महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रहा फरीदाबाद का अमृता अस्पताल, इलेक्ट्रिक गाड़ी चला कर परिवार का कर रही भरण पोषण
फरीदाबाद का अमृता अस्पताल महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रहा है. इलेक्ट्रिक गाड़ी चला कर महिलाएं परिवार का कर रही भरण पोषण कर रही हैं.

Published : March 1, 2026 at 12:24 PM IST
फरीदाबाद: हरियाणा के फरीदाबाद जिले का अमृता अस्पताल वर्ल्ड क्लास मेडिकल सुविधाओं के लिए जाना जाता है. अब ये अस्पताल एक और वजह से चर्चा में है, क्योंकि यहां इलाज के साथ-साथ महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की एक अनोखी पहल शुरू की गई है. इस पहल के तहत अमृता अस्पताल महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रहा है. दरअसल अस्पताल की ओर से महिलाओं को निशुल्क इलेक्ट्रिक गाड़ी चलाने की ट्रेनिंग दी जाती है और अस्पताल परिसर में ही उनको नौकरी भी दी जाती है. अब लगभग 20 महिलाएं अस्पताल परिसर में मरीजों को उनके परिजनों को गेट से लाने और गेट तक छोड़ने के लिए इलेक्ट्रिक गाड़ी चला रही हैं.
महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रहा अमृता अस्पताल: ईटीवी भारत से बातचीत के दौरान महिला ड्राइवर कुसुम ने बताया कि "मैं पिछले साढे तीन सालों से यहां पर गाड़ी चला रही हूं. इससे पहले मैं हाउस वाइफ थी. मेरे पति भी ड्राइवर हैं, लेकिन वो जितना भी कमाते थे. सब दारू में उड़ा देते थे और मेरे साथ मार पिटाई करते थे. जिसके बाद मुझे अपने बच्चों को पालना था और फिर मैंने सोचा कि क्यों ना मैं कुछ काम करूं, ताकि मेरे बच्चों का भरण पोषण ठीक से हो सके और उसके बाद मुझे अमृता अस्पताल के बारे में पता लगा. जहां पर महिलाओं को फ्री में इलेक्ट्रिक गाड़ी चलाने की ट्रेनिंग दी जा रही थी. इसके बाद मैं यहां पर आ गयी."
कुसुम ने बताया कि "जब मेरे पति को इस बारे में पता चला, तो उन्होंने फिर से मेरी पिटाई की, लेकिन फिर भी मैंने किसी की परवाह नहीं की, क्योंकि मुझे अपने बच्चों का ध्यान रखना था. इसलिए मैं यहां पर ट्रेनिंग लेने आ गई और एक हफ्ते की ट्रेनिंग के बाद में ड्राइवर बन गई और अब मैं पिछले साढ़े तीन साल से गाड़ी चला रही हूं. आज परिवार का भरण पोषण ठीक से हो रहा है. अब पति भी मेरे काम से खुश है. वो मुझे रोज यहां पर छोड़ने आते हैं और ड्यूटी खत्म होने के बाद मुझे यहां से लेने आते हैं. मैं दूसरी महिलाओं से कहना चाहूंगी कि वो किसी की परवाह ना करें उनके अंदर जो कला है. उस कला को बाहर निकाले और समाज में अपनी खुद की पहचान बनाएं, ताकि उनके परिवार का भरण पोषण ठीक ढंग से हो सके आज यही वजह है कि हमारा परिवार ठीक ढंग से चल रहा है. वहीं हमारे बच्चे बढ़िया स्कूल में पढ़ाई भी कर रहे हैं."
महिला ड्राइवर ने बताया अपना अनुभव: दूसरी महिला ड्राइवर कविता ने बताया कि "मैं पिछले 1 साल से यहां पर गाड़ी चला रही हूं. इससे पहले घर पर रहकर ही सिलाई का काम करती थी. उससे घर का भरण पोषण नहीं हो रहा था. तब मैंने सोचा मुझे बाहर निकलना चाहिए और कुछ ऐसा काम करना चाहिए, जिससे मेरे घर का भरण पोषण ठीक से हो सके. उसके बाद मैंने यहां पर ड्राइवर की ट्रेनिंग ली और यहां पर नौकरी करने लगी. हालांकि मेरे पति भी हैं, लेकिन वो कमाते नहीं हैं. जिस वजह से मेरे परिवार में काफी दिक्क़तें आ रही थी. हमारे दो बच्चे हैं. उनके भी भरण पोषण के लिए मुझे दूसरों के सामने हाथ फैलाना पड़ रहा था. उसके बाद मुझे यहां पर ट्रेनिंग के बारे में पता चला, तो मैं यहां आ गई और ट्रेनिंग लेकर पिछले 1 सालों से मैं यहां पर काम कर रही हूं और अपने बच्चों का परिवार का बहुत बढ़िया से भरन पोषण कर रही हूं."
