ग्वालियर में लगती थी औरंगजेब की कचहरी, खुद जनता की परेशानियां सुनता था मुगल सम्राट
ग्वालियर की तलहटी में 1660 ईसवी में किला गेट का निर्माण कराया गया था, इसे आलमगीर गेट के नाम से भी जाना जाता है. इसी द्वार के अंदर मुगल सम्राट औरंगज़ेब ने एक कचहरी का निर्माण कराया था.संवाददाता पीयूष श्रीवास्तव की रिपोर्ट.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : August 21, 2026 at 9:01 PM IST
ग्वालियर: ग्वालियर किले पर कालखंड में अलग अलग राजाओं के साथ मुगलों का भी कब्जा रहा. उन सम्राटों ने अपने कार्यकाल के दौरान ग्वालियर क़िले पर अलग-अलग निर्माण कराए अलग अलग मिसाले दीं. आज भी इनसे जुड़े कई ऐसे ऐतिहासिक तथ्य किले में हैं जिनके बारे में आज की पीढ़ी बहुत कम जानती है. इस बात से भी बहुत कम लोग इत्तेफाक रखते हैं कि ग्वालियर में मुगलों के शासन में दरबार की जगह कचहरी लगती थी, मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब की कचहरी, जहाँ जनता की सुनवाई और रियासत के कामकाज हुआ करते थे.
किले की तलहटी में में कराया था कचहरी का निर्माण
ग्वालियर रियासत पर 16वीं सदी में जब मुगल सम्राट औरंगजेब ने कब्जा किया और और यहाँ हुकूमत की तो इस रियासत को बतौर शासक अपने तरीक़े से चलाया. किले के प्रवेश द्वार पर एक कचहरी बनवाई, जहाँ प्रजा की समस्याओं की सुनवाई और निदान किया जाता था. ये कचहरी आज भी किले की तलहटी में बने प्रवेश द्वार किला गेट के अंदर संरक्षित है. पुरातत्व विभाग के अधीन है.
हमेशा से ग्वालियर किले पर मुगलों की रही नज़र
मध्य प्रदेश पुरातत्व विभाग से रिटायर्ड पूर्व पुरातत्व अधिकारी और इतिहासकार लालबहादुर सिंह सोमवंशी बताते हैं, "जब मुगल भारत आए तो कई जगहों पर उन्होंने अपना आधिपत्य किया. ग्वालियर किला पर तो हमेशा से मुगलों ने आक्रमण किया और इस पर कब्जा काबिज किया. ऐसे में जब औरंगजेब का शासन आया तो उसने क़िले के पास ही एक मस्जिद बनवाई, आसपास का इलाका बसाया. उस दौर में किले से पैदल चढ़ाई के लिए किला गेट का इस्तेमाल किया जाता था जो गुजरी महल से मानसिंह पैलेस तक पहुंचता था."

खुद बैठकर जनता की सुनवाई करता था मुगल सम्राट
ग्वालियर की तलहटी में 1660 ईसवी में किला गेट का निर्माण कराया गया था, इसे आलमगीर गेट के नाम से भी जाना जाता है. इसे औरंगजेब के नाम पर ही बनवाया गया था. इसी द्वार के अंदर मुगल सम्राट औरंगज़ेब ने एक कचहरी का निर्माण कराया था. यहां कई कमरे बने हुए हैं जिनमें प्रजातंत्र से जुड़े काम काज किए जाते थे. इसी कचहरी में औरंगजेब खुद बैठता था और अपनी जनता को सुनता था. इसलिए ग्वालियर किले पर औरंगजेब की बड़ी कचहरी लगती थी.

औरंगजेब के ज़िंदा रहने तक लगी कचहरी
सोमवंशी कहते हैं, "इन बातों के प्रमाण ग्वालियर क़िले से जुड़े कई पुराने अभिलेखों और अन्य जगहों पर मिलता है. विद्वान हरिहर निवास द्विवेदी ने भी अपनी किताब 'ग्वालियर के तोमर' में इसका वर्णन किया है कि औरंगजेब कचहरी ग्वालियर में लगाता था. ये कचहरी तब तक ही लगी जब तक औरंगज़ेब ज़िंदा रहा, उसके बाद कचहरी ख़त्म हो गई. अब सिर्फ़ उस कचहरी की संरचना और याद ही बची है."
कैदखाने के रूप में हुआ ग्वालियर किले का इस्तेमाल
जहां ग्वालियर क़िले की तलहटी में कचहरी लगी तो मुख्य क़िला मुग़लों के लिए कारागार रहा. मुग़ल सम्राट अकबर के जमाने से ही शाही क़ैदियों को क़ैद करने के लिए ग्वालियर किले का इस्तेमाल होता रहा. खुद औरंगजेब ने भी अपने पारिवारिक प्रतिद्वंदी और राजनीतिक विरोधियों को कैद करने के लिए ग्वालियर किले को कैदखाना बनाया. उसने अपने भाई मुराद बख्श को मानसिंह पैलेस जिसे मन मंदिर महल कहा जाता है, में कैदी बना कर रखा था. अपने भतीजे और अन्य विरोधियों के साथ भी उसने ऐसा ही किया था.
इतिहास के पन्नों से ओझल होती 'कचहरी'
ग्वालियर का किला इतिहास का एक ऐसा नायब खजाना है जिसने कई ऐतिहासिक विरासतों, धरोहरों, कला और रहस्यों को समेट कर रखा है. आज देश-विदेश से सैलानी यहां इस इतिहास को जानने पहुचते हैं. लेकिन इतिहास के पन्नों में औरंगजेब की कचहरी अब ओझल होती जा रही है. आज कचहरी का परिसर तो किले में बना है लेकिन उस पर किसी का ज़्यादा ध्यान नहीं है. जिस जगह से कभी प्रजातंत्र का संचालन होता था वह अब सुरक्षाकर्मियों के बैठने का ठिकाना भर बनकर रह गया है.

