सीएम आवास होली मिलन समारोह, रम्माण नृत्य के कलाकारों ने बिखेरी पारंपरिक संस्कृति की छटा, देखें वीडियो
देहरादून सीएम आवास में होली मिलन समारोह में रम्माण नृत्य के कलाकारों ने प्रस्तुति दी.

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : March 2, 2026 at 8:35 PM IST
देहरादून: होली के पावन मौके पर मुख्यमंत्री आवास, रंगों, संगीत और लोक संस्कृति की सुरमयी धुनों से सराबोर नजर आया. गढ़वाल और कुमाऊं मंडलों से आए लोक कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से ऐसा समां बांधा कि वहां मौजूद भीड़ भी मंत्रमुग्ध हो उठी. इस खास आयोजन का मुख्य आकर्षण चमोली जिले के जोशीमठ से आई रम्माण लोकनृत्य मंडली रही, जिसने अपने पारंपरिक रम्माण मुखौटा नृत्य की प्रस्तुति देकर सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया. यह प्रस्तुति इतनी प्रभावशाली रही कि दर्शकों की नजरें मंच से हटने का नाम नहीं ले रही थीं. ईटीवी भारत से खास बातचीत में कलाकारों ने इस लोकनृत्य की परंपरा, इतिहास और सांस्कृतिक महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी दी.
मुखौटों के साथ जीवंत प्रस्तुति: जोशीमठ से आए कलाकारों ने रंग बिरंगे पारंपरिक परिधानों और आकर्षक मुखौटों के साथ मंच पर प्रवेश किया. ढोल दमाऊ और रणसिंघा की धुनों के बीच जैसे ही नृत्य आरंभ हुआ, पूरा वातावरण रंगमय हो गया. कलाकारों द्वारा पहने गए मुखौटे केवल सजावट नहीं, बल्कि लोककथाओं और धार्मिक कथाओं के प्रतीक हैं. इस नृत्य की विशेषता यह है कि इसमें कलाकार विभिन्न पौराणिक और लोक पात्रों का रूप धारण कर मंचन करते हैं.
प्रस्तुति के दौरान भगवान राम की कथा पर आधारित रामलीला के अंश भी दर्शाए गए, जिसमें मर्यादा, त्याग और धर्म की भवना को जीवंत किया गया. साथ ही चरवाहों के जीवन, पहाड़ की प्रेम कहानियों और लोकजीवन की सरलता को भी नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत किया गया.
विश्व धरोहर की श्रेणी में रम्माण: कलाकारों ने बताया कि रम्माण मुखौटा नृत्य को विश्व धरोहर की श्रेणी में रखा गया है. यह केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि सदियों पुरानी लोकआस्था और सांस्कृतिक परंपरा का जीवंत दस्तावेज है. पीढ़ी दर पीढ़ी यह परंपरा मौखिक और व्यवहारिक रूप से आगे बढ़ाई जाती रही है. दल के एक सदस्य शिवांगी लखेड़ा ने ईटीवी भारत से बातचीत में कहा कि,
हमारे पूर्वजों ने इस परंपरा को जीवित रखा है. आज हमें गर्व है कि हम मुख्यमंत्री आवास जैसे महत्वपूर्ण मंच पर अपनी संस्कृति को प्रस्तुत कर पा रहे हैं. होली के इस आयोजन में केवल रंगों की ही नहीं बल्कि संस्कृति की भी बौछार देखने को मिली. गढ़वाल और कुमाऊं की झोड़ा छपेली और चौफुला जैसी लोक विधाओं की भी प्रस्तुतियां दी गईं. जिससे उत्तराखंड की सांस्कृतिक विविधता एक ही मंच पर साकार हो उठी.
शिवांगी लखेड़ा, सदस्य, रम्माण मुखौटा नृत्य-
परंपरा को बचाए रखने की चुनौती: ईटीवी भारत संवाददाता किरणकांत शर्मा ने जब दल से जुड़े कलाकारों से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि, आधुनिकता के इस दौर में लोक कलाओं को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती है. युवाओं का रुझान अब आधुनिक संगीत और नृत्य की ओर अधिक हो गया है. लेकिन पहाड़ की पहचान उसकी लोकसंस्कृति से ही है.
कलाकारों ने कहा कि यदि सरकार और समाज दोनों मिलकर प्रयास करें तो इस तरह की परंपराएं आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंच सकती है. उन्होंने विद्यालयों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लोकनृत्य को बढ़ावा देने की भी अपील की.
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