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दुर्लभ बीमारी से बेटे को खोने के बाद पिता बने मरीजों की आवाज, लाखों का पैकेज छोड़ शुरू की मुहिम

दुर्लभ बीमारी से बेटे को खोने वाले सौरभ सिंह का कहना है कि इलाज के लिए करोड़ों रुपयों की जरूरत होती है.

Patients with rare diseases with doctors and others
चिकित्सकों व अन्य के साथ दुर्लभ बीमारियों के पेशेंट (ETV Bharat Jaipur)
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By ETV Bharat Rajasthan Team

Published : February 28, 2026 at 6:32 AM IST

4 Min Read
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जयपुर: आज भी विश्वभर में लाखों लोग अलग–अलग दुर्लभ बीमारियों से जूझ रहे है, लेकिन कुछ ही लोग हैं जो दूसरों की आवाज बनकर किसी मुहीम से जुड़ते हैं. अपने किसी प्रिय को दुर्लभ बीमारी के कारण खोने का दर्द असहनीय होता है, लेकिन इसी दर्द को ताकत बनाकर सौरभ सिंह आज देशभर में दुर्लभ बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए उम्मीद की किरण बन गए हैं. वर्ल्ड रेयर डिजीज डे हर साल फरवरी के अंतिम दिन मनाया जाता है. इस मौके पर जानते हैं रेयर डिजीज इंडिया फाउंडेशन के डायरेक्टर सौरभ सिंह के बारे में, जिन्होंने अपने बेटे की मौत के बाद मल्टीनेशनल कंपनी में लाखों के पैकेज वाली नौकरी छोड़ दी और खुद को पूरी तरह इस मुहिम के लिए समर्पित कर दिया.

सौरभ सिंह बताते हैं कि जब उनके बेटे को दुर्लभ बीमारी का पता चला, तब उन्हें इलाज के लिए भारी आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा. महंगे इलाज, सीमित संसाधन और जागरूकता की कमी ने हालात और कठिन बना दिए. उन्होंने कहा कि आज भी देश में हजारों परिवार ऐसे हैं, जिनके लिए दुर्लभ बीमारियों का इलाज पहुंच से बाहर है. उन्होंने बताया कि रेयर डिजीज इंडिया फाउंडेशन मरीजों और उनके परिवारों को न सिर्फ आर्थिक और कानूनी सहायता उपलब्ध कराती है, बल्कि सरकार और न्यायालय में भी उनके अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ रही है. उनका उद्देश्य है कि हर दुर्लभ बीमारी से पीड़ित मरीज को समय पर इलाज, दवा और उचित सहायता मिल सके. क्योंकि जीने का अधिकार सभी को है.

सौरभ सिंह ने बताई अपने अभियान की कहानी, देखें वीडियो (ETV Bharat Jaipur)

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'इलाज के लिए करोड़ों रुपए की जरुरत': सौरभ सिंह का कहना है कि दुर्लभ बीमारियों के इलाज के लिए जरूरी दवाएं बेहद महंगी होती हैं, जिसके कारण आम परिवार इलाज नहीं करवा पाते. उन्होंने सरकार से मांग की है कि दुर्लभ बीमारियों के लिए विशेष नीति को और प्रभावी बनाया जाए, ताकि मरीजों को समय पर मदद मिल सके. फिलहाल केंद्र सरकार दुर्लभ बीमारियों के लिए सिर्फ 50 लाख की सहायता देती है, जो काफी कम है. जबकि इलाज के लिए करोड़ों रुपए की जरुरत होती है. सौरभ सिंह आज हजारों मरीजों के लिए प्रेरणा बन गए हैं. उनकी यह मुहिम न सिर्फ जागरूकता बढ़ा रही है, बल्कि दुर्लभ बीमारियों से जूझ रहे परिवारों को नई उम्मीद भी दे रही है.

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7 (ETV Bharat GFX)

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10 महीने में 2500 से अधिक केस: दुर्लभ बीमारियों के इलाज के बारे में राजस्थान की बात की जाए, तो अकेले राजस्थान में पिछले साल अप्रैल में शुरू हुई रेयर डिजीज क्लिनिक की ओपीडी में अब तक 10 महीने में 2500 से ज्यादा केस रजिस्टर्ड हो चुके हैं. इनमें 300 से अधिक मरीजों को भर्ती किया जा चुका है. नोडल सेंटर फॉर रेयर डिजीज के इंचार्ज डॉ प्रियांशु माथुर ने बताया कि अधिकतर दुर्लभ बीमारी इन्हेरिटेड मेटाबॉलिक डिसऑर्डर (शरीर में भोजन को ऊर्जा में बदलने की प्रक्रिया में गड़बड़ी) से संबंधित हैं. इनमें बच्चों को डेवलपमेंट डिले, बेहोशी, वजन न बढ़ना, बार-बार गंभीर बीमार होने पर अस्पताल में भर्ती होना जैसे लक्षण सामने आते हैं.

Event on World Rare Disease Day
वर्ल्ड रेयर डिजीज डे पर कार्यक्रम (ETV Bharat Jaipur)

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डॉ प्रियांशु माथुर ने बताया कि न्यूबॉर्न स्क्रीनिंग इसमें बहुत सहायक होता है. न्यूबॉर्न स्क्रीनिंग का मतलब होता है कि किसी बीमारी के लक्षण आने से पहले सूक्ष्म लक्ष्णों से बीमारी का पता लगाना. ग्लोबल डेटा कहता है कि जिस देश में शिशु मृत्युदर 50 से कम है, वहां न्यूबॉर्न स्क्रीनिंग अनिवार्य होना चाहिए. इस स्क्रीनिंग से बच्चों में दुर्लभ या गंभीर बीमारी का पहले ही पता लगाया जा सकता है. भारत के 10 राज्यों में न्यूबॉर्न स्क्रीनिंग चल रही है. प्रदेश में भी इसको लागू करने के लिए काफी कदम उठाए जा रहे हैं.