पाक जेल में बंद भाई के लिए बहन के संघर्ष की वो दास्तां, जिसने राखी न बांधने की ली थी शपथ
पाकिस्तान की जेल में 7 साल से बंद भाई को छुड़ा लाई बहन, रक्षाबंधन पर भाई की कलाई पर राखी बांध कर पूरी की तपस्या. बहन के संघर्ष, समर्पण और विश्वास को दिखाती अशोक गिरी की रिपोर्ट.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : August 28, 2026 at 4:57 PM IST
बालाघाट: "जब तक मेरा भाई पाकिस्तान की जेल से रिहा नहीं हो जाता तब तक मैं किसी की कलाई पर राखी नहीं बांधूंगी. मैं हर बार रक्षा बंधन पर उसे याद करती हूं, हर बार की तरह उसे राखी भेजना चाहती हूं, लेकिन वो मुझसे बहुत दूर है, वहां राखी भी नहीं पंहुच सकती." ये कहते हुए बहन संघमित्रा की आखों से भावनाओं का ज्वार हर बार रक्षाबंधन पर फूट पड़ता था, किन्तु इस बार रक्षाबंधन में उसकी बरसों की मुराद पूरी हो गई.
ये कहानी उस बहन के संघर्ष की है, जिसके रेशम की डोर की ताकत और उसके विश्वास ने आखिरकार अपने बेगुनाह भाई को पाकिस्तान की जेल से रिहाई करवाकर अपने घर वापस ले आई.

मानसिक स्थिति खराब हुई और भाई प्रसन्नजीत लापता हो गया
दरअसल, बालाघाट जिले के खैरलांजी का रहने वाला प्रसन्नजीत रंगारी पढ़ाई के काफी तेज था, इसी वजह से पिता ने कर्ज लेकर जबलपुर के खालसा कालेज में पढ़ाई के लिए भेजा. जहां से पढ़ाई पूरी करने के बाद उसने साल 2011 में एमपी स्टेट फार्मेसी काउंसिल में अपना रजिस्ट्रेशन कराया, किन्तु अचानक की मानसिक स्थिति खराब हो गई और फिर एक दिन प्रसन्नजीत घर छोड़कर अचानक भाग निकला. जिसके 8 महीने बाद बिहार से वह घर वापस लौटा, किन्तु फिर एक साल बाद वह अचानक गायब हो गया और अबकी बार फिर उसका कोई पता नहीं चल सका. परिवार ने भी यह मान लिया कि अब शायद वह इस दुनिया में नहीम रहा. अगर होता तो कहीं न कहीं से कोई खबर तो आती.
फोन आता भाई प्रसन्नजीत पाकिस्तान की जेल में है
प्रसन्नजीत की बहन संघमित्रा बताती हैं कि उस दिन उनकी खुशी का ठिकाना नहीं था, जब एक फोन पर यह जानकारी मिली की उनका भाई पाकिस्तान की जेल में है. भाई के जिंदा होने की खुशी से संघमित्रा झूम उठी, लेकिन दूसरे ही पल वह यह सोच कर स्तब्ध रह गई कि उसका भाई पाकिस्तान की जेल में बंद है. बहन संघमित्रा बताती हैं कि "यह फोन कुलदीप सिहं नाम के व्यक्ति का था, जो पाकिस्तान की जेल से दो दशक बाद रिहा होकर वतन वापस लौटा था. कुलदीप ने ही बताया, कि उसका भाई प्रसन्नजीत पाकिस्तान की जेल में बंद है. फिर उसके बाद शुरू हुई एक बहन के संघर्ष और समर्पण की कहानी.

कलेक्टर से लेकर नेताओं के चक्कर लगाना आम हो गया था
संघमित्रा ने अपने भाई को छुड़ाने के लिए दिन रात एक कर दिया. जब से उसे पता चला कि उसका भाई पाकिस्तान की जेल में बंद है, वह लगातार शासन प्रशासन से मदद की गुहार लगाती रही. कभी कलेक्टर कार्यालय के चक्कर तो कभी नेताओं की शरण में जाना, उसके लिए आम बात हो गई थी. उस पर पारिवारिक आर्थिक बोझ उसके लिए और बड़ी मुसीबत से कम नहीं था. आर्थिक तंगी को दरकिनार कर वह अपने भाई की रिहाई के लिए लगातार संघर्षरत रही.
जब तक भाई पाक जेल से रिहा होकर नहीं आयेगा, किसी को रखी नहीं बांधनी
इसी दरमियान उसने रक्षा बंधन के त्यौहार पर पाकिस्तान की जेल में भाई को राखी भेजना चाही, किन्तु वहां पत्र भेजने की अनुमति न होने के चलते वह अपने भाई को राखी तक न भेज सकी. तभी उसने ठान लिया कि जब तक उसका भाई रिहा होकर वापस नहीं आ जाता वह किसी की कलाई में राखी नहीं बांधेगी.
वो दिन भी आया जब जेल से भाई रिहा हुआ और उसे राखी भी बांधी
आखिरकार वह दिन आया जब सात साल पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में सजा काटकर प्रसन्नजीत की वतन वापसी हुई. 31 जनवरी 2026 की वो तारीख जब पाकिस्तान की जेल से सात भारतीयों को रिहा किया गया, जिसमें बालाघाट के खैरलांजी निवासी प्रसन्नजीत का भी नाम था. फिर क्या था, परिजनों की खुशियों का ठिकाना नहीं था. बहन संघमित्रा के संघर्ष और समर्पण की जीत हुई और अबकी बार रक्षाबंधन पर एक बहन की शपथ पूरी हुई. बहन संघमित्रा ने अपने भाई को रक्षाबंधन पर राखी बांधी और उसके उज्जवल भविष्य की कामना की.

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इस दौरान संघमित्रा ने मीडिया से चर्चा के दौरान कहा कि "जब से पता चला कि उसका भाई पाकिस्तान की जेल बंद है, तब से वह अकेले ही संघर्ष करती रही. कभी थाने, कभी कलेक्टर आफिस तो कभी नेता मंत्रियों के चक्कर काटती रही. मगर आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला. किन्तु बीते साल उसके द्वारा अपने भाई को लिखी चिट्ठी मीडिया में छपी तो मामला राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आ गया, जिसके बाद उसके भाई की रिहाई के प्रयास तेज हुए."
रक्षाबंधन पर कई सालों बाद अपने भाई की कलाई पर राखी बांधकर संघमित्रा बहुत खुश नजर आईं. हालांकि इस दौरान बहन की आंखों में आंसू छलक पड़े, किन्तु ये अब वो आंसू नहीं, दरअसल ये खुशी के आंसू हैं. भाई प्रसन्नजीत भी अपनी बहन के साथ प्रसन्न नजर आया, लेकिन अब भी प्रसन्नजीत की मानसिक स्थिति बेहतर नहीं है. संघमित्रा उसके दस्तावेज बनाने को लेकर आज भी लगातार प्रयासरत है, ताकि उसके दस्तावेज बनने के बाद उसा एक अच्छे अस्पताल में इजाल हो सके.

