Holi 2026 : 'बादशाह' ने अपनी दाढ़ी से साफ की श्रीनाथजी मंदिर की 9 सीढ़ियां, लोगों ने सुनाई खरी-खोटी
बादशाह बने व्यक्ति ने अपनी दाढ़ी से सूरजपोल की नवधाभक्ति के भाव से बनी 9 सीढ़ियों को साफ किया.

Published : March 4, 2026 at 10:28 AM IST
राजसमंद : प्रदेश सहित पूरे देश में होली की धूम है. इस दिन कई जगहों पर अनोखी परंपरा देखने को मिलती है. ऐसी ही एक परंपरा है नाथद्वारा में धुलंडी (होली) पर बादशाह की सवारी निकलने की. नाथद्वारा में हर साल धुलंडी पर एक सवारी निकलती है, जिसे 'बादशाह की सवारी' कहा जाता है. यह सवारी नाथद्वारा के गुर्जरपुरा मोहल्ले के बादशाह गली से निकलती है. यह एक प्राचीन परंपरा है, जिसमें एक व्यक्ति को नकली दाढ़ी-मूंछ लगाकर, मुगल पोशाक पहनाकर, आंखों में काजल लगाकर और दोनों हाथों में श्रीनाथजी की छवि देकर उसे पालकी में बैठाया जाता है. इस सवारी की अगवानी मंदिर मंडल का बैंड बांसुरी बजाते हुए करता है.
मंगलवार शाम करीब आठ बजे बादशाह की सवारी गुर्जरपुरा से होते हुए बड़ा बाजार से आगे निकली, तब वहां मौजूद बृजवासियों ने पालकी में सवार बादशाह को गलियां देते हुए खरी खोटी सुनाई. जुलूस मंदिर की परिक्रमा लगाकर श्रीनाथजी के मंदिर पंहुचा, जहां बादशाह बने व्यक्ति ने अपनी दाढ़ी से सूरजपोल की नवधाभक्ति के भाव से बनी 9 सीढ़ियों को साफ किया.
बादशाह को खरी खोटी सुनाते हैं : यह लम्बे समय से चली आ रही एक प्रथा है. इसके बाद मंदिर के परछना विभाग के मुखिया ने बादशाह को पैरावणी (कपड़े, आभूषण आदि) भेंट किए. इसके बाद फिर से गालियों का दौर शुरू हो गया. मंदिर में मौजूद लोग बादशाह को खरी-खोटी सुनाते और रसिया गान करते हुए बादशाह बने व्यक्ति को वापस उसके घर तक छोड़ने जाते हैं.
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इसके पीछे की कहानी : मंदिर के कृष्ण भंडार के अधिकारी सुधाकर उपाध्याय ने बताया कि यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है. जब औरंगजेब मंदिरों में भगवान की मूर्तियों को खंडित करता हुआ मेवाड़ पहुंचा तो श्रीनाथजी के विग्रह को खंडित करने की मंशा से जब वह मंदिर में गया. कहा जाता है कि मंदिर में प्रवेश करते ही उसकी आंखों की रोशनी चली गई. उस वक्त उसकी बेगम ने भगवान श्रीनाथजी से प्राथना कर माफी मांगी तब उसकी आंखें ठीक हो गई.
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पश्चाताप स्वरूप बादशाह की बेगम में उनको अपनी दाढ़ी से मंदिर की सीढ़ियों पर गिरी गुलाल को साफ करने के लिए कहा. तब बादशाह ने अपनी दाढ़ी से सूरजपोल के बाहर की 9 सीढ़ियों को उल्टे उतरते हुए साफ किया और तभी से इस घटना को एक परंपरा के रूप में मनाया जाता रहा है. इसके बाद औरंगजेब की मां ने एक बेशकीमती हीरा मंदिर को भेंट किया, जिसे आज भी श्रीनाथजी के दाढ़ी में लगा देखते हैं.

