ETV Bharat / state

कई बार डूबे घर, बिकी पुश्तैनी जमीन, विनाशलीला के बीच आज भी स्थायी समाधान ढूंढ रहा बिहार का ये गांव

बागमती के कटाव से हर साल उजड़ते नरकटिया गांव के लोग बाढ़ की विभीषिका और खोखले प्रशासनिक आश्वासनों के बीच जीने को मजबूर हैं

SHEOHAR NARKATIA VILLAGE FLOOD
नरकटिया गांव के विस्थापित ग्रामीण (ETV Bharat)
author img

By ETV Bharat Bihar Team

Published : July 6, 2026 at 5:30 PM IST

7 Min Read
Choose ETV Bharat

शिवहर: बिहार के शिवहर जिले के पिपराही प्रखंड अंतर्गत आने वाला नरकटिया गांव साल दर साल बाढ़ का कहर झेलता है. बागमती नदी की भीषण बाढ़ और निरंतर होने वाले कटान के कारण बीते वर्षों में ये गांव कई-कई बार पूरी तरह से उजड़ चुका है. दशकों से हर वर्ष बाढ़ की यह भयानक त्रासदी झेल रहे यहां के स्थानीय निवासियों को हर बार अपना पूरा आशियाना बिल्कुल नए सिरे से बनाने को मजबूर होना पड़ता है.

ग्राउंड रिपोर्ट की दर्दनाक हकीकत: पिपराही प्रखंड के इस पीड़ित नरकटिया गांव के हालात देखकर कोई भी दंग रह जाएगा. वहां हर एक दरवाजे पर एक नया दर्द, लाचारी और विस्थापन की एक बेहद भावुक दास्तां दिखाई दे रही थी. मचान पर लाचारी में बैठी मां से लेकर अपने जीवन काल में करीब 54 से अधिक भयानक बाढ़ें देख चुकी बुजुर्ग महिला तक की हालत दयनीय है. इस पूरे पीड़ित गांव के हर एक घर ने बागमती का यह विनाशकारी और डरावना कहर गहराई से झेला है.

SHEOHAR NARKATIA VILLAGE FLOOD
अस्थायी निवास स्थान (ETV Bharat)

राम सखी की आपबीती: नरकटिया वार्ड नंबर 2 की रहने वाली राम सखी देवी, जिनके पति का नाम रामबाबू सहनी है, वह मचान पर सिर पर पल्लू रखकर और गोद में मासूम बच्चे को लिए हुए बेहद लाचारी और तंगहाली की स्थिति में बैठी नजर आईं. साल 1999 में ब्याह कर इस गांव में आई राम सखी के घर में विवाह के वर्षों बाद तक कोई संतान सुख नहीं था, लेकिन जब उनकी कोख भरी तो आज उनके पास 6 बेटियां और 2 बेटे हैं. उनके पति पेशे से एक मछुआरे हैं और नदी से मछली मारकर जो कुछ भी कमा पाते हैं, उसी से पूरे बड़े परिवार का किसी तरह गुजर-बसर और पालन-पोषण होता है.

"जब-जब बांध टूटता है, पूरा परिवार बाढ़ की विभीषिका झेलता है. हम बच्चों को गोद में लेकर बांध किनारे महीनों गुजारते हैं. जब भी बाढ़ आती है, तो मुख्य रोड पर पॉलीथिन तानकर अपने परिवार को ऊंची जगह ले जाते हैं, जहां सरकारी लोग आते हैं, लिखा-पढ़ी करते हैं. लेकिन सिर्फ खोखला आश्वासन ही मिलता है."- राम सखी देवी, विस्थापित

SHEOHAR NARKATIA VILLAGE FLOOD
राम सखी देवी, विस्थापित (ETV Bharat)

चंपा देवी का संघर्ष: बेलवा की रहने वाली चंपा देवी जिनकी उम्र लगभग 75 वर्ष है, वह साल 1963 में पहली बार ब्याह कर शिवहर जिले के इस इलाके में आई थीं और शादी के ठीक तीन साल बाद घूंघट की आड़ में ही उन्होंने अपने जीवन की सबसे पहली भयानक बाढ़ देखी. तब से लेकर अब तक वे करीब 54-55 बार अपना पूरा हंसता-खेलता घर अपनी आंखों के सामने बहते देख चुकी हैं.अपनी तीन पीढ़ियों की सलामती की दुआ करते हुए इस नदी के ऊंचे तटबंध पर बसेरा करना अब उनकी नियति बन चुका है. बार-बार उजड़ने और दोबारा बसने के दरम्यान ही उन्होंने संघर्ष करके अपने बेटों को पढ़ाया-लिखाया.

देखें रिपोर्ट (ETV Bharat)

कुंदन सहनी की मायूसी: नरकटिया वार्ड नंबर 6 के निवासी कुंदन सहनी बांध किनारे टंगी हुई पॉलीथिन की अस्थायी छत के आगे बेहद लाचार और मायूस नजर आए. यह वही घर है जिसे उन्होंने अपने पसीने की गाढ़ी कमाई से एक-एक पैसा जोड़कर बहुत चाव से बनाया था, लेकिन उन्होंने इसे अपनी आंखों के सामने कई बार नदी के तेज बहाव में बहते और उजड़ते देखा है. पिछले 14 वर्षों से भी अधिक समय से यहां रह रहे कुंदन ने बताया कि जब भी तेज बारिश का मौसम आता है, तो पूरा गांव खौफ से दहल जाता है.

