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देश के कई राज्यों में महिलाएं पहनती हैं अजमेर में बनी हैंडमेड लेडीज चप्पल, फिर भी हुनर को नहीं मिल रही पहचान

अजमेर में बनने वाले हैंडमेड लेडीज चप्पल को मशीनों से बने सैंडल्स से चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. प्रियांक शर्मा की रिपोर्ट...

हैंडमेड लेडीज चप्पल पर संकट
हैंडमेड लेडीज चप्पल पर संकट (ETV Bharat GFX)
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By ETV Bharat Rajasthan Team

Published : April 27, 2026 at 1:56 PM IST

9 Min Read
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अजमेर : अजमेर के पहाड़गंज क्षेत्र में स्थित जटिया कॉलोनी में लेडीज चप्पल बनाने का काम पीढ़ी दर पीढ़ी किया जा रहा है. अनुभव से आए हुनरमंद हाथों से यहां रहने वाले अधिकांश लोग लेडीज चप्पल बनाने का काम करते हैं और इनका गुजारा भी उनकी मेहनत पर ही निर्भर है. अजमेर में बनी हैंडमेड लेडीज चप्पल राजस्थान के जिलों में ही नहीं बल्कि अन्य राज्यों में भी बिकने के लिए जाती हैं, लेकिन अब इन हुनरमंद हाथों की चुनौती मशीनों से बनी चाइना मेड लेडीज चप्पल भी हैं. इससे हैंडमेड काम पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है. दूसरी ओर कच्चे माल के महंगे होने से लेबर पर मार पड़ रही है. ऐसे में कई लोग बरसों के हुनर को छोड़ अन्य काम तलाशने लगे हैं.

धार्मिक और पर्यटन नगरी अजमेर अपने प्रमुख धार्मिक स्थलों के कारण देश और दुनिया में विख्यात है. यहां बनने वाली कई ऐसी चीजें हैं, जिनके कारण भी अजमेर को जाना जाता है. अजमेर में हैंडमेड लेडीज चप्पल बनाने का काम बड़े पैमाने पर होता है. अजमेर की जटिया कॉलोनी में रहने वाले करीब 3500 लोग लेडीज चप्पल बनाने का काम करते हैं. इसके लिए कोई बड़ी फैक्ट्री नहीं है, बल्कि घरों में ही परिवार के सदस्य या लेबर लगवाकर हैंडमेड चप्पल बनाने का काम होता है. जटिया कॉलोनी में रहने वाले लोगों के लिए चप्पल बनाने का काम नया नहीं है बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है. इसको सीखने के लिए कोई प्रशिक्षण केंद्र नहीं है. यह हुनर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाता है.

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घरों में कोई बड़ी मशीन नहीं और ना ही कंप्यूटर पर चप्पलों की डिजाइन सेट की जाती है. सारा कमाल इनके हुनर का है. बावजूद इनको इनके काम से पहचान और सम्मान नहीं मिल रहा है. इनसे माल लेने वाले चप्पल जूते के होलसेल ग्राहकों को कभी नहीं बताते हैं कि यह चप्पल हैंडमेड है और अजमेर में बनी है. इतना ही नहीं कई कारोबारी तो डिजाइन देकर इनसे लेडीज चप्पल बनवाते हैं और उसपर अपना मार्क लगाकर ऊंचे दामों पर बेचते हैं, जबकि इन हुनरमंद कारीगरों को इनकी मेहनत का दाम होलसेल कारोबारियों पर निर्भर करता है. वर्तमान दौर में तो मशीनों से बनी चाइनीज लेडीज चप्पल भी बाजारों में है. ऐसे में हैंडमेड चप्पल को मार्केट में टिकाऊ रखने इन हुनरमंद कारीगरों को भी मजबूरी में समझौता करके चलना पड़ता है.

