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बालाघाट में अंधविश्वास और कुरीतियों में जकड़े बैगा, नाले का पानी पीने को मजबूर, सरकार के सारे दावे यहां फेल

बालाघाट में बैगाओं के 19 बच्चों की मौत के बाद प्रदेश में हड़कंप. ईटीवी भारत की टीम ने प्रभावित गांवों का किया दौरा. अशोक गिरी की रिपोर्ट.

BALAGHAT GROUND ZERO REPORT
बालाघाट में बच्चों की मौत के बाद ग्राउंड जीरो पर ETV भारत (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Madhya Pradesh Team

Published : August 19, 2026 at 10:19 PM IST

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Updated : August 20, 2026 at 8:51 PM IST

10 Min Read
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बालाघाट: आदिवासी बैगा बाहुल्य बालाघाट के कुछ गावों में पिछले 2 महीनों में अब तक 19 बच्चों की मौत से प्रदेश में हड़कंप मच गया है. जिस तेजी से इस मामले में सियासत हो रही है ठीक उसी तेजी से अब शासन-प्रशासन भी एक्टिव मोड में आ गया है. एनआईवी आईसीएमआर पुणे की रिपोर्ट में बच्चों की मौत की पुष्टि मीजल्स और मलेरिया से होना बताया जा रहा है.

इस रिपोर्ट के आने से पहले ही स्वास्थ्य विभाग के अस्थाई कैंपों के अलावा तकरीबन 20 टीमें कई प्रभावित गांव का लगातार दौरा कर रही हैं और घर-घर पहुंचकर बच्चों की जांच के साथ परिजन को समझाइश दे रही हैं. इतना ही नहीं हाल ही में जिले में पुलिस विभाग में भर्ती विशेष सहयोगी दल को भी प्रभावित ग्रामों में भेजा गया है. कमिश्नर, कलेक्टर, तहसीलदार और एसडीएम लगातार यहां पहुंच रहे हैं.

ईटीवी भारत की टीम ने भी बालाघाट के कुछ प्रभावित गांवों का दौरा कर जाना कि प्रदेश के अंतिम छोर में रह रहे बैगा आदिवासियों के हालात क्या हैं. उनके रहन सहन और खाने के साथ पीने के पानी की व्यवस्थाओं पर बारीकी से पड़ताल की. बच्चों की कैसी हालत है इस पर भी लोगों से बात की. ग्रांउड जीरो से ईटीवी भारत की खास रिपोर्ट.

सबसे ज्यादा प्रभावित गांवों में पहुंची ईटीवी भारत की टीम (ETV Bharat)

सबसे ज्यादा प्रभावित गांवों में पहुंची ईटीवी भारत की टीम

ईटीवी भारत की टीम जब प्रभावित ग्राम कुंडेकसा पंहुची और जानकारी ली तो पता चला कि जिस तरह की बीमारियों का यहां पर प्रकोप देखने मिल रहा है, वह केवल बैगा समुदाय के ही बच्चों में हैं, जबकि प्रभावित ग्राम कुण्डेकसा सहित अडोरी, कोरका, मछुरदा और आसपास के अन्य गांवों में बैगा जाति के अलावा गोंड, यादव, नाई, धोबी आदि समुदाय के परिवार भी रहते हैं. लेकिन जिस तरह से बच्चों के शरीर पर दाने, बुखार और अन्य लक्षण देखे जा रहें हैं वह केवल बैगा समुदाय के बच्चों में ही देखे जा रहें है.

BALAGHAT TRIBAL CHILDREN DEATH cases
बालाघाट में बैगाओं के 19 बच्चों की मौत के बाद प्रदेश में हड़कंप (ETV Bharat)

बैगा समुदाय के ही बच्चों की हुई मौत

यहां जिन बच्चों की अब तक कई तरह की बीमारियों से मौत होना बताया जा रहा है उनमें केवल बैगा समुदाय के ही बच्चे हैं. सवाल यहां पर उठता है कि बीमारी का प्रकोप है तो अन्य समुदाय के बच्चों में क्यों नहीं है. इस बात को लेकर ग्राउंड जीरो पर पहुंचकर ईटीवी भारत की टीम बैगा बस्तियों में बैगाओं के बीच पहुंची.

बैगाओं का रहन-सहन, खानपान सब कुछ अलग

ईटीवी भारत की टीम ने जब पड़ताल की तो पता चला कि उनकी दिनचर्या ही अलग है. उनका खानपान, रहन सहन, और रीति रिवाज दूसरे समुदायों से बिलकुल अलग है. दूरस्थ वनांचल क्षेत्रों में रहने वाले बैगा समुदाय के लोग स्वभाव से भोलेभाले तो हैं ही साथ ही जागरुकता का इस समुदाय में भारी अभाव है. आज भी ये अंधविश्वास और कुरीतियों में जकड़े हुए हैं.