जॉब के लिए घर वालों से लड़ी पलवल की विशु: पलवल की रहने वाली महिला ड्राइवर विशु ने बताया कि "मैं पिछले 3 सालों से यहां पर गाड़ी चला रही हूं. इससे पहले मैं घर पर ही थी और हमारा परिवार बड़ा था और कमाने वाले सिर्फ मेरे पति थे. जिससे घर का खर्चा नहीं चल पा रहा था. तब मैंने डिसाइड किया कि मैं भी घर से बाहर निकलूंगी और कोई काम करूंगी. हालांकि काम के दौरान घर वालों ने मना भी किया, लेकिन क्या करें मजबूरी थी, काम करना था ताकि हमारा घर परिवार ठीक से चल सके और इसके बाद मैंने यहां पर काम करना शुरू कर दिया. अब सब कुछ ठीक है. हम पति-पत्नी मिलकर काम रहे हैं और घर का पूरा खर्चा अब निकल जाता है."
6 महीने से नौकरी रही हैं पूजा: ड्राइवर पूजा ने बताया कि "मैं पिछले 6 महीने से यहां पर गाड़ी चला रही हूं हालांकि मेरे पति भी यहां पर काम करते हैं और उन्होंने ही मुझे बताया था जिसके बाद मैंने यहां पर गाड़ी चलाने की ट्रेनिंग ली और पिछले 6 महीने से मैं नौकरी कर रही हूं."
पति की मौत के बाद पत्नी ने उठाया कमाने का जिम्मा: महिला ड्राइवर पार्वती ने बताया कि "मेरे पति की मौत 14 साल पहले हो गई. जिसके बाद घर में काफी दिक्क़तें आ गई, तो फिर मैंने काम करना शुरू कर दिया. सबसे पहले मैं एक निजी कंपनी में सिलाई का काम करती थी, लेकिन उससे घर का भरण पोषण नहीं हो पा रहा था. जिसके बाद मुझे यहां के बारे में पता चला. तब मैं यहां आ गई और एक हफ्ते की ट्रेनिंग लेने के बाद मैंने यहां पर काम करना शुरू कर दिया और आज मुझे 3 महीने हो गए काम करते हुए."
लोगों के पसंद आ रही अस्पताल की पहल: अपने मरीज का इलाज करवाने आए सूरज ने बताया "ये बहुत अच्छी पहल है. मेरा भी मानना है कि महिलाओं को भी पुरुष के मुकाबले कमाना चाहिए और उन्हें भी आगे बढ़ना चाहिए और यह अच्छी पहल है कि महिला यहां पर ड्राइवर है. मुझे देखकर काफी अच्छा लगा. हमें महिला वर्ग को बढ़ावा देना चाहिए ताकि वो भी पुरुष के मुकाबले अपने पैरों पर खड़ी हो सके."
महिलाओं ने भी की तारीफ: अपने पति का इलाज करवाने आई महिला सरबजीत ने बताया कि "मुझे ये देखकर अच्छा लगा कि महिलाएं यहां पर गाड़ी चला रही हैं और इन महिलाओं को हौसला बढ़ाना चाहिए और जो भी महिला कुछ करना चाहती है वो भी घरों से निकलकर इसी तरह से अपना रोजगार कर सकती हैं ताकि उनके परिवार का भरण पोषण ठीक ढंग से हो सके."
महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की अनूठी पहल: बता दें कि अस्पताल प्रशासन द्वारा जहां एक तरफ स्वच्छ ऊर्जा से चलने वाली गाड़ियां पर्यावरण को स्वच्छ रखने का संदेश दे रही हैं, तो वहीं दूसरी तरफ अस्पताल प्रशासन द्वारा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की अनूठी पहल सामने आ रही है. इसके साथ ही अमृता अस्पताल दिखा रहा है कि स्वास्थ्य सेवा के साथ सामाजिक बदलाव भी संभव है और महिला पुरुष में कोई भेदभाव नहीं है.

