13 साल पुराना 294 असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती विवाद: दोषियों की पहचान के लिए बनी नई समिति पर भी उठे सवाल
रूटा के पूर्व अध्यक्ष डॉ संजय कुमार ने कुलगुरु की ओर से गठित एनसी गौतम समिति के गठन पर आपत्ति जताई है.

Published : June 3, 2026 at 8:43 PM IST
जयपुर: राजस्थान विश्वविद्यालय में वर्ष 2011-12 और 2013-14 के दौरान हुई 294 सहायक आचार्य (असिस्टेंट प्रोफेसर) भर्ती विवाद में राजभवन की ओर से तत्कालीन कुलपति डॉ देवस्वरूप पर कार्रवाई के बाद अब दोषी कार्मिकों की पहचान भी शुरू की गई है. हालांकि दोषी कार्मिकों की पहचान के लिए गठित नई समिति को भी नियम विरुद्ध बताया जा रहा है.
दोषी कार्मिकों की पहचान के लिए समिति: राजस्थान विश्वविद्यालय की कुलगुरु प्रो अल्पना कटेजा ने बताया कि राजभवन से प्राप्त निर्देशों के आधार पर विश्वविद्यालय में दोषी कार्मिकों की पहचान के लिए एक समिति गठित की गई है. समिति की अध्यक्षता सिंडिकेट में राज्यपाल मनोनीत सदस्य प्रो एनसी गौतम कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि समिति भर्ती प्रक्रिया के विभिन्न चरणों की जांच करेगी और ये पता लगाएगी कि किस स्तर पर क्या खामियां रहीं. दोषी पाए जाने वाले कार्मिकों की जानकारी राजभवन को भेजी जाएगी. उन्होंने कहा कि जांच प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और जल्द ही रिपोर्ट पेश कर दी जाएगी.
समिति गठन पर रूटा के पूर्व अध्यक्ष ने उठाए सवाल: उधर, राजस्थान विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (रूटा) के पूर्व अध्यक्ष डॉ संजय कुमार ने वर्तमान कुलगुरु की ओर से गठित एनसी गौतम समिति के गठन पर गंभीर आपत्ति जताई है. उनका कहना है कि ये राजस्थान विश्वविद्यालय अधिनियम, 1946 की धारा 10 (7) का उल्लंघन है. डॉ संजय ने कहा कि इस मामले की जांच के लिए पहले ही कुलाधिपति की ओर से धारा 10(5) के तहत प्रो भगवती प्रसाद सारस्वत की अध्यक्षता में विधिवत तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की जा चुकी थी, जिसकी अनुशंसा के आधार पर 27 मई, 2026 को राजभवन ने कार्रवाई भी कर दी थी. ऐसे में नई समिति के गठन का औचित्य समझ से परे है.
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हाईकोर्ट के फैसले का दिया हवाला: डॉ संजय कुमार ने जांच समिति की ओर से शॉर्टलिस्टिंग प्रक्रिया को मनमाना बताए जाने पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि अध्यादेश 141 के अपेंडिक्स-III, टेबल-II (A) के तहत अपनाई गई प्रक्रिया को वर्ष 2014 में राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी. उन्होंने बताया कि डॉ रश्मि नायर और अन्य बनाम राजस्थान राज्य मामले में हाईकोर्ट की डबल बेंच ने याचिका खारिज करते हुए विश्वविद्यालय की चयन प्रक्रिया को यूजीसी नियमों और विश्वविद्यालय के अध्यादेशों के अनुरूप माना था. ऐसे में 13 वर्ष बाद उसी आधार पर आपत्ति उठाना न्यायिक मर्यादाओं के विपरीत है.
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न्याय के उल्लंघन का आरोप: रूटा के पूर्व अध्यक्ष ने ये भी आरोप लगाया कि जांच समिति ने तत्कालीन कुलपति, कुलसचिव, वित्त अधिकारी और अन्य संबंधित अधिकारियों का पक्ष सुने बिना रिपोर्ट तैयार कर दी, ऐसे में ये समिति निष्पक्ष नहीं थी. उन्होंने कहा कि वर्ष 2013 में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के शिक्षकों की बैकलॉग भर्ती पूरी तरह नियमों के तहत की गई थी. वर्तमान में इन शिक्षकों की पदोन्नति प्रक्रिया जारी है और इस प्रकार के विवाद आरक्षित वर्ग के शिक्षकों के हितों को प्रभावित कर सकते हैं.
ये रखी प्रमुख मांगें:
- एनसी गौतम समिति को तत्काल निरस्त किया जाए.
- वर्ष 2013 की नियुक्तियों और वर्तमान पदोन्नति प्रक्रिया में अनावश्यक हस्तक्षेप रोका जाए.
- राजभवन की ओर से मामले में निष्पक्ष और न्यायोचित निर्णय लिया जाए.
बहरहाल, करीब 13 वर्ष पुरानी इस भर्ती प्रक्रिया को लेकर हुई कार्रवाई ने राजस्थान विश्वविद्यालय के प्रशासनिक और शैक्षणिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है. एक ओर राजभवन की जांच रिपोर्ट भर्ती में गंभीर अनियमितताओं की ओर संकेत कर रही है, वहीं दूसरी ओर शिक्षक संगठन जांच प्रक्रिया और नई समिति के गठन पर सवाल उठा रहे हैं. ऐसे में अब सभी की नजर दोषी कार्मिकों की पहचान के लिए गठित समिति की रिपोर्ट और राजभवन के अगले कदम पर टिकी हुई है.

