3.7 लीटर दूध की कीमत 7 लाख, बिहार पुलिस ने किया जब्त
गया में बड़े पैमाने पर अफीम के दूध बरामद हुए हैं. तस्करी बाजार में कई लाख रुपए प्रति लीटर इसके मूल्य होते हैं.


Published : February 25, 2026 at 6:49 PM IST
गया : बिहार के गया में अफीम दूध की बरामदगी हुई है. अफीम का दूध लाखों रुपए किलो की दर से तस्करी किया जाता है. अफीम के दूध को स्टील के कमंडल और प्लास्टिक के जार में रखकर ले जाया जा रहा था. गुप्त सूचना के आधार पर पुलिस की विशेष टीम ने छापेमारी की और करीब 4 किलोग्राम के आसपास अफीम का दूध बरामद किया गया है. मौके से तीन तस्करों की गिरफ्तारी की गई है.
गया में अफीम का दूध बरामद : भदवर थाना अंतर्गत रबदी गांव में छापेमारी के दौरान यह सफलता मिली है. बताया जाता है कि गया के वरीय पुलिस अधिकारियों को सूचना मिली थी कि तीन तस्कर रबदी पहाड़ी से रबदी गांव होते हुए अफीम का दूध (मादक पदार्थ) की तस्करी करने वाले हैं. सूचना के आधार पर एसडीपीओ इमामगंज कमलेश कुमार के नेतृत्व में एक विशेष टीम का गठन किया गया.
गठित विशेष टीम ने ग्राम रबदी से पूर्व पहाड़ी की ओर जाने वाली कच्ची सड़क के समीप छापेमारी की. इस दौरान स्टील का कमंडल एवं प्लास्टिक का जार के साथ तीन लोगों को पकड़ा गया. स्टील का कमंडल और प्लास्टिक के जार की जांच की गई, तो इसमें अफीम का दूध (मादक पदार्थ) मिला. अफीम का दूध कुल 3.712 लीटर बरामद किया गया है. जिसकी अनुमानित मूल्य 7 लाख रुपये आंकी गई है.
गया पुलिस की त्वरित कार्रवाई, भदवर थाना द्वारा NDPS Act. के कांड में संलिप्त 03 अभियुक्तों को 3.712 किलोग्राम अवैध मादक पदार्थ (अफीम का दुध) के साथ किया गया गिरफ्तार :-@bihar_police@IPRDBihar@gaya_dm@IgMagadh pic.twitter.com/kLClMzj9JJ
— GAYA POLICE (गया (बिहार) पुलिस ) (@GAYAPOLICEBIHAR) February 25, 2026
लाखों रुपए प्रति लीटर होती है कीमत : जानकारी के अनुसार अफीम दूध लाखों रुपए लीटर तस्करी के बाजार में बिक्री होती है. फिलहाल 3 तस्करों की गिरफ्तारी के बाद अग्रतर कार्रवाई की जा रही है. गिरफ्तार तस्करों में अमिरका सिंह, मुकेश कुमार, कृष्णदेव सिंह शामिल हैं. सभी पन्नातांड़ (थाना भदवर) के रहने वाले हैं. छापेमारी टीम में इमामगंज एसडीपीओ कमलेश कुमार, डुमरिया अंचलाधिकारी संजय कुमार, थानाध्यक्ष भदवर सचिन कुमार आदि शामिल थे.
''गुप्त सूचना के आधार पर छापेमारी की गई. इस दौरान अफीम के दूध (मादक पदार्थ) की बरामदगी हुई है. मौके से तीन तस्करों को पकड़ा गया है. पुलिस की अग्रतर कार्रवाई चल रही है. यह पुलिस के लिए बड़ी सफलता है.''- कमलेश कुमार, एसडीपीओ, इमामगंज
2 से 6 लाख रुपये प्रति लीटर कीमत : गया में अफीम की खेती होती है. खेत से अफीम का दूध निकलता है, तो डेढ़ से दो लाख रुपये किलो मूल्य होता है. वहीं हरियाणा, पंजाब, कश्मीर तस्करी होते ही इसका मूल्य 5 लाख के आसपास हो जाता है. अफीम का दूध जब पटटा जैसा या गुड़ के ढेला जैसा हो जाता है, तो यह गया मे 2 लाख रूपए किलो और दूसरे राज्य में 6 लाख रुपए किलो के आसपास हो जाता है. इस संबंध में सीधे तौर पर कोई भी पुलिस पदाधिकारी बोलने से कतराते हैं. किंतु, सोर्स की बातों पर गौर करें, तो अफीम के दूध से ही अफीम और चरस तैयार होता है.

