बालोद में इको टूरिज्म के तहत बम्बू राफ्टिंग की शुरुआत, मां सियादेवी मंदिर जलाशय में लुत्फ उठा रहे लोग
बालोद में पर्यटन को बढ़ाने के लिए नई पहल की गई है. नए साल पर नई जगह एक्सप्लोर करते हुए बम्बू राफ्टिंग की शुरुआत हुई.

By ETV Bharat Chhattisgarh Team
Published : January 2, 2026 at 3:32 PM IST
बालोद: जिले में एक बार फिर इको टूरिज्म की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है. दशकों से उपेक्षित रहे मां सियादेवी मंदिर के पास बने जलाशय में अब बम्बू राफ्टिंग की शुरुआत हो चुकी है. इस पहल का मुख्य उद्देश्य स्थानीय पर्यटन को बढ़ावा देना, युवाओं को रोजगार देना और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना है.
उपेक्षित जलाशय बना नया पर्यटन केंद्र: प्राकृतिक सुंदरता से घिरा यह जलाशय अब तक अनदेखा रहा था, लेकिन स्थानीय पंचायत के प्रयास और प्रशासन के सहयोग से इसे इको टूरिज्म स्पॉट के रूप में विकसित किया गया है. नए साल के मौके पर शुरू हुई इस पहल को पहले ही दिन पर्यटकों का अच्छा रिस्पॉन्स मिला.
युवाओं को रोजगार, गांव को नई पहचान: इस पहल की नींव रखने वाले गांव के उप सरपंच जगन्नाथ साहू ने बताया कि उनका पहला लक्ष्य गांव के उन युवाओं को रोजगार देना है, जो प्रकृति के बीच रहते हुए भी बेरोजगार थे. बम्बू से बनी नावों का संचालन स्थानीय युवा ही कर रहे हैं. साथ ही पंचायत को छोटे-छोटे व्यापार संचालन के प्रस्ताव भी मिलने लगे हैं.
सिर्फ 50 रुपए में बम्बू राफ्टिंग का आनंद: उप सरपंच ने बताया कि बम्बू राफ्टिंग का शुल्क सिर्फ 50 रुपए प्रति व्यक्ति रखा गया है, ताकि हर वर्ग के लोग इसका आनंद ले सकें. प्रशासन की ओर से इस पूरे प्रोजेक्ट की रोजाना मॉनिटरिंग की जा रही है.
बालोद में कई पर्यटन स्थल हैं, लेकिन यह जगह बेहद खास है और यहां पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं.- दुर्ग से आए पर्यटक कुलेश्वर साहू
मैं लंबे समय से यहां आती-जाती रही हूं, लेकिन यह नया अनुभव बेहद खुशी देने वाला है. बोटिंग का अनुभव शानदार रहा और बच्चे भी काफी खुश हैं.- कमला साहू, पर्यटक
मैंने कभी नहीं सोचा था कि बालोद में ऐसी जगह होगी. इस स्थान का प्रचार-प्रसार होना चाहिए और स्वच्छता जरूर रहनी चाहिए, क्योंकि कई बार शुरुआत में अच्छा रहता है लेकिन बाद में बदइंतजामी हो जाती है- मनोहर पटेल, पर्यटक

शुद्ध इको टूरिज्म की दिशा में कदम: गांव के उप सरपंच ने बताया कि यह स्थान पूरी तरह इको टूरिज्म मॉडल पर विकसित किया जा रहा है. प्लास्टिक का उपयोग नहीं होगा, पत्तों से बने दोना-पत्तल का इस्तेमाल होगा. स्वच्छता के लिए विशेष कार्ययोजना बनाई गई है. यह पहल प्रकृति संरक्षण के साथ पर्यटन को आगे बढ़ाने का एक बेहतरीन उदाहरण बन रही है.