'बैगाओं में जागरुकता का अभाव'

सेवानिवृत शिक्षक मोहनलाल यादव बताते हैं, "बीते 30 सालों से वे यहां निवासरत हैं, और यहीं के स्कूल में उन्होने अपनी सेवाएं प्रदान की हैं. बैगा समुदाय के लोग दूसरों से बातचीत करने और तालमेल रखने में कुछ असहजता महसूस करते हैं, यहां तक की बात तक करने में कतराते हैं. वे केवल अपने समुदाय के लोगों से अपनी बोली में बात अच्छे से करते हैं."

ICMR PUNE REPORT MEASLES MALARIA
बच्चों को लेकर दर-दर भटक रहे परिजन (ETV Bharat)

उन्होंने बताया, "इन बीते सालों में अध्यापन कार्य के अलावा उन्होंने बैगा समुदाय को जागरुक करने के काफी प्रयास किये किन्तु वे नाकाफी साबित हुए. उनमें आज भी शिक्षा का बहुत अभाव है. उनका मानना है कि बैगा समुदाय के लोग सीधे साधे होते हैं और वे जल्दी ही किसी से भयभीत हो जाते हैं. इसलिए किसी तरह से बातचीत या जवाब देने के बजाय वे अपना रास्ता बदल लेते हैं."

'अंधविश्वास के कारण टीकाकरण से डरती हैं बैगा महिलाएं'

सेवानिवृत शिक्षक मोहनलाल यादव बताते हैं, "उनके अंदर अंधविश्वास आज भी भरा हुआ हैं. वे स्वास्थ्य सेवाओं की बजाय झाड़फूक में ज्यादा विश्वास रखते हैं. बैगा समुदाय की महिलाएं और बच्चे टीकाकरण तक नहीं करवाते हैं. उनके मन में ऐसा भ्रम है कि इंजेक्शन लगाने के बाद उनकी मौत हो जाएगी. इसलिए टीकाकरण के लिए जब स्वास्थ्य अमला पंहुचता है, तो वे छुप जाती हैं या फिर कभी कभी नाराजगी जाहिर करते हुए टीकाकरण का विरोध भी कर देती हैं."

'बच्चों में बचपन से ही शराब की लत'

शिक्षक मोहनलाल यादव बताते हैं, "आज भी इनमें कई ऐसी पंरपराएं हैं जो इन्हें और भी पीछे धकेल रही हैं, जिनमें शराब भी एक कारण है. बैगा समुदाय में बिना शराब के कोई भी कार्यक्रम संपन्न नहीं होते हैं. शादी विवाह हो या फिर जन्म मरण का कार्यक्रम, सभी में इनके द्वारा निर्धारित कर दिया जाता है कि किस कार्यक्रम में कितनी शराब की व्यवस्था करनी है. इतना ही नहीं फिर उसी दौरान महिला पुरुष सहित बच्चों को भी इन कार्यक्रम में शराब परोसी जाती है और शायद यही कारण है कि बच्चों को भी शराब की लत बचपन से ही लग जाती है."

ICMR PUNE REPORT MEASLES MALARIA
सबसे ज्यादा प्रभावित गांवों में पहुंची ईटीवी भारत की टीम (ETV Bharat)

कोदो-कुटकी और कंदमूल पर निर्भर हैं बैगा

आदिवासी बैगा जंगलों से ज्यादा जुड़ाव रखते हैं, क्योंकि इनके लिए बहुत ही चीजें जंगल से उपलब्ध हो जाती हैं. जंगलों से कंदमूल के अलावा कई प्रकार की भाजी और अन्य वस्तुएं इनकी रोजमर्रा के खानपान में शामिल हैं. जिनके भरोसे ये अपना जीवन यापन करते हैं.
इन बैगा बाहुल्य क्षेत्रों की बात करें तो यहां कि भौगोलिक परिस्थिति इनके अनुकूल है. जंगल के अलावा यहां कुछ पहाड़ी इलाका है, जहां पर कुछ जंगल को साफ कर कुछ लोग वहां थोड़ी बहुत खेती कर लेते हैं. जिनमें कोदो-कुटकी की फसल लगाते हैं. हालांकि ये इनके जीवन यापन के लिए काफी नहीं होता लेकिन शासन से मिलने वाला राशन इनके लिए मददगार होता है और बाकी के लिए ये जंगलों पर निर्भर रहते हैं.

सभी बुनियादी सुविधाएं इन गांवों से हैं नदारद

ईटीवी भारत की टीम ने इन गांवों में पहुंचकर पड़ताल की और जाना कि सरकार द्वारा आदिवासियों के लिए तो ढेरों योजनाएं चलाई जा रहीं हैं लेकिन हकीकत क्या है. पड़ताल में लोगों से बात की तो सामने आया कि सरकार की व्यवस्थाएं आधी अधूरी हैं. इन बैगा बाहुल्य ग्रामों में बुनियादी सुविधाएं नदारत हैं. आज भी यहां के लोग खानाबदोश जैसा जीवन जीने को मजबूर हैं.

