दिल्ली AIIMS की अहम चेतावनी: बच्चे के जन्म के पहले छह महीनों में हियरिंग स्क्रीनिंग है जरूरी, जानें क्यों
डॉक्टरों ने कहा कि अगर बच्चा आवाज पर रिस्पॉन्स नहीं देता तो इसे कभी भी इग्नोर नहीं करना चाहिए. पढ़ें पूरी खबर..

Published : March 2, 2026 at 8:54 PM IST
नई दिल्ली: दिल्ली एम्स में सोमवार को 'लिसन, फील, कनेक्ट – व्हिस्पर्स टू वेव्स' विषयक कार्यक्रम विश्व श्रवण दिवस से पहले आयोजित किया गया. इस दौरान विशेषज्ञों ने बच्चों में बढ़ती हियरिंग प्रॉब्लम्स को लेकर चिंता जताई और समय रहते जांच की अहमियत बताई. साथ ही कहा कि अगर कोई बच्चा ठीक से सुन ही ना पाए तो उसका बचपन, उसकी पढ़ाई और उसका कॉन्फिडेंस कितना प्रभावित हो सकता है.
ईएनटी विभाग के एचओडी प्रो. राकेश कुमार ने बताया कि भारत में कई बच्चे जन्म से या शुरुआती उम्र में ही हियरिंग लॉस का सामना करते हैं. समस्या ये है कि अधिकतर मामलों में पहचान देर से होती है. अगर जन्म के पहले छह महीनों में हियरिंग स्क्रीनिंग हो जाए तो बच्चे की स्पीच और मेंटल डेवलपमेंट को पूरी तरह नॉर्मल रखा जा सकता है. अगर बच्चा आवाज पर रिस्पॉन्स नहीं देता, नाम पुकारने पर नहीं मुड़ता या बोलने में देरी कर रहा है ,तो इसे इग्नोर ना करें.
सोशल लाइफ को भी करता है प्रभावित: वहीं ईएनटी विशेषज्ञ प्रो. कपिल सिक्का ने कहा कि हियरिंग लॉस सिर्फ एक मेडिकल इश्यू नहीं है. ये बच्चे की पढ़ाई, आत्मविश्वास और सोशल लाइफ को भी सीधे प्रभावित करता है. आज मॉडर्न टेक्नोलॉजी जैसे डिजिटल हियरिंग एड्स और कॉक्लियर इम्प्लांट से बच्चों की जिंदगी बदली जा सकती है. टाइमली डिटेक्शन और अर्ली इंटरवेंशन सबसे जरूरी है.
कराएं रेगुलर चेकअप: उनके अलावा ऑडियोलॉजी एक्सपर्ट डॉ. शिवानी अग्रवाल ने कहा कि अवेयरनेस ही सबसे बड़ा सॉल्यूशन है. कई बार पैरेंट्स सोचते हैं कि बच्चा लेट बोल रहा है, लेकिन असल में वो हियरिंग इश्यू हो सकता है. स्कूल स्तर पर रेगुलर हियरिंग चेकअप कैंप्स होने चाहिए. ग्रामीण इलाकों में तो जागरूकता अभियान चलाना बेहद जरूरी है. हर बच्चे को सुनने और सीखने का बराबर अधिकार है.
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