'कलेक्टर साहब मेरा गांव मर रहा है..' गीधा औद्यौगिक क्षेत्र में जहरीले तालाब और प्रदूषण से तड़प रहे लोग
गीधा औद्यौगिक क्षेत्र में सरकार ने फैक्ट्रियां लगवाकर स्थानीय लोगों को भगवान भरोसे छोड़ दिया है. यहां जल-जमीन-वायु प्रदूषण से लोग बेहाल हैं-

Published : February 20, 2026 at 8:50 PM IST
|Updated : February 21, 2026 at 1:38 PM IST
भोजपुर : बिहार के भोजपुर जिले के कोईलवर प्रखंड स्थित गीधा औद्योगिक क्षेत्र में बना जहरीला तालाब अब गंभीर समस्या बन चुका है. फैक्ट्रियों से निकलने वाला गंदा और रासायनिक पानी एक बड़े गड्ढे में जमा होकर जहरीले तालाब का रूप ले चुका है. इससे जल, जमीन और वायु तीनों स्तर पर प्रदूषण फैल रहा है. स्थानीय लोग भय और बीमारी के साये में जीवन जीने को मजबूर हैं.
औद्योगिक कचरे से बना जहरीला तालाब : गीधा औद्योगिक क्षेत्र के पेपर मिल के पास स्थित इस गड्ढे में आसपास की करीब एक दर्जन फैक्ट्रियों का दूषित पानी गिराया जाता है. धीरे-धीरे यह गड्ढा जहरीले तालाब में तब्दील हो गया है. स्थानीय लोगों के अनुसार इस पानी को पीने से पशु-पक्षियों की मौत तक हो चुकी है. कई किसानों की फसल सूख गई है और आसपास की जमीन बंजर होती जा रही है.

"इस तालाब का पानी जहरीला हो चुका है. कई बार जानवरों की पानी पीने से मौत हो गई. इससे इतनी दुर्घंध आती है कि कई किलोमीटर दूर से इसके आने का पता चल जाता है."- स्थानीय राहगीर
जल प्रदूषण से पेयजल भी प्रभावित : तालाब के कारण आसपास के चापाकलों का पानी भी दूषित और दुर्गंधयुक्त हो गया है. लोगों का कहना है कि पानी से बदबू आती है और उसका रंग भी बदला हुआ दिखता है. इससे जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ गया है. ग्रामीणों को पीने के पानी के लिए वैकल्पिक स्रोत ढूंढने पड़ रहे हैं.

"तालाब वाले रास्ते से कोई आना-जाना नहीं चाहता. यहां बदबू है और बिना चश्मा के कोई आ भी नहीं सकता. इस फैक्ट्री से धुआं का कण आसपास के गांवों में फैलता है. लोग प्रदूषण का शिकार हो रहे हैं. हम लोग बहुत जरूरी होने पर ही यहां से गुजरते हैं."- संतोष कुमार, राहगीर
प्रदूषण से फसल और जमीन पर असर : तालाब के आसपास की जमीन पर रासायनिक प्रभाव साफ देखा जा रहा है. किसानों के अनुसार कई कट्ठा में लगी फसल सूख चुकी है, जबकि कुछ दूरी पर खड़ी फसल कुपोषित हो रही है. जहरीले रसायनों के रिसाव से मिट्टी की उर्वरता कम हो रही है. इससे किसानों की आजीविका पर सीधा संकट खड़ा हो गया है.

"हमारा गांव इस फैक्ट्री की हवा और दूषित पानी से मर रहा है और गांव भुखमरी का शिकार हो रहा है. गांव का हैंडपंप भी अब जहरीला पानी उगलने लगा है. जलस्तर प्रदूषित हो चुका है. जमीन जहरीली हो चुकी है जिससे उत्पादन भी नहीं हो पा रहा है. हमारी जिला कलेक्टर और जिम्मेदार लोगों से मांग है कि हमारी समस्या का समाधान किया जाए."- रविंद्र नारायण सिंह, समाजसेवी व पैक्स अध्यक्ष
वायु प्रदूषण से सांस और आंखों की बीमारी : पेपर मिल से निकलने वाला बारीक काला कण और धूल हवा में घुलकर लोगों के स्वास्थ्य पर असर डाल रहा है. राहगीरों और स्थानीय निवासियों को आंखों में जलन, लालिमा और सांस की दिक्कत हो रही है. कई लोग अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और अन्य श्वसन रोगों से पीड़ित हो रहे हैं. बदबू इतनी तेज है कि लोग नाक पर गमछा या रूमाल बांधकर गुजरते हैं.

रासायनिक तत्वों का खतरनाक स्तर : पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार फैक्ट्रियों से निकलने वाले अपशिष्ट में मरकरी, सीसा और क्रोमियम जैसे खतरनाक तत्व पाए जाते हैं. ये तत्व पानी में मिलकर उसे अत्यंत जहरीला बना देते हैं. मरकरी जैसे न्यूरो टॉक्सिक तत्व दिमाग और तंत्रिका तंत्र पर असर डाल सकते हैं, जबकि क्रोमियम श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है.
चिकित्सकों की सलाह : प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र कोईलवर के चिकित्सकों के अनुसार इस प्रकार के जहरीले तत्वों से गर्भपात का खतरा, नेजल सेप्टम में अल्सर, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और निमोनिया जैसी बीमारियां हो सकती हैं. लोगों को सलाह दी गई है कि पानी को उबालकर और छानकर ही उपयोग करें. साथ ही क्षेत्र से गुजरते समय मास्क और चश्मे का प्रयोग करें.
प्रशासनिक उदासीनता पर सवाल : स्थानीय समाजसेवियों ने मामले की शिकायत एनजीटी और जिला प्रशासन तक की है, लेकिन अब तक ठोस कार्रवाई नहीं हुई है. लोगों का आरोप है कि प्रशासन की अनदेखी के कारण फैक्ट्री संचालक बेपरवाह बने हुए हैं. समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो यह समस्या और विकराल रूप ले सकती है. जब इस मुद्दे पर जिलाधिकारी से बात करने की कोशिश की गई तो संपर्क नहीं हो सका.
''बहुत ज्यादा हम नहीं बता सकते. बहुत जल्द साफ सफाई करवाया जायेगा, सौन्दर्यीकरण कराया जायेगा.''- अमित कुमार, एरिया को-ऑर्डिनेटर, गीधा
कब सुनेंगे जिम्मेदार : गीधा औद्योगिक क्षेत्र का यह जहरीला तालाब केवल पर्यावरणीय संकट नहीं बल्कि गंभीर समस्या बन चुका है. जल, जमीन और वायु प्रदूषण से जनजीवन प्रभावित है. अब आवश्यकता है सख्त प्रशासनिक कार्रवाई, वैज्ञानिक जांच और स्थायी समाधान की, ताकि लोगों को स्वच्छ वातावरण और सुरक्षित जीवन मिल सके.
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