हैंडमेड लेडीज चप्पल
हैंडमेड लेडीज चप्पल (ETV Bharat GFX)

हाथों के हुनर पर है भरोसा : कारीगर राजू सबलानिया बताते हैं कि जटिया समाज के लोगों का लेडीज चप्पल और जूते बनाने का पुश्तैनी काम है. उन्होंने बताया कि पहले चमड़े से चप्पल और जूते बनाए जाते थे और अब सिंथेटिक लेदर से चप्पल जूते बनाए जाते हैं. इसका कच्चा माल भारत में चीन के ताइवान से आता है. बार-बार फैशन चप्पलों में भी बदलता रहता है और नई-नई डिजाइन आती रहती है. उसके हिसाब से ही कारीगरों को भी अपने हुनर को और तराशना होता है. कारीगर भी मार्केट में आने वाले नए डिजाइन पर नजर रखते हैं और उसके अनुसार लेडीज चप्पल बनाते हैं. कच्चे माल से लेडीज चप्पल हाथों से बनाई जाती है इसमें मशीनों का उपयोग नहीं होता है.

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कई राज्यों में जाती हैं लेडीज चप्पल : सबलानिया बताते हैं कि अजमेर में बनी हैंडमेड लेडीज चप्पल जयपुर, जोधपुर, नागौर, कुचामन, सीकर, बीकानेर, मेड़ता, भीलवाड़ा समेत राजस्थान के अन्य जिलों में भी जाती हैं. इसके अलावा राजस्थान के बाहर मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, बेंगलुरु, हैदराबाद, बिहार, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में भी अजमेर में बनी हैंडमेड लेडीज चप्पल जाती हैं. सिंथेटिक लेदर को सांचे के अनुसार कटिंग की जाती है. 37 से लेकर 41 तक स्टैंडर्ड साइज होता है, जिसको हाथों से ही बनाया जाता है. सोशल मीडिया का भी उपयोग डिजाइन को कारोबारियों तक पहुंचाने के लिए किया जाता है. कारोबारियों को कोई डिजाइन बनवानी है तो वे भी डिजाइन भेजते हैं.

सैंडल हाथ से बनाए जाते हैं
सैंडल हाथ से बनाए जाते हैं (ETV Bharat Ajmer)

युद्ध की आड़ में मनमानी, कच्चे माल की बढ़ी कीमतें : कारीगर राजू सबलानिया बताते हैं कि 400 से 450 घरों में लेडीज चप्पल बनाने का काम होता है. एक घर में करीब पांच सदस्य चप्पल बनाने के काम में जुड़े हुए हैं. कई परिवारों में तो महिलाएं भी इस काम से जुड़ी हुई हैं. कारीगर घनश्याम सबलानिया बताते हैं कि कच्चा माल भारत में चाइना से आता है. भारत में कच्चा माल के होलसेलर ने युद्ध की आड़ में मनमर्जी से कच्चे माल की दरों में बढ़ोतरी कर दी है. इसका असर लेबर के मार्जिन प्रॉफिट पर पड़ा है. इससे 10 फीसदी फर्क मार्जिन प्रॉफिट पर पड़ा है. केवल लेबर को ही नुकसान हुआ है और किसी को नुकसान नहीं है.

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प्रॉफिट कम हुआ : उन्होंने बताया कि एक दिन में एक कारीगर 8 से 12 जोड़ी लेडीज चप्पल बना लेता है. प्रत्येक चप्पल पर कारीगर को 30 रुपए मिलते हैं. चप्पलों को होलसेल कारोबारी को बेचा जाता है तो 8 से 10 फीसदी मुनाफा यूनिट चलाने वाले को होता है. उन्होंने बताया कि पहले 12 फीसदी प्रॉफिट था, अब कम हो गया है. 80, 120, 150, 200, 250 रुपए तक की चप्पल होलसेलर व्यापारी लेते हैं. यही चप्पल शोरूम में जाकर 500 से 800 रुपए और इससे भी अधिक कीमत पर बिकती हैं. कई कारोबारी तो अपना मार्क और स्टीकर चप्पलों पर लगवाकर इसे ऊंचे दामों में बेचते हैं. चप्पल बनाने में काम आने वाला स्लेशन (ग्लू) की दरें भी 20 फीसदी बढ़ गई हैं. लेडीज चप्पल को बनाने में सिंथेटिक लेदर, फॉर्म, ग्लू, रेग्जीन आदि की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है.