ऐसे तैयार होता है अफीम-चरस : गया जिले के नक्सल प्रभावित डुमरिया, इमामगंज, बाराचट्टी समेत अन्य क्षेत्र में अफीम की खेती होती है. झारखंड के सीमावर्ती इलाकों में अफीम की फसल पिछले तीन दशक से होती रही है. इसके विनष्टीकरण का अभियान भी नारकोटिक्स, वन विभाग, उत्पाद विभाग, पुलिस के द्वारा संयुक्त रूप से अभियान चलाकर किया जाता रहा है. किंतु फिर भी आज तक अफीम की खेती पर पूरी तरह से नकेल नहीं कसा जा सका है.
अब जब करीब 3 किलो 712 ग्राम अफीम का दूध गया में बरामद हुआ है तो इस संबंध में सोर्स बताते हैं कि अफीम की खेती अक्टूबर नवंबर के महीने में से शुरू हो जाती है. तब अक्टूबर-नवंबर के महीनों में जमीन को समतल किया जाता है. सबसे पहले जैविक खाद और पानी देकर शुरुआत की जाती है. हर साल नक्सली-अफीम माफिया के गठजोड़ से बिहार- झारखंड के बॉर्डर वाले अधिकांश इलाकों में अफीम की खेती की जाती है.
इसकी खेती सरसों की तरह होती है. समय-समय पर पानी देना होता है. तस्कर पानी का जुगाड़ किसी तरह से कर लेते हैं. इसके लिए गहराई में बोरिंग तक की जाती है. सबसे पहले जब 60 से 90 दिनों के अंतराल में अफीम की खेती फूल के रूप में हो जाती है, तो इसकी खेती करने वाला स्टील का बर्तन लेकर ब्लेड से या पतली छुरी से चीरा मारता है. चीरा मारने से जो दूध निकलता है, उसे बर्तन में रखते हैं. इसे ही अफीम का दूध कहा जाता है.
अफीम की फसल में फूल में दूध निकालने के लिए चीरा मारने का सिलसिला महीनों तक चलता है. अफीम का फूल रंग बिरंगा होता है. चीरा करने के बाद वह अगले दिन फिर भर जाता है, तो फिर दूसरे दिन भी अफीम के फूल में चीरा मारा जाता है. यह सिलसिला महीनों तक चलता रहता है और अफीम का दूध निकलता रहता है.
अफीम का दूध निकालने के बाद उसमें कुछ केमिकल मिलाकर उसे अफीम के रूप में (पटटा) तैयार किया कर लिया जाता है और फिर उसी दूध से प्रक्रिया कर चरस तैयार कर लिया जाता है. वहीं फूल से पूरी तरह से दूध निकालने के बाद जो भी बीचे रह जाता है, वह पोस्ता दाना हो जाता है. दूध को केमिकल मिलाकर पटटा की तरह या गुड़ के ढेला की तरह बना दिया जाता है, जो अफीम हो जाता है और उसकी फिर तस्करी विभिन्न राज्यों में की जाती है. जिस तरह से ईख के रस से चीनी भी बनता है और गुड़ भी बनता है, इसी प्रक्रिया से अफीम और चरस तैयार होता है.

पाकिस्तान तक पहुंचता है गया का अफीम : सबसे बड़ी बात यह है कि गया का अफीम जम्मू कश्मीर, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान समेत विभिन्न राज्यों तक पहुंचता है. कई दफा हरियाणा, कश्मीर, राजस्थान, पंजाब के ट्रक यहां पकड़े जाते रहे हैं और वहां के तस्कर भी गिरफ्तार होते रहे हैं. जिससे पता चलता है कि बिहार के गया के अफीम की तस्करी दूसरे राज्यों में है.
वहीं सोर्स की मानें तो यहां का अफीम चरस जम्मू-कश्मीर, हरियाणा, पंजाब के माध्यम से पाकिस्तान तक जाता है. जैसे ही अफीम गया के मार्केट से निकलता है, दूसरे राज्य में पहुंचता है तो उसकी कीमत कई गुणा बढ़ जाती है.
अफीम के हर हिस्से का उपयोग : अफीम की फसल का हर हिस्सा उपयोग में लाया जाता है. इससे नशा से लेकर दवा बनाने तक में उपयोग होता है. अफीम का पत्ता को भूसी के रूप में तैयार कर उसे विभिन्न रोगों के लिए दवा भी बना दिया जाता है. वहीं, फूल और डंठी का भी उपयोग किया जाता है. इस तरह अफीम की खेती के हर एक हिस्से का उपयोग करके इसकी खेती करने वाला मालामाल हो जाता है. पिछले कुछ सालों के अफीम की खेती को देखें तो करोड़ों का कारोबार इसका होता रहा है.
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