Save Aravalli : अरावली खत्म हुई तो राजस्थान ही नहीं दिल्ली की दहलीज तक होगा रेगिस्तान, देखिये ये ग्राउंड रिपोर्ट
भारत की सबसे पुरानी पर्वत शृंखला अरावली पर केंद्रीय कमेटी की कुछ सिफारिशों पर SC की मंजूरी ने पर्यावरण प्रेमियों की चिंता बढ़ा दी है.

Published : December 27, 2025 at 7:02 AM IST
|Updated : December 27, 2025 at 7:15 AM IST
अजमेर : अरावली पर्वत शृंखला दुनिया की सबसे प्राचीन फोल्ड माउंटेन रेंज में से एक है . यह धरती पर मानव के आने और विकसित होने से भी पहले की है. राजस्थान का वजूद अरावली पर्वतमाला से ही है. यूं कहे कि एक बच्चे के लिए माता का आंचल सुरक्षित होता है ठीक उसी तरह अरावली पर्वत राजस्थान के लिए एक सुरक्षित कवच है, जो थार के रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोक रही है. अरावली पर्वत शृंखला नहीं होती तो राजस्थान ही नहीं हरियाणा और दिल्ली का भूगोल भी अलग ही होता. थार का रेगिस्तान दिल्ली तक सबको निगल गया होता. ईटीवी भारत अरावली के उस मुहाने पर पहुंचा जहां थार के रेगिस्तान और अरावली की पहाड़ी के बीच की दूरी खत्म हो चुकी है.
राजस्थान के लोगों के लिए अरावली पर्वतमाला मां की तरह है जो अकाल से राजस्थान के कई जिलों को बचाती है. यह पर्वतमाला एक मां की तरह बच्चे की ढाल बनती है तो पोषण भी देती है. इसकी पनाह में अनगिनत जीव जंतु सांस ले रहे हैं. वनस्पति और जड़ी बूटियां भी अरावली की पर्वत शृंखला में मौजूद हैं. इसके अलावा अरावली पर्वत श्रृंखला के कारण मानसून की मेहरबानी भी रहती है. अरावली पर्वत शृंखला से जल की कई धाराएं भी निकलती जो लोगों की प्यास बुझाती है. अरावली के बिना राजस्थान की कल्पना करना भी किसी भयानक स्वप्न से कम नहीं है, लेकिन अब राजस्थान के लोग अरावली रूपी अपनी मां को खोने के डर से आशंकित है.
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सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के आने के बाद तो सेव अरावली की मुहिम राजस्थान में शुरू हो गई है. अरावली कोई छोटी पहाड़ी नहीं है बल्कि एक पूरी पर्वत शृंखला है, जो राजस्थान से होकर हरियाणा और दिल्ली तक जाती है. ईटीवी भारत ने अरावली की बर्बादी से होने वाले खतरे को दिखाने के लिए अजमेर और नागौर की सीमा तक का सफर किया ताकि आपको उस खतरे को दिखा सके और समझा सके कि किस तरह अरावली कवच की तरह हमारी रक्षा कर रही है.

अरावली से है राजस्थान का अस्तित्व : अजमेर और नागौर की सीमा पर पुष्कर आता है, जहां से जयपुर- बीकानेर हाइवे निकल रहा है. इस हाइवे को निकालने के लिए यहां अरावली की पहाड़ी को दो जगह काटा गया है. पहला बूढ़ा पुष्कर के नजदीक और दूसरा बाड़ी घाटी है जो नागौर जिले में आती है. अरावली की पर्वत माला पवित्र धरा पुष्कर के चारों ओर से होकर गुजर रही है. ईटीवी भारत ने ग्राउंड जीरो पर पहुंचकर पड़ताल की तो सामने आया ऐसा भयावह हकीकत. बूढ़ा पुष्कर के नजदीक 60 मीटर ऊंची पहाड़ी को काटकर हाइवे निकाला गया है, लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि एक ओर ऊंची पहाड़ी है तो वहीं करीब ही 40 मीटर ऊंची रेत के टीले भी है. यह टीले नागौर जिले की ओर से आगे बढ़ते हुए यहां तक पहुंचे हैं, जबकि रेतीले टीलों से आगे पहाड़ी और हरा भरा राजस्थान है.
यानी पश्चिम से उठा रेगिस्तान को अरवाली ने यहां रोककर रखा है, लेकिन अब वो दिन भी दूर नही जब अरावली की पहाड़ी को काटकर हाइवे बनाए जाने से थार के रेगिस्तान को आगे बढ़ने की जगह मिल गई है और यह पुष्कर से अजमेर की ओर भी बढ़ने लगा है. जरा सोचिए यह एक मात्र उदाहरण है और यदि हमारा सुरक्षा कवच अरावली को इस तरह से बर्बाद कर दिया जाए तो अजमेर ही नही दिल्ली की दहलीज तक थार का रेगिस्तान पहुंच जाएगा. दिल्ली में वायु दूषित हो रही है, लेकिन अरावली की गोद मे बसे वन ही हैं जो राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक ऑक्सीजन का बड़ा माध्यम हैं.

