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जंगलों की दुश्मन नहीं सरकार! विकास के नाम पर कटे पेड़ों की भी होती क्षतिपूर्ति, जानिए कैसे

एक धारणा बन चुकी है कि विकास के नाम पर वन भूमि पर कंक्रीट के जंगल बनाए जा रहे है. क्या सच में ऐसा है?

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जंगलों की दुश्मन नहीं सरकार! (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Uttarakhand Team

Published : December 27, 2025 at 7:08 PM IST

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Updated : December 27, 2025 at 8:57 PM IST

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धीरज सजवाण

देहरादून: आम जनता के मन में एक धारणा बनी हुई है कि विकास के नाम पर जंगलों का विनाश किया जा रहा है. दूसरे शब्दों में कहे तो सड़क के लिए पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हो रही है, लेकिन ऐसा नहीं है. किसी सड़क को बनाने पर पहले हर पहलू को ध्यान में रखा जाता है. पेड़ को काटने से पहले उसे बचाने का प्रयास किया जाता है. यदि पेड़ काटे भी जाते है तो उसकी भरपाई भी की जाती है. आज हम उसी के बारे में आपको विस्तार से बताएंगे.

100 हेक्टेयर जंगलात की भूमि पर बनी सड़कें: विकास के लिए विनाश, यह सरकार के प्रति जनता की आम धारणा है. इस धारणा से हिमालय राज्य उत्तराखंड सबसे ज्यादा ग्रसित है. क्योंकि पिछले कुछ सालों में उत्तराखंड में करीब 100 किलोमीटर सड़कें नई बनाई गई और उनके लिए हजारों पेड़ काटे गए. करीब 100 हेक्टेयर जंगलात की भूमि पर सड़कों का निर्माण किया गया. ऐसे में उत्तराखंड जैसे राज्य में लोगों की धारणा बन चुकी है कि यहां पर जंगलों को खत्म कर विकास की गाथा लिखी जा रही है. पर्यावरणविद् खुद सरकार पर इस तरह के आरोप लगाते रहे है.

लोक निर्माण विभाग के सचिव पंकज पांडे ने दी जानकारी. (ETV Bharat)

क्या सच में ही उत्तराखंड में सड़कों के नाम पर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हो रही है. पर्यावरण यानी जंगलों को बचाने के लिए सरकार कोई कदम नहीं उठाती हैं. इसका सच जानने के लिए ईटीवी भारत ने लोक निर्माण विभाग और उन एजेंसी के अधिकारियों से बात की, जिन्हें प्रकृति का दुश्मन कहा जाता है. यानी जो सड़कों और अन्य प्रोजेक्ट के लिए पेड़ों को काटने की अनुमति देते है.

अधिकारियों का पक्ष: उत्तराखंड लोक निर्माण विभाग के सचिव पंकज पांडे बताते हैं कि जब भी कोई नई सड़क बनती है और उसमें पेड़ काटने की बात आती है तो सबसे ज्यादा दुख उन्हें होता है. क्योंकि उनकी भी पेड़-पौधों और पर्यावरण के प्रति वही भावनाएं हैं, जो और लोगों की है.

विकास के नाम पर कटे पेड़ों की भी होती क्षतिपूर्ति (ETV Bharat)

सचिव पंकज पांडे का कहना है कि अक्सर लोगों को यहीं कहते सुना जाता है कि सड़कों के लिए PWD पेड़ काटने पर उतारू रहता है, लेकिन हकीकत में ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. उन्होंने सड़क निर्माण और उसके लिए किए जाने वाले होमवर्क के बारे में विस्तार से बताया. सचिव पंकज पांडे के मुताबिक सड़क निर्माण के दौरान PWD की पहली कोशिश यहीं होती है कि पर्यावरण को कम से कम नुकसान हो. इसको लेकर उन्होंने एक उदाहरण भी दिया.