BALAGHAT 19 BAIGA CHILDREN DEATH
ईटीवी भारत की टीम ने प्रभावित गांवों का किया दौरा (ETV Bharat)

घरों के नाम पर महज झोपड़ियां, जिनमें बारिश के दिनों में छत पर पॉलीथिन और घासफूस डालकर काम चलाया जा रहा है, कहने को तो इनमें से कुछ बैगाओं को पीएम आवास मिले हैं लेकिन अधूरे ही पड़े हैं. कई जगह ठेकेदार ने छत का स्लैब ही नहीं बनाया. साफ सफाई की बात करें तो दूर-दूर तक कीचड़ और कूड़ा करकट घर के चारों तरफ नजर आएगा. इन्हें साफ-सफाई से ज्यादा मतलब भी नहीं, जिस हाल में हैं, उसी में ये ठीक समझते हैं. इन ग्रामों में बिजली, पानी सहित अन्य सुविधाओं का टोटा है. नदी-नालों का गंदा पानी पीते हैं क्योंकि नल-जल योजना के नल तो हैं लेकिन पानी नहीं आता. मीटर लगा है लेकिन बिजली नहीं है.

नाले का पानी पीकर बैगा कर रहे जीवन यापन

ग्राम कुण्डेकसा पंहुचने पर स्थानीय बैगा सहर सिंह ने बताया, "वे पास के ही एक नाले से पीने का पानी लाते हैं और नाले के ही पानी का उपयोग पिछले कई सालों से कर रहे हैं." वहीं कुण्डेकसा की बिराजो बाई बताती हैं, "उनके गांव में नल तो है लेकिन उसमें गंदा पानी आता है, जिसे बर्तन साफ करने के काम में लेते हैं लेकिन पीने के लिए नाले का ही पानी उपयोग करते हैं. इस दौरान बहते नाले के किनारे रेत पर एक छोटा सा गड्ढा बना लेते हैं, जिसमें कुछ घण्टों मे पानी सिपेज होकर भर जाता है, फिर उस पानी को गिलास या लोटे की सहायता से वे निकालते हैं और उसे छानकर पीने के उपयोग में लाते हैं."

BALAGHAT TRIBAL CHILDREN DEATH
बैगाओं के रहन सहन की पड़ताल करती रिपोर्ट (ETV Bharat)

मटमैले पानी से ही नहाते हैं बैगा और उनके बच्चे

इन बैगा बाहुल्य ग्रामों में एक और तस्वीर देखने मिली, जहां पर बारिश के दिनों में बह रहे नाले के मटमैले गंदे पानी में गांव के लोग बिना संकोच के नहाते नजर आते हैं. इसी गंदे मटमैले पानी में महिलाएं कपड़े धोती और बच्चे डुबकी लगाकर नहाते हैं. हालांकि इतने गंदे पानी से नहाने पर फंगल इंफेक्शन और अन्य बीमारियों का खतरा भी हो सकता है.

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गंदा पानी पीने को मजबूर हैं यहां बैगा समुदाय के लोग (ETV Bharat)

इन क्षेत्रों में फैली कई तरह की गंभीर बीमारी, जिसने कई मासूमों को मौत की नींद सुला दिया, बावजूद इसके इस क्षेत्र में ऐसे गंदे मटमैले नदी नालों के पानी में नहाना और नाले का ही पानी पीना कितना गंभीर विषय है. इसे लेकर उन्हें रोकने या समझाने की जरुरत है लेकिन इस दिशा में ऐसे प्रयास भी नहीं दिखाई पड़ते हैं, जबकि बीते डेढ़ महीने से यहां पर बीमारी का प्रकोप है. एक स्थानीय बैगा बताते हैं कि बच्चे की तबीयत बिगड़ी और चेक कराया तो मलेरिया निकला लेकिन 3 दिन में ही उसकी मौत हो गई.

'जिम्मेदारों पर होना चाहिए कड़ी कार्रवाई'

ईटीवी भारत की टीम ने यहां की तमाम अव्यवस्थाओं को लेकर जब संबंधित जवाबदारों से जानकारी लेना चाही तो कोई भी कुछ बोलने से इनकार कर रहा है. इधर प्रभावित ग्रामों का दौरा कर रहे जिला पंचायत अध्यक्ष सम्राट सिंह सरस्वार ने ईटीवी भारत के सवालों का जवाब देते हुए स्वीकारा कि "कहीं न कहीं शासन और प्रशासन की लापरवाही है, जिसका दंश यहां के लोगों को झेलना पड़ रहा है." उन्होंने कहा कि "जो भी जिम्मेदार है, उन पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए."

इधर बैगा आदिवासी वाले इन गांवों में बच्चों की मौत के बाद स्वास्थ्य अमला तैनात है और अस्थाई मेडिकल कैंपों में इलाज की व्यवस्था लगातार जारी है. उच्च अधिकारियों भी लगातार दौरे कर रहे हैं. इसके अलावा एम्बुलेंसों की व्यवस्था की गई है जो प्रतिदिन गंभीर बच्चों को जिला अस्पताल लाने ले जाने का काम कर रही हैं. आईसीएमआर पुणे की रिपोर्ट आने के बाद कलेक्टर कुमार सत्यम ने इन गांव में बच्चों को मीजल्स रुबेला का टीकाकरण अभियान शुरू करने की बात कही है.

Last Updated : August 20, 2026 at 8:51 PM IST