2017 की भयावहता और अभाव: कुंदन को 2017 में आई अपने जीवन की सबसे भयावह बाढ़ की याद आती है. जब नदी के पानी से उनका पूरा गांव ही उजड़ गया था. उनका अनुमान है कि इस प्राकृतिक आपदा से गांव के संभवत: 250-300 से अधिक घर पूरी तरह प्रभावित होते हैं. बाढ़ में घर डूब जाने के बाद गुजर-बसर के लिए कुछ नहीं मिलता, यहां तक कि कोई शौचालय तक की सुविधा पीड़ितों को नहीं मिलती.

"नदी खनती है, कटाई होती है, उपट जाती है तभी पानी घुसता है.अगर सरकार जो बांध का काम अभी चल रहा है, उसे समय पर पूरा करा दे तो सब ठीक हो सकता है." - कुंदन सहनी, विस्थापित

SHEOHAR NARKATIA VILLAGE FLOOD
कुंदन सहनी, विस्थापित (ETV Bharat)

अमित पाण्डेय का स्थायी डर: वार्ड नंबर 4 के निवासी अमित पाण्डेय के परिवार में कुल मिलाकर 6 सदस्य शामिल हैं और इन सभी के जीवन के लिए खेती ही उनके परिवार की एकमात्र आजीविका है जिससे घर का खर्च चलता है. अमित अपने मन के गहरे डर को साझा करते हुए कहते हैं कि बाढ़ का डर हमेशा बना रहता है, वह मंजर बहुत भयावह है. वे भी साल 2017 की उस भयानक बाढ़ को याद करते हुए अचानक बेहद भावुक और उदास हो उठे जब बांध किनारे के घरों में पानी घुस गया था और अनगिनत आशियाने पल भर में मलबे में तब्दील होकर उजड़ गए थे.

टापू बनता गांव और तबाही का मंजर: स्थानीय अमित पाण्डेय कहते है कि नदी का रुख बदलने और तटबंधों के क्षतिग्रस्त होने से गांव में हर वर्ष बाढ़ जैसे गंभीर हालात पैदा हो जाते हैं. बारिश के मौसम में बागमती का जलस्तर तेजी से बढ़ता है और कुछ ही दिनों में खतरे के निशान को पार कर जाता है. इसके बाद जो तबाही आती है वह किसी प्राकृतिक आपदा से कम नहीं होती. नदी के दोनों किनारों पर बने तटबंध कमजोर पड़ जाते हैं और जगह-जगह से क्षतिग्रस्त हो जाते हैं, जिससे बाढ़ का पानी बेरोक-टोक गांव में घुस आता है.

"नदी के दोनों किनारों पर बने तटबंध कमजोर पड़ जाते हैं और जगह-जगह से क्षतिग्रस्त हो जाते हैं, जिससे बाढ़ का पानी बेरोक-टोक गांव में घुस आता है और चारों तरफ केवल पानी ही पानी नजर आता है"- अमित पाण्डेय, स्थानीय

SHEOHAR NARKATIA VILLAGE FLOOD
बदहाली की जिंदगी जीने को मजबूरस ग्रामीण (ETV Bharat)

विस्थापन की पीड़ा: इन हालातों में पॉलीथिन और बांस-बल्ली से बनी अस्थायी झोपड़ियों में खुले आसमान के नीचे बिना पर्याप्त भोजन और स्वच्छ पानी के गुजरे महीने किसी यातना से कम नहीं होते. साथ ही मवेशियों के चारे का भी संकट होता है. ग्रामीणों का कहना है कि बाढ़ के साथ-साथ नदी के कटान ने भी गांव के किसानों को भारी नुकसान पहुंचाया है. कई किसान अपनी पुश्तैनी जमीन गंवा चुके हैं.

राहत कार्य: राज्य सरकार और जिला प्रशासन की ओर से हर वर्ष बाढ़ प्रभावित परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर निकालने, सामुदायिक रसोई चलाने और नावों की व्यवस्था करने जैसे राहत कार्य किए जाते हैं, पर ये उपाय तात्कालिक ही साबित होते हैं. ग्रामीण वर्षों से मजबूत तटबंधों और स्थायी पुनर्वास की मांग कर रहे हैं. इन परिवारों की कहानी दरअसल नरकटिया और बेलवा के सैकड़ों परिवारों की साझा पीड़ा है, जहां हर मानसून परीक्षा लेता है और आश्वासन खोखले साबित होते हैं.

इसे भी पढ़ें-

बिहार में बागमती का जलस्तर बढ़ने से कई गांवों पर बाढ़ का खतरा, जर्जर बांध से सहमे ग्रामीण

ताश के पत्तों की तरह टूटे थे तटबंध, फिर भी नहीं चेता विभाग! मानसून से पहले सीतामढ़ी-शिवहर में बाढ़ का खतरा गहराया