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अरावली बिना राजस्थान नहीं : पर्यावरणविद डॉ आबिद अली खान भू-विज्ञान के जानकार ने बताया कि अरवाली के बिना राजस्थान की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. उनका कहना है कि अरावली है तो राजस्थान है. सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद अरावली चिंता का कारण बन गई है. 100 मीटर से ऊपर की अरावली की पहाड़ी को छोड़कर कम उंचाई वाली पहाड़ियों को खनन और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए काट दिया जाएगा जो दुख का विषय है. ऐसी चर्चाओं से तो यही लगता है कि अरावली का 70 फीसदी हिस्सा खनन और व्यावसायिक गतिविधियों को मिलने वाली स्वीकृति के कारण खत्म हो जाएगा. डॉ. खान बताते हैं कि अरावली पर्वत शृंखला बहुत ही सुंदर है और यह राजस्थान का अस्तित्व है. अरावली का मतलब राजस्थान है और अरावली से ही राजस्थान है।

3 बिलियन वर्ष पुरानी है अरावली पर्वत शृंखला : उन्होंने बताया कि अरावली पर्वत शृंखला विश्व की अति प्राचीन पर्वत शृंखलाओं में से है. अरावली पर्वत शृंखलाओं की आयु 3 बिलियन वर्ष है. धरती को बने हुए साढ़े चार बिलियन वर्ष हो चुके हैं. धरती पर जीवन का अस्तित्व नहीं था उससे पहले अरावली का वजूद था. पर्यावरण विद डॉ. आबिद अली खान बताते हैं कि एक ओर थार का रेगिस्तान है वही राजस्थान के बीच से होकर अरावली पर्वत शृंखला गुजर रही है. जो थार के रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोकती है. डॉ. खान बताते हैं कि पुष्कर से आगे नागौर की और बढ़ेंगे तो आगे रेगिस्तान नजर आता है. लेकिन पुष्कर और पुष्कर से आगे दक्षिण की और देखते हैं तो हरा भरा राजस्थान नजर आता है.
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अरावली ने ही हरे भरे राजस्थान को बचा रखा है. उन्होंने बताया कि अरावली पहाड़ी नहीं होगी तो थार का रेगिस्तान उत्तर की ओर आगे बढ़ेगा जो काफी बुरा होगा. उन्होंने बताया कि अरावली पर्वतमाला नहीं होने से थार का रेगिस्तान उपजाऊ जमीन को भी निगल लेगा, जिससे फसल नहीं होगी और पानी की कमी होगी. वहीं वातावरण में धूल के कण भी काफी मिश्रित हो जाएंगे. इसके अलावा जंगल भी पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा. अरावली पर्वत शृंखला से कई जल की धाराएं निकलती हैं जो नहीं रहेंगी.

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अरावली में है भिन्न- भिन्न वनस्पति और जीव जंतु : डॉ. खान अरावली की विशेषता बताते हुए कहते हैं कि अजमेर की बात करें तो पुष्कर का नाग पहाड़ जो अरावली पर्वत शृंखला का ही एक हिस्सा है वह अजमेर के लिए फेफड़े का काम करता है. नाग पहाड़ी पर धोकड़े के पेड़ अधिक मिलेंगे. वहीं, भीलवाड़ा की तरफ जाएंगे तो चिपूला, टर्मिनेलिया, हरबेडा आंवला के पेड़ अरावली पर्वत शृंखला पर अधिक मिलेंगे. अजमेर और भीलवाड़ा में मौजूद अरावली पर्वत श्रृंखला में भिन्न-भिन्न वनस्पति और जीव जंतु हैं. इसी तरह हाड़ोती में भी है. बियूटीआ जिसको ढाक के तीन पात कहते है, इसके जंगल अरावली पर्वत शृंखला में मिलेंगे. अरावली की यही विशेषता है कि इसमें हजारों तरह की वनस्पति और विभिन्न प्रकार की जीव जंतु को अपनी गोद में पनाह दे रखी है जो अरावली की खूबसूरती है. अरावली पर्वत शृंखला समाप्त हो जाती है तो इन सबसे राजस्थान वंचित हो जाएगा.





