शिमला के रिज पर रेशम का 'लाइव' जादू: कोकून से धागा और 1500 धागों वाली किन्नौरी शॉल का अद्भुत सफर
किन्नौरी शॉल अपनी बारीकी और रंगीन ज्यामितीय डिजाइनों के लिए जानी जाती है.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : January 5, 2026 at 8:39 PM IST
शिमला: हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला का ऐतिहासिक रिज मैदान इन दिनों न केवल पर्यटन, बल्कि स्वरोजगार और पारंपरिक कला के एक बड़े केंद्र के रूप में उभरा है. उद्योग विभाग द्वारा आयोजित एमएसएमई फेस्ट 2026 (MSME Fest 2026) में इस बार सबसे अधिक आकर्षण का केंद्र रेशम उत्पादन विंग (Sericulture Wing) द्वारा लगाई गई प्रदर्शनी बनी है. यहां पद्मदेव परिसर में लोग केवल रेशम के कपड़े नहीं देख रहे, बल्कि कोकून (कीटों के शैल) से लाइव धागा बनते हुए और उससे विश्व प्रसिद्ध किन्नौरी शॉल की बुनाई का पूरा सफर देख रहे हैं.
कोकून से धागा: प्रकृति और तकनीक का संगम
अक्सर आम जनता के मन में यह सवाल रहता है कि रेशम का एक महीन धागा आखिर तैयार कैसे होता है. प्रदर्शनी में मौजूद सेरीकल्चर अधिकारी डॉ. अरविंद भारद्वाज ने बताया कि , इसका 'A to Z' प्रॉसेस लाइव लोगों को समझाया जा रहा है. स्टॉल पर रेशम के कीटों द्वारा तैयार किए गए कोकून (Shells) रखे गए हैं. गर्म पानी और विशेष मशीनों की मदद से इन कोकूनों से लाइव रीलिंग करके रेशम का धागा निकालकर दिखाया जा रहा है.
प्रदर्शनी में रेशम की पांच मुख्य किस्मों के कोकून प्रदर्शित
- मलबरी रेशम: जो हिमाचल में सबसे आम है.
- टसर और ओक टसर: अपनी मजबूती के लिए जाने जाते हैं.
- ईरी रेशम: जिसे अहिंसा सिल्क भी कहा जाता है.
- मूगा रेशम (Golden Silk): यह प्रदर्शनी का विशेष हिस्सा है. यह दुर्लभ रेशम असम के अलावा कहीं नहीं पाया जाता और अपनी प्राकृतिक सुनहरी चमक के कारण बेहद महंगा होता है.
1500 धागों का गणित और किन्नौरी शॉल की कलाकारी
धागा तैयार होने के बाद की प्रक्रिया और भी जटिल और विस्मयकारी है. प्रदर्शनी में बताया जा रहा है कि, कैसे इस रेशमी धागे से हिमाचल की पहचान किन्नौरी शॉल तैयार की जाती है. एक किन्नौरी शॉल की बुनाई की खासियत यह है कि इसमें लगभग 1500 अलग-अलग धागों का ताना-बाना (Warp and Weft) सेट किया जाता है.

किन्नौरी शॉल की क्या है खासियत?
किन्नौरी शॉल अपनी बारीकी और रंगीन ज्यामितीय डिजाइनों के लिए जानी जाती है. कारीगरों के अनुसार, किन्नौर के पारंपरिक डिजाइनों को उकेरने के लिए अलग-अलग रंगों के सिल्क धागों का प्रयोग किया जाता है. 1500 धागों को एक साथ संभालना और उनसे बिना किसी गलती के डिजाइन बनाना एक कठिन साधना है, जिसे देखने के लिए पर्यटकों और स्थानीय लोगों की भारी भीड़ उमड़ रही है.

रेशम पालन केवल खेती नहीं, बल्कि लाभकारी उद्योग
यदि कोई उद्यमी कोकून से धागा निकालकर बेचता है, तो यह धागा बाजार में ₹3000 से ₹4000 प्रति किलो तक बिकता है. अधिकारी बताते हैं कि कई लोग इस काम को अपनाना चाहते हैं, लेकिन जानकारी के अभाव में जुड़ नहीं पाते. इस फेस्ट का मुख्य उद्देश्य लोगों को यह समझाना है कि रेशम पालन केवल खेती नहीं, बल्कि एक लाभकारी उद्योग है. प्रदर्शनी में न केवल धागा बनाने की विधि दिखाई जा रही है, बल्कि तैयार रेशमी साड़ियां, सूट, स्टॉल और मफलर भी प्रदर्शित किए गए हैं ताकि लोग इसकी मार्केट वैल्यू को समझ सकें.

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