गंगोत्री हाईवे पर PWD ने कटने से बचाए 1000 पेड़: सचिव PWD पंकज पांडे ने बताया कि जब किसी सड़क का प्रस्ताव पास होता है और उसका एलाइनमेंट तय किया जाता है. सबसे पहले विभाग की यह कोशिश रहती है कि उसे एलाइनमेंट को अप्रूव किया जाए, जिस पर कम से कम पेड़ हो. जब उन्हें कोई विकल्प नहीं मिलता तो तभी जंगलात की भूमि या फिर पेड़ वाली जगह ली जाती है.

PWD पंकज पांडे का कहना है कि हिमालय के विशेष प्रजाति के पेड़ जैसे देवदार, बुरांश या बांज को न काटा जाए, इसका प्रयास किया जाता है. कही बार नेशनल सिक्योरिटी से जुड़ा मामला आ जाता है, जैसे ही बॉर्डर रोड या फिर सुरक्षा से जुड़े प्रोजेक्ट तभी इस तरह के पेड़ों को काटकर उस इलाके में सड़क बनाई जाती है. उदाहरण के तौर पर उन्होंने गंगोत्री हाईवे का ताजा मामला बताया.

गंगोत्री हाईवे की चौड़ाई कम कर पेड़ों को बचाया:

गंगोत्री हाईवे पर 12 मीटर की सड़क चौड़ाई की डीपीआर स्वीकृत हुई थी. लेकिन ग्राउंड की स्थिति देखने के बाद गंगोत्री हाईवे की चौड़ाई को एक मीटर कम कर 11 मीटर किया गया. एक मीटर चौड़ाई कम होने से करीब एक हजार पेड़ों को कटने से बचा लिया गया. इसी तरह जब भी किसी सड़क का प्रोजेक्ट तैयार किया जाता है, उसके हर पहलू को ध्यान में रखा जाता है. प्रयास यहीं रहता है कि इकोलॉजी और इकोनॉमी में किस तरह से बैलेंस किया जाए.
-पंकज पांडे, PWD सचिव-

नुकसान से दोगुना भरपाई की जाती है: PWD सचिव पंकज पांडे ने बताया कि कई बार जब कोई ऑप्शन नहीं मिलता और वन भूमि का इस्तेमाल करना पड़ता है तो नियमानुसार जितनी जमीन वन विभाग से ली जाती है, उससे दोगुना जमीन वन विभाग को उपलब्ध कराई जाती है. यही नहीं जितने पेड़ काटते हैं, उसे डबल पेड़ लगाने के लिए भी वन विभाग की क्षतिपूर्ति की जाती है. इसके लिए वन विभाग को पैसा दिया जाता है. पेड़ तभी काटे जाते है, जब उनके पास कोई विकल्प नहीं होता.

पिछले तीन सालों के आंकड़े:

  • साल 2023 में तकरीबन 56 किलोमीटर की सड़कों के लिए 50 हेक्टेयर वन भूमि ली गई, जिसके बदले PWD ने 101 हेक्टेयर भूमि वन विभाग को दी. साथ ही क्षतिपूर्ति के लिए 26.84 करोड़ का भुगतान किया.
  • इस तरह साल 2024 में तकरीबन 36 किलोमीटर की सड़कों के लिए वन भूमि से 18.45 हेक्टेयर भूमि ली गई, जिसके बदले वन विभाग को 35.80 हेक्टेयर भूमि दी गई. वहीं वन विभाग को 19.84 करोड़ का भुगतान किया.
  • साल 2025 में तकरीबन 107 किलोमीटर की सड़कों के लिए PWD ने वन विभाग की 59.44 हेक्टेयर भूमि का इस्तेमाल किया. इसकी क्षतिपूर्ति के लिए पीडब्ल्यूडी ने वन विभाग को 118.66 हेक्टेयर दी और 19.72 करोड़ का भुगतान किया.
  • इस तरह तीन सालों में PWD ने करीब 200 किलोमीटर सड़क के लिए वन विभाग की 128.69 हेक्टेयर भूमि का इस्तेमाल किया, जिसकी क्षतिपूर्ति के लिए लोक निर्माण विभाग ने वन विभाग को 256.04 हेक्टेयर भूमि दी और 66.40 करोड़ का भुगतान किया.
  • इस तरह पिछले तीन सालों में लोक निर्माण विभाग ने पेड़ काटने पर की 66.40 करोड़ की क्षतिपूर्ति की.

फॉरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट: इसी मसले पर प्रमुख वन संरक्षक रंजन कुमार मिश्र से भी बात की गई. उन्होंने बताया कि उत्तराखंड एक वन बाहुल्य और विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाला राज्य है. पहाड़ों की बड़ी संख्या में लोग जंगलों के बीच गांवों में रहते है. उन्हें भी सड़क, बिजली और पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं देने की जरूरत होती है. उन सभी को ध्यान में रखते हुए फॉरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट बनाया गया है, ताकि इकोलॉजी और इकोनॉमी के बीच में बैलेंस बना रहे.

प्रमुख वन संरक्षक रंजन कुमार मिश्र के मुताबिक कोई भी परियोजना जब बनती है तो उसमें इस बात का ध्यान रखा जाता है कि कम से वन भूमि का इस्तेमाल हो और पेड़ भी न के बराबर काटे जाए. फिर भी विकास कार्यों के लिए पेड़ काटने पड़ते है. लेकिन जो पेड़ कटता है, उसका क्षेत्रफल लिया जाता है. यदि एक हेक्टेयर क्षेत्र में पेड़ों का कटना हुआ है तो वन विभाग को दो हेक्टेयर जमीन मिलेगी, जहां क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण किया जाएगा. जैसे वन काटा जाता है, वैसा ही वन दूसरी जगह पर उगाया जाएगा, लेकिन इसमें समय लगता है. इसके अलावा वाइल्डलाइफ को भी ध्यान में रखा जाता है, तब कहीं जाकर कोई प्रोजेक्ट पास होता है.

उत्तराखंड में विकास कार्यों में होने वाली वनों की क्षतिपूर्ति के लिए वृक्षारोपण के लिए भूमि की कमी नहीं है. इसके लिए वन विभाग द्वारा लेंड बैंक भी बनाया हुआ है. इसके बाद भी उत्तराखंड में पेड़ लगाने के लिए जगह की कमी पड़ती है, तो भारत सरकार ने प्रावधान किया है कि हम नजदीक प्रदेश में भी क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण कर सकते हैं. हालांकि अब तक उत्तराखंड वन विभाग को अपने राज्य से बाहर जाने की जरुरत नहीं पड़ी.
-रंजन कुमार मिश्र, प्रमुख वन संरक्षक-

86 हजार हेक्टेयर भूमि पर वृक्षारोपण:

  • बीते 45 सालों की बात की जाए यानी अविभाजित उत्तराखंड से लेकर राज्य गठन के बाद से अभी तक 43 हजार हेक्टेयर वन भूमि पर विकास कार्यों हुए, जिसमें बदले वन विभाग ने 86 हजार हेक्टेयर पर वृक्षारोपण.
  • उत्तराखंड में कुल भूमि का 71 फीसदी क्षेत्र वन क्षेत्र के अंतर्गत आता है. इस 71 फ़ीसदी वन क्षेत्र भू-भाग पर पूरे देश में सबसे ज्यादा तकरीबन 46 फीसदी क्षेत्र जंगलों से आच्छादित है. यह वन क्षेत्र देश के सभी राज्यों में से सबसे बड़ा वन क्षेत्र है.

प्रमुख वन संरक्षक ने रंजन कुमार मिश्र की माने तो पिछले साल वन विभाग ने विकास कार्यों के लिए अलग अलग विभाग को 446 हेक्टेयर एरिया विकास कार्यों के लिए दिया गया. भारत में 1980 में आए वन संरक्षण अधिनियम के बाद अब तक पिछले 45 सालों में उत्तराखंड वन विभाग विभाग ने तकरीबन 43 हजार हेक्टेयर भूमि विकास कार्यों के लिए दे चुका है. मानकों के अनुसार उसका दो गुना वन विभाग को वृक्षारोपण के लिए अलग अलग विभागों से प्राप्त हुआ है.

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Last Updated : December 27, 2025 at 8:57 PM IST