवित रखने तथा बढ़ावा देने के लिए वे हर संभव प्रयास कर रहे हैं.
ग्राम देवी देवता आकर्षण का होते हैं केंद्र
फाल्गुन मेले में बस्तर के प्रत्येक क्षेत्र से देवी–देवता मां दंतेश्वरी मंदिर में पधारते हैं. इस बार नारायणपुर से दंतेश्वरी माता की बहन मावली माता और उनकी छोटी बेटी राकेडा माता भी मेले में सम्मिलित हुईं. इनका विधि-विधान से स्वागत किया गया और परंपरानुसार पूजा-अर्चना कर मेले में शामिल किया गया.