मार्जिन प्रॉफिट में आई कमी ने तोड़ी कमर : कारीगर कमल किशोर बताते हैं कि ईरान, अमेरिका और इजरायल युद्ध के कारण कच्चा माल महंगा मिल रहा है. इस कारण मार्जिन प्रॉफिट में काफी कमी आ गई है. अजमेर में भी कई लोग कच्चा माल रखते हैं लिहाजा यहीं से कच्चा माल की खरीद की जाती है. कच्चा माल के डीलर कहते हैं कि दिल्ली से ही कच्चा माल महंगा आ रहा है. किराए की जगह लेकर छोटा सा यूनिट चला रहे हैं, लेकिन अब किराया और मजदूर को देने के लिए मेहनताना भी नहीं निकल पा रहा है. पहले भी चप्पल पर 10 से 12 फीसदी प्रॉफिट मिल रहा था. उन्होंने बताया कि बाजार में लेडीज चप्पल की डिमांड है, लेकिन हमें प्रॉफिट नहीं मिल पा रहा है. चप्पल के नीचे के सोल की कीमत 10 रुपए बढ़ गई है. अन्य कच्चा माल की दरें बढ़ी हैं. यदि हम चप्पलों की रेट बढ़ा देते हैं तो होलसेलर खरीदते नहीं हैं.

घरों में ही परिवार के सदस्य या लेबर बनाते हैं चप्पल
घरों में ही परिवार के सदस्य या लेबर बनाते हैं चप्पल (ETV Bharat Ajmer)

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हर घर में बन रही हैं लेडीज चप्पल : कारीगर मुकेश सबलानिया बताते हैं कि पहाड़गंज में करीब हर घर में छोटे-छोटे यूनिट लगे हुए हैं, जहां पर हैंडमेड लेडीज चप्पल बनाई जा रही हैं. उनका कहना है कि सरकार की ओर से इन हुनरमंद कारीगरों को कोई फायदा नहीं मिलता है. पिछले 16 वर्षों में लगातार हैंडमेड लेडीज चप्पल बनाने के काम में कमी आ रही है. कई लोग बेरोजगारी की ओर जा रहे हैं और अपना काम भी छोड़कर दूसरा काम तलाश रहे हैं. उन्होंने बताया कि हैंडमेड चप्पलों को चीन में मशीनों से बनी लेडीज चप्पल से काफी चुनौती मिल रही है. मशीनों से बनकर आ रही चप्पलों के कारण हुनरमंद कारीगरों के काम पर भारी मार पड़ी है. इस काम से जुड़ी लेबर अपनी आजीविका नहीं चला पा रहे हैं.

टीके रहने के लिए संघर्ष कर रहे लोग : सबलानिया ने बताया कि इस काम से जुड़े हुए कारीगर और लेबर मजदूर वर्ग से आते हैं. बावजूद इसके इन हुनरमंद हाथों को बढ़ावा और सहयोग देने के लिए सरकार ने इनको मजदूर डायरी तक नहीं दी है. मजदूर डायरी होने पर यह भी सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठा सकेंगे. लोन के लिए भी यह बैंकों में आवेदन करते हैं तो इनको लोन नहीं दिया जाता है. लोगों को भी चीन में मशीनों में बनी लेडीज चप्पल की डिजाइन पसंद आती है, ऐसे में हैंडमेड लेडीज चप्पल बाजार में टीके रहने के लिए यहां लोग संघर्ष कर रहे हैं. यही हाल रहा तो आगामी कुछ वर्षों में घरों में बन रही है हैंडमेड लेडीज चप्पल बनना बंद हो जाएंगी.

अजमेर में कई डिजाइन के बनते हैं सैंडल
अजमेर में कई डिजाइन के बनते हैं सैंडल (ETV Bharat Ajmer)

मजदूर श्रेणी में करें शामिल : उन्होंने बताया कि यदि ऐसा होता है तो यह सभी लोग कहां जाएंगे? इस काम के अलावा इन्हें और कुछ आता भी नहीं है. यह काम पुश्तैनी है. जनप्रतिनिधियों से गुहार भी लगाई जाती है, लेकिन कोई सुनवाई नहीं होती है. पहले मजदूर डायरी भी बनी थी, लेकिन एक साल बाद ही रिन्यू करवाने की बारी आई तो मजदूर डायरी बंद कर दी गई. कारीगरों ने सरकार से मांग की है कि जो हाथों से चप्पल बना रहे हैं ऐसे हुनर बंद मजदूरों को प्रोत्साहन दिया जाए और उन्हें मजदूर श्रेणी में लाया जाए.