संभल जामा मस्जिद विवाद पर ASI का जवाब, रिकॉर्ड में नहीं प्राचीन ढांचे को गिराकर निर्माण का उल्लेख
ASI ने कहा कि ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है, जिससे यह साबित हो कि मस्जिद किसी प्राचीन ढांचे को गिराकर बनाई गई थी.

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : March 3, 2026 at 6:38 PM IST
अलीगढ़: उत्तर प्रदेश के संभल स्थित जामा मस्जिद को लेकर चल रहे ऐतिहासिक और कानूनी विवाद के बीच भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने अपना पक्ष साफ कर दिया है. आरटीआई के जरिए मांगी गई जानकारी के जवाब में एएसआई ने कहा है कि उसके उपलब्ध अभिलेखों में ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि मस्जिद किसी प्राचीन ढांचे को गिराकर बनाई गई थी या फिर खाली जमीन पर इसका निर्माण हुआ था.
यह जानकारी केंद्रीय सूचना आयोग के समक्ष हुई सुनवाई के दौरान सामने आई. आरटीआई आवेदन में मस्जिद के निर्माण की परिस्थितियों, उस समय की जमीन के मालिक और संबंधित दस्तावेजों की जानकारी मांगी गई थी.
आरटीआई आवेदन और ASI का जवाब: एएसआई ने स्पष्ट किया कि उसके रिकॉर्ड में इस तरह का कोई विवरण उपलब्ध नहीं है. सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत सत्य प्रकाश यादव ने आवेदन दाखिल कर यह जानना चाहा था कि मुगलकालीन जामा मस्जिद का निर्माण किन परिस्थितियों में हुआ था. क्या यह किसी पुराने मंदिर या अन्य ढांचे को गिराकर बनाई गई थी, या फिर खाली जमीन पर इसका निर्माण किया गया था. इसके साथ ही उन्होंने उस समय जमीन के वास्तविक मालिक का नाम, मालिकाना हक से जुड़े दस्तावेज और निर्माण की अवधि से संबंधित प्रमाण भी मांगे थे.
मस्जिद का इतिहास और ASI रिकॉर्ड: एएसआई ने अपने जवाब में कहा कि उसके पास उपलब्ध अभिलेखों में इस तरह की कोई जानकारी दर्ज नहीं है. हालांकि विभागीय रिकॉर्ड के अनुसार मस्जिद का निर्माण वर्ष 1526 में हुआ बताया गया है. एएसआई ने यह भी स्पष्ट किया कि यह इमारत जामा मस्जिद के नाम से ही संरक्षित है. उसके रिकॉर्ड में यह उल्लेख नहीं है कि इसे पहले किसी अन्य नाम से जाना जाता था.
संरक्षण का इतिहास और वर्तमान स्थिति: विभाग के अनुसार वर्ष 1920 में इस इमारत को संरक्षण के दायरे में लिया गया था और तब से यह एएसआई की निगरानी में है. वर्तमान में भी यह एक सक्रिय मस्जिद के रूप में मौजूद है और स्थानीय समुदाय द्वारा उपयोग में लाई जा रही है. मामला केंद्रीय सूचना आयोग तक पहुंचा, जहां अपील पर सुनवाई हुई. आयोग ने एएसआई के जवाब को सही ठहराया और स्पष्ट किया कि सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण की जिम्मेदारी केवल उपलब्ध रिकॉर्ड की जानकारी देने तक सीमित है.
केंद्रीय सूचना आयोग का फैसला: आयोग ने कहा कि किसी विभाग को नई जानकारी जुटाने या ऐतिहासिक शोध कर निष्कर्ष निकालने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. एएसआई के पास जो रिकॉर्ड उपलब्ध थे, वे आवेदक को दे दिए गए हैं और इस आधार पर अपील को खारिज कर दिया गया. संभल की जामा मस्जिद पिछले कुछ समय से ऐतिहासिक दावों और कानूनी याचिकाओं के कारण चर्चा में रही है. एक याचिका में दावा किया गया है कि मस्जिद का निर्माण किसी प्राचीन मंदिर स्थल पर किया गया था.
विवाद और प्रशासन की सतर्कता: इसी दावे को लेकर स्थानीय स्तर पर विरोध और तनाव की घटनाएं भी सामने आई थीं, जिसके बाद प्रशासन को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ी. एएसआई के हालिया जवाब से यह साफ हो गया है कि सरकारी रिकॉर्ड में इस दावे की पुष्टि या खंडन से जुड़ा कोई प्रत्यक्ष दस्तावेज मौजूद नहीं है. यानि विभाग के पास ऐसा कोई अभिलेख नहीं है जो यह बताए कि मस्जिद किसी ढांचे को गिराकर बनाई गई थी या नहीं. इतिहास से जुड़े कई विवादों में अक्सर मौखिक परंपराएं, स्थानीय कथाएं और विभिन्न पक्षों के दावे सामने आते हैं.
दस्तावेज़ी प्रमाण की आवश्यकता: लेकिन सरकारी स्तर पर किसी भी निष्कर्ष के लिए दस्तावेजी प्रमाण को ही आधार माना जाता है. इस मामले में एएसआई ने स्पष्ट कर दिया है कि उसके रिकॉर्ड सीमित हैं और उन्हीं के आधार पर जानकारी दी जा सकती है. वर्ष 1526 में निर्माण का उल्लेख जरूर दर्ज है, लेकिन निर्माण से पहले की स्थिति को लेकर कोई आधिकारिक विवरण उपलब्ध नहीं है. मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रशासन पूरी तरह सतर्क है.
भविष्य की न्यायिक प्रक्रिया: यह मुद्दा धार्मिक और ऐतिहासिक दोनों पहलुओं से जुड़ा है, इसलिए किसी भी बयान या दस्तावेज को लेकर जनभावनाएं प्रभावित हो सकती हैं. फिलहाल एएसआई और केंद्रीय सूचना आयोग के जवाब के बाद स्थिति स्पष्ट है कि सरकारी अभिलेखों में विवादित दावों की पुष्टि या खंडन से संबंधित कोई ठोस दस्तावेज दर्ज नहीं है. आगे यदि किसी पक्ष द्वारा नए दस्तावेज या साक्ष्य प्रस्तुत किए जाते हैं, तो वही न्यायिक प्रक्रिया में विचार का विषय बनेंगे. अभी के लिए सरकारी रिकॉर्ड की स्थिति यही है जो एएसआई ने आरटीआई के जवाब में रखी है.
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